जागरण नोएडा से देर शाम खबर मिली कि निशिकांत जी रिटायर हो गए। खबर पक्की की खुद निशिकांत जी ने। यानी, सचमुच निशिकांत जी के बगैर अब जागरण निकलेगा। कैसा लग रहा होगा निशिकांत जी को। 35 साल। 35 साल में दिल्ली में प्रकाशक की हैसियत से करीब 24 साल तक काम करने वाले पुरुष।
निशिकांत जी को मैंने जाना 1999 में। जालंधर में। मुझे एक तरीके से खींच कर ले गए थे-अमर उजाला से जागरण। एक अजीब इज्जत मेरे मन में थी उनके प्रति। यह स्वतः थी। वह जागरण के महाप्रबंधक, प्रकाशक-मुद्रक के साथ-साथ स्थानीय संपादक भी थे। उन्हें दृष्टिकोण लिखने के लिए मैंने प्रेरित किया था। पहले उनका लिखा दृष्टिकोण पंजाब पेज पर पांच कालम में बाक्स छपता था। बड़े-बड़े लोग दावा कर सकते हैं कि दृष्टिकोण लिखने के लिए उन्होंने प्रेरित किया। करने दो। यह निशिकांत जी को मालूम होगा कि किसने किया। मैंने यह जिक्र इसलिए किया क्योंकि उनकी इस तड़प को मैंने बखूबी समझा था। मैं उन क्षणों को कैसे भूल सकता हूं जब तमाम दिग्गजों के होते हुए जालंधर स्थित अपने मकान पर (सरस्वती विहार में) उन्होंने तब तक केक नहीं काटा, जब तक यह नाचीज नहीं पहुंचा। दरअसल, उसी दिन से जागरण में मेरे खिलाफ मुहिम शुरू हुई। उस मुहिम को शुरू करने वाला बंदा आज जागरण में एक स्टेट का राजा है।
निशिकांत जी ने सभी को दिल खोल कर दुआएं दी। कई लोगों ने उनके नाम का बेजा इस्तेमाल किया। इन लोगों को अब विष्णु त्रिपाठी ने अपनी औकात दिखा दी है। 99 फीसद तो गए। जो बचे हैं, वो भी आज-कल में जाएंगे।
निशिकांत जी ने बिहार के कई लोगों को नौकरी दी। हजार से ज्यादा लोग होंगे। लोग कहते हैं कि जागरण में बिहारियों का राज है। ऐसा नहीं है। मेहनतकश लोगों को नौकरी दी गई। बाद में लोग बदले। ठेका-पट्टा, जागरण के नाम का मिसयूज। रंगबाजी। पैसा। लोगों ने बहुत पैसे कमाए। तो क्या इसके लिए निशिकांत जी दोषी कहलाएंगे। अगर ऐसा है तो फिर संजय गुप्ता भी दोषी हुए। दरअसल, दोषी कोई नहीं। दोषी आदमी का कर्म होता है।
जागरण के विकास में निशिकांत जी की भूमिका सबसे खास रही है। जैसा उनमें लीडरशिप का गुण है, शायद ही जागरण के किसी और बंदे में होगा।
एक बार बाईपास सर्जरी से गुजरने के बाद मैं उनसे मिलने के लिए उनके मकान पर गया। पूछा-कैसा लग रहा है? जवाब दिया-कल से आफिस ज्वाइन कर रहा हूं। घर में बैठे-बैठे बोर हो गया हूं। इस spirit के लोग ही निशिकांत ठाकुर कहलाते हैं और हां, निशिकांत ठाकुर कभी रिटायर नहीं होते।
लेखक आनंद सिंह गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. आनंद दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में विभिन्न शहरों में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं.
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