Kumar Sauvir : अपने सरकारी मकान में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब पत्रकारों पर गुर्रा रहे थे, तो वहां उप्र मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति के आला पदाधिकारी भी तो मौजूद थे। फिर इन लोगों ने अखिलेश के इस व्यवहार पर आवाज क्यों नहीं उठायी? यह लोग अगर अपनी दाढ़ी का एक बाल तक मरोड़ देते तो पत्रकार-एकता का प्रतीकात्मक भू-शिलान्यास हो जाता। है कि नहीं?
Sandeep Verma जो पत्रकार आम जनता के दुखदर्द के लिए अपनी दाढ़ी का बाल छूने की भी कोशिश नही करते उनसे अपनी बिरादरी के लिए कही का भी बाल उमेठने को कहना सरासर नाईंसाफी है महाराज.
Sheetal P Singh तुम चाहते हो कि बाल की खाल ज़रूर निकले । लखनऊ के पत्रकार एक ज़माने से अपने मुख्यमंत्री का लिहाज़ करते आये हैं, वे केजरीवाल को गरियाते हैं जयललिता पर post लिखते हैं लालू पर चुटकुले , मजाल है कि लखनऊ की गद्दी की ओर भर नज़र देख लें। तुम करते रहो औघड़ई बाल…….।
Anil Kumar Upadhyaya Jinke liye patrkarita sirf chatukarikta , naukri ho , kuch logo ke aage dum hilaane ki aadat ho unko wakt aane par hi apni asli aukaat yaad aati hai. 1995 – 1996 me jab dainik Jagran me rahte hue akele hi jyadatar crime riporting ki thi tab baaki logo se koi samjhauta nahi kiya tha. Negetiv bante samay tak ki khabar deta tha. Vishnumohan ajeet bajpai Rakesh Surendr singh Sab jaldi ghar jaana chahte the. But mujhko aakhiri khabar tak ka intjaar achcha lagta tha. Ab? Kaun hai patrkaar ya dalaal ye samajhna mushkil ho jaata hai. Kumar bhai aapka bhi time yaad hai mujhe. Shobhit Mishra aur sanjeev ( tab Sahara ) ne hi is baat par meri taareef ki thi. Tab ke mere samvaad sutr to aaj sthaneey sampadak ho Gaye.
Shailendra Srivastava gairat hoti tb to aisa kuch karte juban ka test bigarh chuka hai,virodh karenge to …..
Rajeev Gupta सौबीर भईया अब जितने भी चाटुकार थे वो हो गये पत्रकार वो दूसरे की दाढ़ी मुँछ तो उखाड़ ही नहीं सकते,अपना ही उखाड़ना पड़ेगा नहीं तो पब्लिक इनका सबकुछ उखाड़ लेगी ।
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.
सीएम ने कैसे किया पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार… देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें..
http://www.youtube.com/watch?v=FQf6hv7CX0U
MONIKA RAJPOOT : मामला मुजफ्फरनगर का नहीं, कुछ और प्रतीत होता है, अखिलेश के गुस्से से। स्थान- मुख्यमंत्री आवास। सारे मठाधीस पत्रकार मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद थे। सीएम साहब के बोलने के कुछ देर बाद पत्रकारों की और से सवाल होने लगे। तभी एनडीटीवी के पत्रकार अनंत झनाने ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुजफ्फरनगर पर सवाल पूछा। पता नहीं अचानक सीएम साहब क्यों फूट पड़े एनडीटीवी वालों पर। सीधे तौर पर उन्होंने एनडीटीवी के पत्रकार अनंत झनाने से कहा कि– ''आपसे तो कोई बात ही नहीं करनी है, चलो हो गया जाओ… ह्ह्ह, तुम आगे कहां से आ गए। अब जाओ पीछे खड़े रहो, वहीं अच्छे लग रहे हो… जाओ उधर, पीछे अच्छे लग रहे हो, जहां खड़े हुए… मैंने जवाब दे दिया, अब नहीं बोलूँगा…. पीछे चलिए, पीछे चलिए पीछे वहाँ खड़े थे, आप अच्छे लग रहे थे वहां से।''
मख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस कथन से सारे पत्रकार हैरत में थे, लेकिन किसी ने भी एनडीटीवी के पत्रकार अनंत झनाने का बचाव नहीं किया और न ही सीएम की प्रेसकांफ्रेंस का विरोध/बहिष्कार। सच में ऐसे रवैये से मामला मुज्जफरनगर का नहीं कुछ और ही प्रतीत होता है। सीएम आवास पर मौजूद पत्रकार पीसी ख़त्म होने के बाद खाने में भी नहीं चूके, एक बार जानवर को भी दुत्कार के भगा दीजिये, तो वह भी आसपास नहीं भटकता, लेकिन लखनऊ के पत्रकार पता नहीं क्या चाहते। चाय नाश्ते के दौरान कुछ पत्रकारों ने दबी जुबान से सीएम के रवैये पर जो तर्क दिया वह और भी ठेस पहुंचाता है। पूरे मामले को दलाली से जोड़कर देखा जा रहा है। अब अंदर की बात पता नहीं क्या है लेकिन यह सच है कि मामला मुजफ्फरनगर का नहीं बल्कि कुछ और है। भरी महफ़िल में इस तरह किसी पत्रकार की बेइज्जती वो भी मुख्यमंत्री द्वारा पहली बार देखी गयी है। इस ख़ास मौके पर एनडीटीवी के कमाल खान भी मौजूद थे जिस पर कुछ पत्रकारों और अधिकारीयों का कहना था कि मुख्यमंत्री की भड़ास उन दलाल पत्रकारों को लेकर थी जो रोज किसी न किसी चीज़ को लेकर पैरवी करते हैं।
मोनिका राजपूत द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
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