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अंबानियों के पैसे से हो रही है सत्‍य की जय

: मीडिया और रंगकर्म’ उर्फ ‘हमें उनसे है वफा की उम्मीद’ : थियेटर को राज्याश्रयी नहीं लोकाश्रयी होना चाहिये – वामन केन्द्रे : ‘खुदाया! जज्बा -ए-दिल की मगर तासीर उलटी है’ की तर्ज पर मीडिया की चाहे जितनी भी आलोचना क्यों न की जाये, उसका सम्मोहन उतना ही अपनी ओर खींचता चला जाता है। यही वजह है कि थियेटर जो अपने आप में एक मीडिया है, यह चाहता है कि ‘स्थापित’ मीडिया के गलियारों में उसकी भी पूछ-परख बढ़े, अखबारों में ढंग की समीक्षायें छपें और चैनलों में नाटकों की चर्चा हो।

: मीडिया और रंगकर्म’ उर्फ ‘हमें उनसे है वफा की उम्मीद’ : थियेटर को राज्याश्रयी नहीं लोकाश्रयी होना चाहिये – वामन केन्द्रे : ‘खुदाया! जज्बा -ए-दिल की मगर तासीर उलटी है’ की तर्ज पर मीडिया की चाहे जितनी भी आलोचना क्यों न की जाये, उसका सम्मोहन उतना ही अपनी ओर खींचता चला जाता है। यही वजह है कि थियेटर जो अपने आप में एक मीडिया है, यह चाहता है कि ‘स्थापित’ मीडिया के गलियारों में उसकी भी पूछ-परख बढ़े, अखबारों में ढंग की समीक्षायें छपें और चैनलों में नाटकों की चर्चा हो।

खबरफरोशी के इस दौर में जब सत्य की जय अंबानियों के पैसों से हो रही है, जब संपादक नाम की संस्था को धता बताकर पत्रकारिता के मापदण्ड अगरवाल तय कर रहे हों  और जब प्रति वर्ग सेमी  व प्रति सेकंड की दर से स्पेस और स्लॉट बेचे जा रहे हों और खरीदे हुए स्पेस में जब स्वयं के महिमा- मंडन का सिलसिला दूसरों की चरित्र हत्या तक जा पहुंचा हो तब रंगकर्मियों की यह ख्वाहिश ‘ हमें उनसे है वफा की उम्मीद’ की तरह बेहद मासूम है।

इसी मासूम ख्वाहिश के साथ कि मीडिया व रंगकर्म के अंतरसंबंध क्या हैं और दरअसल इन्हें क्या होना चाहिये, रायपुर के प्रेस -क्लब में मीडिया व रंगकर्म के कुछ स्थापित व चर्चित लोगों को बुलाया गया, जिनमें सुविख्यात मराठी निर्देशक वामन केन्द्रे (मुंबई), फिल्म अभिनेता व रंगकर्मी पियूष मिश्रा(मुंबई), नाट्य समीक्षक रवीन्द्र त्रिवाठी (दिल्ली) तथा रंगकर्मी व पत्रकार अरूण पाण्डेय (जबलपुर)  के नाम शामिल हैं। मौका था सुविख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर की तीसरी बरसी पर आयोजित नाट्य समारोह के दौरान एक गोष्ठी का। चर्चा की शुरूआत रायपुर इप्टा के संयोजक सुभाष मिश्र ने की। कहा कि हम पर यह आरोप लगता है कि हम केवल रंगकर्म करते हैं, विमर्श नहीं करते। यहां तक कि अपने लेखकों से भी किनारा किये हुए रहते हैं। इसलिए नाटकों के साथ -साथ बहस-मुबाहिसे की शुरूआत भी हम कर रहे हैं और इस बार की बहस का मुद्दा मीडिया व रंगकर्म के अंतरसंबंध हैं। संयोग से बड़ी पूंजी दोनों ही क्षेत्रों में आ रही है। बड़ी पूंजी के आगमन के साथ मीडिया के सरोकार व प्राथमिकतायें बदली हैं और क्या रंगकर्म भी यही रास्ता चुन रहा है?

फिल्म जगत में पीयूष मिश्रा की पहचान ‘मकबूल’ व ‘गुलाल’ जैसी फिल्मों से है। पीयूष ने वक्तव्य या भाषण जैसा कुछ नहीं रखा। अपनी रौ में बोले या यह कहना ज्यादा उचित होगा की उन्होंने अपनी भड़ास जैसी निकाली। थियेटर को लेकर स्वरों में कुछ तल्खी भी थी। वैसी ही तल्खी जैसी व्यायसायिक सिनेमा में जाने के बाद समांतर सिनेमा को लेकर नसीरूद्दीन शाह के बयानों में झलकती थी। कहा कि मैं 1983 में एन.एस.डी. से जुड़ा और 2003 में फिल्मों से। कोई 20 सालों तक जमकर थियेटर किया। अपनी मर्जी से किया। इसमें रोमांच भी था और रोमांस भी। सरकारी पैसा या ग्रांट नहीं ली। ठसन से किया। बहुत सारे ऐबों के साथ किया। खराब पुत्र, खराब पति और खराब पिता बनकर किया। (बधाई! बकौल राजेन्द्र यादव अच्छा पति, अच्छा पिता या अच्छा पुत्र कभी भी महान कलाकार या लेखक नहीं बन सकता!) फिर जब लगा कि इससे परिवार नहीं चल सकता तो पैसे कमाने के लिये फिल्मों चला गया। अच्छा या बुरा करने नहीं गया। मेरा भाग्य अच्छा था कि मुझे विशाल भारद्वाज व अनुराग कश्यप जैसे अच्छे और हमख्याल लोग मिल गये तो कुछ अच्छी फिल्में कर सका। नहीं मिलते तो बुरी फिल्में भी करता क्योंकि पैसे कमाने गया था।

पीयूष ने कहा कि उसे इस थियेटर के साथ कोई सहानुभूति नहीं है जो पेशेवर नहीं हो सकता। यहां प्रोड्यूसर का कोई कांसेप्ट ही नहीं है जो नाटकों पर खर्च करता है और फिर उसे वसूलने की उतनी ही चिंता भी। यहां थियेटर करने का मतलब है पार्ट टाइम थियेटर करना। लोग ताने मारते हैं कि ‘अच्छा! थियेटर तो करते हो पर ये बताओ कि काम क्या करते हो?’ जब तक यह थियेटर पेशेवर नहीं होता, उसका कोई भविष्य नहीं है।

इससे पूर्व गोष्ठी के प्रथम वक्ता, रंगकर्मी व पत्रकार अरूण पाण्डेय ने अपनी बात रंगकर्मियों की कुछ मांगों के संदर्भ में मीडिया द्वारा दबाव बनाये जाने के आग्रह के साथ रखी। उन्होंने कहा कि जिस तरह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तर्ज पर भोपाल में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय खोला गया, कुछ इसी तरह का काम छत्तीसगढ़ में भी होना चाहिये। उन्होंने याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ का एक हिस्सा हिंसा से प्रभावित है। पूर्वोत्तर में नाटकों व सांस्कृतिक गतिविधियों में केंद्र सरकार ने काफी पैसे खर्च किये हैं व वहां के युवाओं ने रंगकर्म से रोजगार हासिल किया है। यह काम छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि हबीब साहब कलाकर्म की जिन ऊंचाइयों पर पहुँचे वह आज के भौतिकवादी युग में किसी भी अन्य कलाकार के लिये संभव नहीं है। हबीब तनवीर की स्मृति में एक अत्याधुनिक प्रेक्षागृह या स्मारक बनाया जाना चाहिये और इसके लिये मीडिया द्वारा वैसा ही दबाव बनाया जाना चाहिये जैसे पुल, सड़क या दूसरी चीजों के लिये बनाया जाता है।

संचालन करते हुए इंदिरा कला व संगीत विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग से संबंद्ध डॉ. योगेन्द चौबे ने नाटकों में प्रयोग, मल्टीमीडिया का प्रयोग व खासतौर पर बड़े बजट के प्रयोगों के औचित्य पर सवाल उठाया। जाने-माने समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि प्रयोगों में बुरा कुछ भी नहीं, बशर्ते यह देखा जाये प्रयोग के पीछे की मंशा क्या है? जैसे समाज के दीगर क्षेत्रों में ईमानदारी व बेईमानी पैमाने के पैमाने हैं, वही पैमाने यहाँ भी लागू होते हैं। यह जरूरी नहीं कि हर नया प्रयोग अच्छी ही हो या खराब ही हो। उन्होंने यह भी कहा कि ‘यह जरूरी नहीं कि किसी संस्था के बनने से ही रंगकर्म सही दिशा में चला जायेगा। संस्थाओं पर अलग तरह के दबाव व प्रपंच होते हैं और हमें यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि हबीब साहब इस तरह कि किसी संस्था के बगैर भी रंगकर्म को इतनी ऊंचाइयों तक ले जा सके।’

मुख्य वक्ता वामन केन्द्रे ने छोटे-छोटे जमीनी उदाहरणों के साथ बहुत स्पष्टता से अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि मीडिया का आकार अब इतना वृहद हो चुका है कि उसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। ये एक ‘ड्रेगन इमेज’ है लेकिन पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र ने कोई 20 हजार बच्चों के बीच एक शोध किया और उस शोध का नतीजा यह था कि आज बच्चा जो भी ‘विजुअलाइज’ करता है वह जीवन, या प्रकृति या परिवेश से नहीं बल्कि टेलीविजन के माध्यम से। और विडंबना यह है कि पिछले 20 सालों में जो लोग रंगकर्म में या फिल्मों में अच्छा नहीं कर सके उन्हीं लोगों ने टीवी में हल्ला बोल दिया, जिनकी अपनी कोई दृष्टि नहीं है। उन्होंने कहा कि खासतौर पर अंग्रेजी मीडिया में क्षेत्रीय भाषाओं में जो कुछ भी होता है उसे दोयम दर्जे का माना जाता है और अंग्रेजी नाटकों पर आधे-आधे पन्ने खर्च किये जाते हैं जबकि न तो इनका कोई थियेटर है न कोई दर्शक वर्ग। इसी मीडिया में सामान्य लोग महान बन रहे हैं जबकि अच्छे लोग उपेक्षित हो रहे हैं और शायद पीयूष की वेदना यही है।

लेकिन यह समस्या हिंदी पट्टी की है, भाषाई थियेटर की नहीं और इसका कारण यह है कि महाराष्ट्र या बंगाल के लोग अपनी परंपरा को बेहद प्यार करते हैं। परंपराओं को खण्डित करने का काम हिंदी पट्टी में ज्यादा हुआ है। नाटकों की ही बात करें तो हिंदी के नाटककार प्रयोग की धुन में नये प्रयोगों को तो अपनाते हैं पर पिछले को भूल जाते हैं। इस तरह एक कड़ी टूटती है और कड़ियों के टूटने से परंपरा खण्डित होती है। नाटकों को लेकर मराठी समाज बेहद सतर्क है। मीडिया वालों के लिये नाटकों की चर्चा मजबूरी है क्योंकि वहाँ के लोग इतने सतर्क हैं कि जो अखबार नाटकों पर न लिखे उनका बहिष्कार कर देते हैं। यही बात थियेटर के पेशेवर होने को लेकर है। उन्होंने कहा कि आज महाराष्ट्र में उनके जैसे कम से कम 5000 लोग है जो थियेटर के सहारे ही गुजारा करते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि यही लोग फिल्मों में व टीवी में भी हैं। श्रीराम लागू का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘मैं थियेटर अपनी शर्तों पर करता हूं और फिल्में उनकी शर्तों पर।

वामन ने कहा कि यही उदाहरण बंगाल का भी दिया जा सकता है। वहां के लोग थियेटर के प्रभाव पर इतने सजग हैं कि आज भी यदि महज पाँच रूपये टिकिट बढ़ानी हो तो उस साल पर चर्चा करते हैं। अखबारों में पत्र लिखे जाते हैं। नाटक करने वालों के बीच चर्चा की जाती है और तब कहीं टिकिट के दाम बढ़ते हैं व उसी अनुपात में अन्य लोगों के पारिश्रमिक। इसलिये हिंदी थियेटर को पेशेवर होना है तो इसकी शुरूआत भी हिंदी पट्टी से ही होनी है और हबीब तनवीर ने यह करके दिखाया है। थियेटर को पेशेवर बनाने के लिये क्रियेटिव मार्केटिंग की जरूरत है। क्रियेटिव मार्केटिंग के साथ-साथ क्वालिटी थियेटर की भी आवश्यकता है। नाटकों की गुणवत्ता के लिये आपको सजग रहना है व यह भी ध्यान रखना है कि थियेटर राज्याश्रयी नहीं बल्कि लोकाश्रयी हो।

रहा सवाल मीडिया का तो वह केवल इंवेट की कवरेज करता है। नाटकों में अगर-अगर एक-एक करोड़ रूपये लग रहे हैं तो यह इसी का नतीजा है कि उसे भी एक इवेंट बनाया जाये। या इसमें विवाद उत्पन्न किया जाये, मेनुपलेशन किया जाये। आप अपने नाटक को पापुलर करना चाहते हैं तो अपने ही नाटक का विरोध करवा दें, देखें कि मीडिया के लोग कैसे टूट पड़ते हैं। राखी सावंत वगैरह के नाम इन्हीं संदर्भों में लिये जा सकते हैं। अंग्रेजी मीडिया और दिल्ली के संस्थानों की तवज्जो भारत के नहीं बल्कि इंडिया के थियेटर पर है। एक ऐसा थियेटर जो अपनी मिट्टी, अपनी बू, अपने टैक्सचर से कटा हुआ है और नाट्य संस्थानों का काम थियेटर करने वालों को अपनी जमीन से जोड़ने का नहीं बल्कि काटने का रह गया है। इसलिये नये नाट्य संस्थान न हीं खुलें तो अच्छा है, बल्कि जो हैं उन्हें ही बचा लिया जाये।

हिंदी में नाट्य-लेखन के अभाव पर वामन ने दो बाते कहीं। पहली तो यह कि ‘‘ यह समस्या अब सिर्फ लेखकों की नहीं रह गयी है। हर वो व्यक्ति जो विचार करता है या सृजन करता है, चाहे वह लेखक हो, कवि हो या चित्रकार हो इस समस्या से पीड़ित है कि मीडिया के  विस्तार ने उसकी कल्पनाशीलता के सारे आयाम अवरूद्ध कर दिये हैं। प्रिंस की घटना का उदाहरण लें। मीडिया ने इसके हर प्रसंग को, हर पहलू को इतने एंगल के साथ दिखाया कि किसी कवि या लेखक के लिये कल्पना की कोई गुंजाइश बचती ही कहाँ है? दूसरी बात यह कि नाट्य लेखन तभी होगा जब थियेटर पेशेवर होगा। जैसे नाटक मंडली में निर्देशक होते हैं, अभिनेता होते हैं, कलाकार होते हैं वैसे ही नाटक मंडली के साथ लेखक को भी रहना होगा। विजय तेंदुलकर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वे इतने प्रोफेशनल थे कि जैसे एक बाबू अपने काम के लिये दस बजे अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है, वैसे ही वे भी नाटक लिखने के लिये दस बजे अपनी कुर्सी पर बैठ जाते थे और एक ही नाटक की कथा कई -कई बार लिखते थे।

गोष्ठी के अंत में कुछ सवाल-जवाब भी हुए। एक श्रोता ने अपने ही सवाल को ऊल-जलूल करार देते हुए पूछा कि क्या आई.पी.एल. की तर्ज पर फिल्मी कलाकार थियेटर को स्पांसर नहीं कर सकते? वामन व पीयूष इस सवाल पर केवल मुस्कुराकर रह गये।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क  [email protected] के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग इप्‍टानामा से साभार लिया गया है.


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