Pankaj Mishra : जब देता है तो छप्पर फाड़कर और जब लेता है तो जमीन में गड्ढा खोदकर ले भी लेता है। पहले अपनी बात। मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी की पत्नी को बच्चा होना था। चूंकि वे कुछ समय पहले ही बरेली में रहने आए थे, सो ज्यादा जानकारी नहीं थी। अन्य साथियों से जानकारी की तो पता चला कि फलां अस्पताल बहुत अच्छा है। साथ ही यह भी बताया कि हालांकि खर्चा ज्यादा आ जाएगा। लेकिन उनके यहां तो खुशी आने वाली थी, इसलिए खर्च की ज्यादा फिक्र उन्हें नहीं थी। यह तो खैर बच्चा होने की बात थी। उनकी खासियत यह थी कि खर्च में कभी पीछे नहीं रहे। पैसे कम हों या ज्यादा, खर्च करना है तो करना ही है।
कई बार तो ऐसा लगता था कि वे घर फूंक तमाशा देख रहे हैं। बहरहाल, उन्होंने पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराया और भली प्रकार से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हुई। जब पता किया गया कि बिल कितना आया है तो जिसने भी सुना आंखें और मुंह दोनों खुले रह गए। बिल था 50 हजार रुपए का। पिछले 10-12 सालों में पत्रकारों की तनख्वाह में खासी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इतनी भी नहीं कि 50 हजार की उनके लिए कोई कीमत ही न हो। एक अन्य साथी से कहा गया कि कुछ कम करा दीजिए। पैरवी की गई तो सिर्फ 1200 रुपए कम कर दिए गए। अब 50 हजार में से अगर 1200 रुपए कम कर दिए जाएं तो कितना फीसद हुआ यह आप खुद ही जोड़ लीजिए। मुझे तो हिसाब लगाने में शर्म आ रही है।
मैं जिस अस्पताल की बात कर रहा हूं वह है गंगाशील अस्पलात, बरेली। हालांकि आज की तारीख में इसका रजिस्ट्रेशन निरस्त किया जा चुका है और अस्पताल प्रबंधन भयंकर संकट के दौर से गुजर रहा है। इसलिए आप चाहें तो ‘वह था गंगाशील अस्पलात, बरेली भी कह सकते हैं’। अब अस्पताल का भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। यह वही अस्पताल है, जिसका उदय अब से करीब छह साल पहले एक धु्रव तारे की मानिंद हुआ था। इतना प्रकाश कि हर कोई चकाचौध और हतप्रभ। चकाचौध ऐसी कि बरेली मंडल और रुहेलखण्ड इसके सामने क्या बेचते। दूर-दूर से लोग यहां आते रहे। लेकिन, सिर्फ एक गलती ने उसे कहां से कहां पहुंचा दिया। आपने स्वयं कोई अपराध नहीं किया, लेकिन आपने अपराध को छिपाया, और आरोपियों का साथ दिया, यह क्या अपराध से कम है। करीब 100 करोड़ की लागत से बना अस्पताल आज की तारीख में मिट्टी में मिल गया।
गैंगरेप के मामले में पूरे शहर में जबरदस्त आक्रोश है। यहां के एक विधायकजी भी अस्पताल प्रबंधन का पक्ष ले रहे थे, क्योंकि वह भी पेशे से डाक्टर ही हैं, तो यहां की महिलाओं ने उन्हें चूड़ियां भेंट कर दीं। तब कहीं जाकर उन्हें इस बात का भान हुआ कि वे डाक्टर भले पहले बने हों, लेकिन जनप्रतिनिधि पहले हैं। और जन का प्रतिनिधित्व ऐसे नहीं किया जाता। जनता की भावनाओं को उनकी आकांक्षाओं को समझना होता है और उसी के अनुरूप आचरण भी करना होता है। बाद में डाक्टर उर्फ विधायकजी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और पीड़िता की हरसंभव मदद का वायदा भी किया। यही नहीं वे बाकायदा पीड़ित लड़की से मिलने भी गए। आज स्थिति यह है कि मामले के एक आरोपी ने सरेंडर कर दिया है, लेकिन शहर के जागरूक लोग फिलवक्त चुप होने वाले नहीं। प्रदर्शन लगातार जारी हैं।
मैं अक्सर सोचता था कि दिल्ली में एक लड़की से रेप होता है तो वह लोगों और मीडिया के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है, लेकिन रेप तो हर जगह हो रहे हैं। इन्हें क्यों बड़े स्तर पर नहीं उछाला जाता। क्यों नहीं लोग इन लड़कियों के लिए बाहर निकलते। लेकिन बरेली की मीडिया ही नहीं लोगों ने भी इस घटना का विरोध किया उसने मेरी चिंता दूर कर दी। अब लगता है कि जब भी कहीं कुछ गलत और बुरा होगा, लोग बाहर निकलेंगे और अपनी बात सामने रखेंगे। यही नहीं मीडिया भी आगे आकर उनका नेतृत्व करेगा। बाजारवाद अपनी जगह है, लेकिन जनमानस का ख्याल रखना उसका पहला धर्म और कर्तव्य है। अखबार खबरों के लिए खरीदा और पढ़ा जाता है। विज्ञापन सहयोगी की भूमिका निभाता है। छोटा हो या बड़ा, बरेली के सभी अखबारों ने इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया। कुल मिलाकर यह एक अच्छा संकेत है। दुष्कर्मियों और कुकर्मियों के खिलाफ सब एकजुट हो जाएं तभी यह लड़ाई जीती जा सकती है।
पत्रकार पंकज मिश्रा के फेसबुक वॉल से.






