Utkarsh Sinha : कँवल भारती के केस ने दिखा दिया है कि प्रशासनिक अधिकारी अपने नंबर बढ़ाने की चाटुकारिता के लिए किस हद तक जा सकते है.. संविधान के मूल को भी ये किनारे रख देते हैं.. वैसे भी अभिव्यक्ति के खतरे बढते जा रहे हैं. लगाओ नारा और जोर से… "बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे"….
वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट उत्कर्ष सिन्हा के वॉल से.






