अजमेर में दैनिक भास्कर में कार्यरत एक पत्रकार रविंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री को लंबी चिट्ठी लिखी है. इस चिट्ठी के जरिए उन्होंने अजमेर के लूततंत्र का खुलासा किया है. कई घटनाएं बताई हैं, कई सवाल किए हैं. सिस्टम की मिलीभगत से की जा रही लूट के बारे में बताया है. उन्होंने चिट्ठी की प्रति कई लोगों को भेजी है. पत्र में उन्होंने खुद को दी जाने वाली धमकियों के भी बारे में बताया है और जान-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई है. पूरा पत्र इस प्रकार है-
माननीय प्रधानमंत्री जी
भारत सरकार
पुलिस और भू-माफियाओं ने जमीन के लिए रची सांप्रदायिक साजिश.. पुलिस चार दिन से है क्यों है मौन?
सदियों से जर, जोरू और जमीन का झगड़ा चलता आया है मगर आज के दौर में अजमेर में उसका जो भयावह चेहरा जमीन संबंधी कई जघन्य अपराधों से लगातार सामने आ रहा है वह भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। इससे बड़ा खतरे का संकेत जवाहर की नाड़ी क्षेत्र से स्थित थोक मालियान खसरे, रीको और यूआईटी की जमीन पर 11 दिसंबर के बाद से झूठे ही ‘मजार का नाटक’ रचने से सामने आया है। इसमें रामगंज थाना प्रभारी राजेंद्र त्यागी, एएसआई ताज मोहम्मद और अभी पिछले दिनों पुलिस सेवा चिह्न प्राप्त सिपाही अयूब की सांठगांठ साफ जाहिर है मगर जिले के रक्षक एसपी और कलेक्टर ने चार दिन बीतने के बावजूद मौका देखना तक मुनासिब नहीं समझा है ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो सके। चूंकि सरकारें और आम नागरिक मुस्लिम धार्मिक मामलों में बोलने से परहेज करते हैं। ऐसा ही एक खेल अजमेर में खेला जा रहा है। चूंकि मैं स्वयं वर्ष 1997 से मीडिया से सौ फीसदी ईमानदारी से जुड़ा हूं, राजस्थान में दैनिक भास्कर, नवज्योति राजस्थान पत्रिका में सेवाएं दे चुका हूं। राज्य के अनेक पत्रकार मुझे बेहतर तरीके से जानते हैं।
मेरी खबर पर भीलवाड़ा जिले में विधायक रतनलाल तांबी के पुत्र नरेंद्र महाजन को फर्जी तरीके से 10 बीघा जमीन आवंटित करने के मामले में शिविर लगाकर खुली जांच तक कराई गई थी। एक पत्रकार श्यामसुंदर पर हमला भी किया गया था। उस समय मैं दैनिक नवज्योति का ब्यूरो चीफ था। मेरे कार्यकाल में यह मामला कई दिन तक छपा। इसी तरह किशनगढ़ में राजस्थान पत्रिका में 2005 में ब्यूरो चीफ रहते हुए एक उप पंजीयक रामावतार गुर्जर ने सुमेर क्लब जैसी सार्वजनिक और खेलकूद के काम आने वाले मैदान पर 19 साल 11 महीने की लीज बना दी। मेरी बाईलाइन खबर पर यह निर्माण रुका और आज तक दुबारा शुरू नहीं हो सका। साथ ही अजमेर के तत्कालीन एसपी श्रीनिवास राव की ओर से मदनगंज थाना प्रभारी रहे सेठाराम बंजारा द्वारा मार्बल मंडी से मार्बल मंडी से मुफ्त मार्बल उठाने का मामला भी मैंने वर्ष 2005 में उजागर किया था। इसमें अजमेर पुलिस ने मेरी ईमानदारी तक की जांच कराई थी मगर मैं सही था इसलिए कुछ नहीं हुआ।
राजस्थान में बड़े बिल्डर और कंपनियों से लेकर तेजी से उभर कर आए चंद ‘दलालों’ का गठबंधन पिछले सालों में इस तेजी से फैला है कि आम आदमी के लिए तो कहीं छोटा सा आशियाना बनाने के लिए सस्ती जमीन बची ही नहीं है। बड़ी जमीनों के रिकार्ड भले ही आम आदमी को नसीब नहीं, मगर बड़े सौदागरों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। राजस्थान जैसा ईमानदार प्रदेश एक दिन इस तरह लूट-खसोट का अड्डा बनेगा, यह किसी ने भी नहीं सोचा था। यह बात इसलिए भी दीगर है कि किशनगढ़ विधायक नाथूराम सिनोदिया के पुत्र भंवर की हत्या क्या राजनैतिक और भू-माफिया गठजोड़ की आपसी लड़ाई का नतीजा नहीं है? एक विधायक पुत्र की हत्या के बावजूद राजस्थान विधानसभा में कोई उबाल तक नहीं आया? ‘सरकार जांच कर रही है’ का सरकारी जुमला सुनाया जा रहा है। नासिक में एक एडीएम को जिंदा जलाना भी पुलिस और माफिया के गठजोड़ का नतीजा ही तो था, फिर राजस्थान में आए दिन जमीनों के घोटालों की बढ़ती तादात से सरकार ने सबक क्यों नहीं लिए। विधायक पुत्र की हत्या और इस मामले के गवाहों को मारने की साजिश भी खुली। एसओजी ने जांच भी की।
जल संसाधन मंत्री रहे महिपाल मदेरणा के चरित्र से सरकार को मंत्रिमंडल का पूरा चेहरा ही बदलना पड़ा। इन सब घटनाओं से आम आदमी में एक ‘अज्ञात भयावह चेहरे’ का खौफ भी है और अजमेर के भविष्य की चिंता भी। 44 बीघा जमीन जो हत्या का कारण बनी; उसका नामांतरण एक दिन में खुल जाना, एक खास अपराधी को खुद जेल अधीक्षक द्वारा विशेषाधिकार का प्रयोग कर पेरोल दे देना। भंवर सिनोदिया हत्याकांड के गवाहों को मारने की साजिश में प्रयुक्त वाहन पर ‘पुलिस का स्टीकर’ लगा होना। अजमेर में जयपुर रोड पर पुलिस अधिकारी नरेंद्र शेखावत का गार्डन रेस्टोरेंट चलना (जहां अय्याशी के लिए अटैच लैट-बाथ सहित कमरे तक बने हैं)। नए नियमों के मुताबिक चंदवरदाई नगर में श्री गार्डन में रामगंज थाने में तैनात रहे पुलिस अधिकारियों की भू-माफियाओं से पार्टनरशिप। अजमेर के डिप्टी सुरेंद्र सिंह भाटी और तत्कालीन एसपी एस. सेंगाथिर की जुगलबंदी से भाटी का डेयरी खोल लेना भी इसी कड़ी का एक सिलसिला है। इससे भू-माफिया और पुलिस अफसरशाही की तो जेब भर रही है मगर फैसलों में देरी से सरकार की राजस्व संपत्तियां अजमेर में लगातार घट रही हैं। विकास बाधित हो रहे हैं। क्या अजमेर सिर्फ पुलिस अफसरों के जेब भरने की जगह बनकर रह गया है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अखबार भी इन भू-माफियाओं के खिलाफ सच्ची आवाज नहीं उठा पा रहा है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो इन भू-माफियाओं और पुलिस से मैनेज हो रहे हैं। सरकार ने आईपीएस और आरपीएस की संपत्तियों की घोषणा करवा ली मगर कमाई का प्रमुख सोर्स तो थाना प्रभारी और अन्य अधिकारी होते हैं। इनकी संपत्ति का ब्यौरा भी राजस्थान पुलिस की वेबसाइट पर तुरंत सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
गंभीर पहलुओं की बात करें तो पुलिस अजमेर यूआईटी ने पिछले सालों में ऐसे काम किए हैं कि जो भू-माफिया कब्रिस्तान की जमीन बेच गए वही आज अपने पूर्वजों का हवाला देकर मजार या हथाई का झूठा ड्रामा रच रहे हैं। दैनिक भास्कर सहित अन्य अखबारों में जब यह मामला उजागर हुआ तो भू-माफियाओं ने खुद ही निर्माण पर जेसीबी चलाकर कब्रिस्तान भूमि पर सबूत मिटाए। यूआईटी की सूची में चिह्नित भू-माफिया अलादीन चीता, देश सेवा के लिए फौज में सेवा दे चुका उसका भाई रुस्तम अली चीता और खुद कांग्रेस सरकार में लोकसभा यूथ महासचिव बने बैठे अलादीन के पुत्र वाजिद चीता ने परदे के पीछे से जवाहर की नाड़ी से सटी जमीन पर कब्जा करने के लिए सांप्रदायिक रंग देने का नाटक रच दिया। इनके फोन कॉल से यह सब मामला साफ हो जाएगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसमें रामगंज थाने के एएसआई ताज मोहम्मद ने खुद इस नाटक को ऑपरेट किया। जबकि ताज मोहम्मद को दरगाह थाना क्षेत्र में सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने पर डिप्टी जय सिंह राठौड़ खुद हटा चुके हैं। अब वही ताज मोहम्मद सोमलपुर निवासी खान बहादुर चीता, अलादीन प्लंबर, सुलेमान, हंसराज पाल, जवाहर की नाड़ी निवासी ठेकेदार प्रेम रैगर आदि के साथ मिलकर अवाप्ति कार्रवाइयों में अफसरों द्वारा अटकाई गई सरकारी जमीनों पर खुद कब्जा करवा रहा है, वह भी खुले आम।
पिछले 11 दिसंबर को जवाहर की नाड़ी विकास समिति के पदाधिकारी कांग्रेस पार्षद ललित गुर्जर के साथ क्षेत्र में विधायक कोष से बन रही सडक़ का जायजा ले रहे थे तो मौके पर आकर कुछ भू-माफिया उलझ पड़े। थाना प्रभारी राजेंद्र त्यागी मय दल के मौके पर आए मगर भू-माफियाओं से उनकी जमीन का रिकार्ड पूछने के बजाय कार्रवाई का नाटक करते रहे। वे बिना किसी कार्रवाई के लौट गए। इसके बाद खुलेआम एएसआई ताज मोहम्मद खुद भू-माफिया खान बहादुर के पास आ गए। विडंबना यह रही कि ताज मोहम्मद ने किसी क्षेत्रवासी से बात तक नहीं की। इसी क्षेत्र में पंजाब केसरी के पत्रकार रोहिताश गुर्जर, दैनिक भास्कर के सीनियर सब एडिटर रविंद्र सिंह भी रहते हैं, जो खुद पदाधिकारियों के साथ थे। इन भू-माफियाओं के चेहरे पर खौफ तक नहीं था। उल्टे वे जनता के चुने हुए कांग्रेस पार्षद ललित गुर्जर को धमकाने लगे। इस मामले में सभी अखबारों ने खबरें छापीं। जिस दिन समिति पदाधिकारी और पार्षद निरीक्षण कर रहे थे तो उस दिन वहां कोई मजार या हथाई की बात तक नहीं की गई और न ही मौके पर कोई चादर थी। पिछले सालों के रेवेन्यू रिकार्ड पर भी किसी मजार या हथाई का जिक्र तक नहीं है। फिर रातोंरात सांप्रदायिक रंग देने के लिए इन भू-माफियाओं ने सरे आम दिन में पिछले 23 साल से रह रहे बुजुर्ग प्रेम कुमार गोस्वामी के मकान के पिछवाड़े एक नई चादर बबूलों पर डाल दी। (गोस्वामी के मकान का वर्ष 1989 में नियमन भी हो चुका है)।
इस मामले में पंजाब केसरी में कार्यरत पहले से विवादित रहे दो मुस्लिम पत्रकारों नवाब हिदायतुल्ला और रहमान खान को भू-माफियाओं ने मोबाइल पर संपर्क कर प्रायोजित खबर लिखवाई और वह छप भी गई मगर किसी मीडिया ने चीताओं के खौफ से मौके पर आकर जांच तक नहीं की। इससे मामले को भू-माफिया के इशारे पर सांप्रदायिक रंग देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। जबकि राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर और नवज्योति में सही खबरें छप रही हैं। जिस दिन भू-माफिया चादर डालने का ड्रामा रच रहे थे तो समिति पदाधिकारियों की क्षेत्र में बैठक चल रही थी। मैंने स्वयं मोबाइल नंबर 96729-87958 से समिति सदस्यों के सामने रामगंज थाना प्रभारी राजेंद्र त्यागी को फोन किया तो उनका जवाब था कि रविन्द्र जी आप जो चाहे छापते रहिए मगर उन्होंने मौका देखना तक मुनासिब नहीं समझा। (कागजों में जांचा हो तो पता नहीं)। पिछले 15 साल से ईमानदारी से संपादकीय दायित्व निभाने वाले सीनियर सब एडिटर को सीआई साहब ने टका सा जवाब दे दिया। क्या अजमेर पुलिस की भूमिका यहां सही है?
जो सही अफसर थे उनका करा दिया तबादला
सभी सरकारें पारदर्शिता का दावा करती हैं मगर पारदर्शिता से काम करने वाले अफसर भू-माफिया के इशारे पर कैसे ट्रांसफर होते हैं, इसकी भी बानगी देखिए— रामगंज थाने में तैनात रहे थाना प्रभारी मनोज गुप्ता और एएसआई नरोत्तम सिंह ने अजयनगर स्थित खसरा संख्या 5501 और 5478 की जमीनों के मामले में भू-माफिया अलादीन, रुस्तम, और वाजिद के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई की थी कि वे थाने के सामने से गुजरने की हिम्मत तक नहीं कर पाते थे। आज ठीक इसके विपरीत रामगंज थाने पर लगी प्याऊ पर यूआईटी में चिहिनत रहे भू-माफिया अलादीन का नाम लगा है। वाजिद चीता अपनी जीप पर लाल पट्टी लगाकर सरकारी अधिकारी जैसे घूमता है। क्या सरकार और पुलिस जनता को यह संदेश देना चाहती है कि भू-माफिया ही थानों का खर्चा उठा सकते हैं। पुलिस में बजट की क्या कमी है? 11 दिसंबर की घटना से लेकर कथित मजार वाले सभी फोटो को देखने से ही पता चल जाएगा कि डिप्टी बनने की कतार में सबसे सीनियर माने जाने वाले थाना प्रभारी राजेंद्र त्यागी जनता के प्रति कितने सजग रहे हैं। क्षेत्रवासियों का दबी जुबान में कहना है कि एएसआई ताज मोहम्मद ने 600 गज के प्लाट पर कब्जा कर रखा है। अजमेर के बेहतर एसपी हरिप्रसाद शर्मा ने भू-माफियाओं का सूत्रधार बने रामगंज थाने के सिपाही धन्ना सिंह रावत को लाइन भेजकर बाकायदा पाबंद किया था कि इस सिपाही की पोस्टिंग रामगंज थाने पर नहीं की जाए।
धारा 4 के नोटिस के ‘फर्जी रजिस्ट्री और शून्य हो चुकी पॉवर ऑफ अटार्नी’ से यूआईटी प्रशासन की ‘अवाप्ति में ढिलाई’ का फायदा अजमेर के भू-माफियाओं को जमकर पहुंचाया जा रहा है। भू-माफिया अजमेर में अपनी खाल बचाने के लिए मुख्यमंत्री के पुत्र वैभव गहलोत के नाम के पर्चे भी शहर में बांट चुके हैं और विधानसभा में भी यह मामला उठ चुका है। इसे बावजूद यूआईटी ने अवाप्तिशुदा जमीनों के मामले को सार्वजनिक हित में आज तक नहीं सुलझाया। इससे यूआईटी की नई योजना डीडीपुरम पर भी ग्रहण लग गया है। क्या सरकार की जमीन पर सूचना पट्ट नहीं लगने चाहिए ताकि आम जनता मकान बनाने से पहले जान सके कि जमीन ठीक है। इस मामले में थोक मालियान, सोमलपुर और दौराई के पटवारियों ने पिछले सालों में खूब पैसा भू-माफियाओं से कमा लिया (इनकी जांच कराई जाए)। कई जगह पर अवाप्ति कार्यवाही में अटकी जमीन पर रिश्वत लेकर नामांतरण खोल दिए गए। इस मामले में विधायक रहे रतनलाल तांबी के पुत्र नरेंद्र महाजन को फर्जी आवंटन के मामले में खुली जांच कांग्रेस सरकार ने कराई थी। इसका नतीजा क्या रहा?
वन क्षेत्र में अय्याशी का अड्डा और शिक्षा राज्य मंत्री की भूमिका
तारागढ़ की तलहटी में बनी ऐतिहासिक ताका सैयद की मजार काफी सुनसान इलाके में ऊंचाई पर है। धर्म की आड़ लेकर यहां पर भू-माफियाओं ने अय्याशी का सुरक्षित ठिकाना बनाने का प्लान बरसों से बना रखा है। यह भूमि वन क्षेत्र की है। यहां पर बिना किसी मंजूरी के कुछ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इन्हीं भू-माफियाओं के इशारे पर कमरे खड़े दिए। इस पर वन विभाग के गार्ड रब नवाज ने तत्कालीन डीएफओ को सूचना देकर निर्माण तुड़वाया। विवादित और सरकार से हटाए गए वन मंत्री रामलाल जाट ने जब वन अधिकारियों की बैठक ली तो तत्कालीन विधायक नसीम अख्तर ने डीएएफओ एनके अग्रवाल को कहा कि यहां सडक़ और कमरे बनने चाहिए। डीएफओ अग्रवाल ने कहा कि यह जमीन लखनऊ मुख्यालय से ही ली जा सकती है। इस पर वन मंत्री रामलाल जाट ने उल्टे डीएफओ को ही डांट दिया कि तुम ज्यादा समझते हो क्या? इसी जमीन पर बीएबीएड पास विधायक नसीम अख्तर कुछ ‘जाहिल और अय्याश’ लोगों के इशारे पर क्यों कमरे बनवाने की सिफारिश कर रहीं थीं?
शायद उन्हें पता नहीं होगा कि ये सूना मजार क्षेत्र कमरे बनवाने के बाद किसकी अय्याशी के काम आएगा? आज वही राजस्थान सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री बन चुकी हैं? क्या वे नहीं जानती थीं कि वन भूमि आवंटन की फाइल राज्य सरकार लखनऊ भेजती है? यह इलाका काफी दुर्गम है और ख्वाजा साहब की दरगाह के पिछले हिस्से से यहां रास्ता आता है। इस क्षेत्र में देर रात को चौपहिया वाहनों में अय्याशी के लिए महिलाओं को लाया जाता है। आशा नामक लडक़ी की बलात्कार के बाद हत्या कर शव तारागढ़ की पहाड़ी में पटका गया था जिसे पुलिस आज तक नहीं सुलझा सकी। इस मामले में भी एक पुलिस अफसर की खास भूमिका रही। बताया जाता है कि मामले का एक आरोपी इमरान आज तक पुणे में अपना कारोबार कर रहा है। इससे मामला आज ठंडे बस्ते में है। पुलिस ने सारा गेम मैनेज कर दिया। क्या यही न्याय की परिभाषा है? शिक्षा राज्यमंत्री का भू-माफिया अलादीन के यहां पुराना आना जाना है। नसीम अख्तर खुद अखबार के दफ्तरमें इन भू-माफियाओं की पैरवी करने पहुंच गई। क्या ऐसी महिला को शिक्षा राज्य मंत्री का पद देकर सरकार ने सही काम किया है?
पुलिस बताए भू-माफिया कौन?
राजस्थान सरकार ने पुलिस की जो प्राथमिकताएं तय की हैं उनमें संपत्ति संबंधी अपराधों को रोकना भी शामिल है ताकि आम जनता को सही जमीन का पता चले। साथ ही सरकार का एसेट भी बढ़े और राजस्व आय में बढ़ोतरी हो सके। अजमेर में यूआईटी ने तो बहुत पहले 12 भू-माफियाओं को चिह्नित किया था। जो आज परदे के पीछे अपने एजेंटो के जरिये काम कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि राजस्थान पुलिस ने अवाप्तशुदा या सरकारी जमीनों पर कब्जे के परिवाद तो खूब लिए मगर पुलिस की नजर में किसी को भी पिछले सालों में बतौर भू-माफिया चिह्नित तक नहीं किया गया। क्या पुलिस को भू-माफिया चिह्नित करने के अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए? यदि पुलिस को भू-माफियाओं को चिह्नित करने के अधिकार मिलें तो ऐसे तत्वों पर कड़ी लगाम कसी जा सकेगी।
पुलिस और भू-माफियाओं की कॉल डीटेल बताएं
12 दिसंबर को कथित मजार बताते हुए चादर शरीफ लाकर डालने वाले तत्वों को क्षेत्रवासियों ने देखा था मगर उन्हें अब डराया जा रहा है। ताकि वे मुंह न खोल सकें। इस घटना का सही पता लगाने के लिए थाना प्रभारी राजेंद्र त्यागी, एएसआई ताज मोहम्मद, खान बहादुर, भूमाफिया अलादीन और रुस्तम अली चीता और वाजिद की कॉल डीटेल की जांच करें। इससे जमीन के मामले को सांप्रदायिक रंग देने वाले तत्वों का खुलासा हो जाएगा। इस मामले की सूचना के अधिकार के तहत मुझे और मीडिया को जानकारी देकर इस साजिश का पर्दाफाश करें क्योकि क्षेत्रवासी डरे हुए हैं। साथ ही मजार के नाम पर डाली गई चादर को एएसआई ताज मोहम्मद से खुद प्रशासन मौके पर आकर हटवाए ताकि ‘पारदर्शी सरकार का न्याय’ जनता में भय नहीं अपितु विश्वास का माहौल बना सके। मेरी सूचनाओं को गंभीरता से खंगाला जाए। सभी अखबारों में छपी खबरों को देखा जाए। जमीनों का रिकार्ड खुली जांच में लाकर जनता को बताया जाए ताकि विश्वास और सौहाद्र्र का माहौल बना रह सके।
एक सच्चा पत्रकार और वरिष्ठ उप संपादक होने के नाते अजमेर के किसी पत्रकार को पार्टी न बनाकर इन सूचनाओं की तस्दीक कर जनहित में सूचना के अधिकार के तहत मुझे उपलब्ध कराया जाए। यह पत्र अजमेर के सभी सच्चे पत्रकारों के सहयोग से लिखकर दिया गया है ताकि शहर की गरिमा और सौहार्द बिगाडऩे वाले तत्व पहचाने जा सकें। यदि कोई अधिकारी जांच करे तो मेरे मोबाइल से खींचे गए और अखबारों में छपे फोटो सारी कहानी बता देंगे। मेरे पास दैनिक भास्कर अजमेर आफिस में और अन्य पत्रकारों के पास ये फोटो और कई दस्तावेज सुरक्षित हैं। मेरी इन सूचनाओं पर कार्रवाई कर इनकी रिपोर्ट बिना किसी शुल्क के सूचना के अधिकार के तहत मुझे सरकार की ओर से भेजी जाए ताकि सांप्रदायिक रंग देने वाले एएसआई ताज मोहम्मद पर कड़ी कार्रवाई हो सके।
क्या अजमेर का प्रशासन जमीन के मामले को सांप्रदायिक रंग देने वालों को गिरफ्तार नहीं कर सकता है? इसमें प्रशासनिक अधिकारी अपनी भूमि पर कार्रवाई भी ऐसी करें कि किसी गरीब को नुकसान न हो, या फिर क्षेत्र का पीटी सर्वे करवाकर लोगों को राहत दी जाए। कहीं ऐसा न हो कि कार्रवाई में गरीब लोगों को उजाड़ दिया जाए, तभी सरकार की साख बनेगी और जनता में विश्वास भी बढ़ेगा। इस मामले में केवल कागजी जांच और प्रशासनिक ड्रामा नहीं हकीकत में कार्रवाई करें। इस मामले में 12 दिसंबर से कुछ लोग मुझे और परिवार सहित क्षेत्रवासियों को अप्रत्यक्ष रूप से डराने की कोशिश कर रहे हैं यदि कोई हादसा क्षेत्रवासियों, समिति पदाधिकारियों या मेरे साथ हुआ तो पुलिस और प्रशासन के साथ सरकार भी इसकी जिम्मेदार होगी।
भवदीय
रविंद्र सिंह पुत्र स्व. नत्थू सिंह प्रजापति
ओम सदन, 557/ 11 जवाहर की नाड़ी
निकट चंदवरदाई नगर, अजमेर
मोबाइल: 96729-87958,
99501-87958
प्रतिलिपि:
1. मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार
2. श्री अश्विनी चोपड़ा, संपादक, पंजाब केसरी (साजिश में शामिल मुस्लिम पत्रकारों पर कार्यवाही बाबत)
3. श्री अरविंद केजरीवाल, एक्टिविस्ट
4. श्री किरण बेदी, एक्टिविस्ट
5. श्री अरुणा राय, एक्टिविस्ट
6. श्री महेश अग्रवाल, संवाददाता, यूएनआई और हिंदुस्तान टाइम्स
8. श्री दीनबंधु चौधरी और ओम माथुर (संपादक) दैनिक नवज्योति
9. रवीन्द्र शाह, एसो्सिएट एडिटर, आउटलुक
10. विधायक अनिता भदेल, (दक्षिण) अजमेर
11. विधायक वासुदेव देवनानी (अजमेर उत्तर)
12. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली
13. भंवर मेघवंशी, एक्टिविस्ट
14. समस्त पत्रकार, अजमेर






