8 अप्रैल को अमर उजाला, कानपुर में एक खबर छपी थी, फेंकी गई नवजात बच्ची को नोचकर खा गये कुत्ते। विचलित कर देने वाली तस्वीरों से अखबार का पहला पन्ना पटा पड़ा था। तस्वीरें देखकर हर किसी का दिल दहल जाये। नीचे इन तस्वीरों को खींचने वीले फोटोग्राफर को नाम भी छपा था। खबर लिखने वाले ने वहां मौजूद पुलिसकर्मियों और आमजनों की संवेदनहीनता को खूब कोसा। एक अस्पताल के सामने नवजात बच्ची को फेंक दिया गया, वहां से गुजरने वाले किसी भी शख्स ने उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की जहमत नहीं उठाई।
फोटोग्राफर ने हर प्रकार से उसकी तस्वीरें ली। सड़क पर पड़े रहने से लेकर कुत्ते का उसे नोंचकर खाने तक की तस्वीर खींची गई। पर सवाल यह है कि तस्वीरें खींचकर दूसरों को कोसने वाले इस फोटोग्राफर की इंसनियत उस समय कहां चली गई थी। वह चाहता तो बच्ची को सुरक्षित सथान पर पहुंचा सकता था, जिससे शायद वह नवजात बच्ची कुत्तों का भोजन बनने से बच जाती। लेकिन उसकी पहली प्राथमिकता तस्वीरें खींचकर पुलिस और प्रशासन की लापरवाही दिखाना था न कि उस मरती हुई बच्ची की जान बचाना। क्या होता अगर वह तस्वीर न लेता, बस इतना कि अगले दिन यह खबर न छपती लेकिन सड़क किनारे फेंकी गई वह बच्ची तो बच जाती। फोटोग्राफर चाहता तो पुलिस में इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा सकता था, लेकिन वह भी मात्र एक मूकदर्शक बन तस्वीरें ही लेता रहा।
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, मगर बात जब इंसानियत का फर्ज निभाने की आती है तो क्यों अखबारों और टीवी न्यूज चैनलों में सिर्फ दूसरों को कोसा जाता है। जरूरत पड़ने पर वह खुद आगे आकर गलत को रोकते क्यों नहीं??? मेरी उस फोटोग्राफर से कोई दुश्मनी नहीं है पर तस्वीर पे नजर पड़ते ही पहली बात यही मन में आई कि वह चाहता तो उसे कुत्तों के मुंह में जाने से बचा सकता था। वह चाहता तो बच्ची अपनी आखों से इस दुनिया को देख सकती थी। वह चहता तो बच्ची की जान बच सकती थी। अगर वह चाहता तो…!
सुप्रिया श्रीवास्तव
प़त्रकार
कानपुर






