: विज्ञापन वसूली के लिए बेटा-बेटी को बना दिया संपादक-प्रकाशन : दैनिक भास्कर के अजमेर संस्करण का एक वरिष्ठ पत्रकार भास्कर को ही चूना लगा रहा है। यह पत्रकार पिछले दो साल से अपना एक साप्ताहिक अखबार प्रकाशित करता है। कहने के लिए पत्रकार के बेटा-बेटी इसके प्रकाशक एवं संपादक हैं परंतु सारा काम संपादन, प्रकाशन, मार्केटिंग, विज्ञापन बटोरना आदि सब यह पत्रकार ही कर रहा है और वह भी भास्कर के नाम का खुला उपयोग कर। पिछले करीब दो साल से यह खेल जारी है।
दैनिक नवज्योति, अजमेर में रिपोर्टिंग के बाद इस पत्रकार ने राजस्थान पत्रिका के अजमेर संस्करण में नौकरी की। पत्रकार की खासियत यह है कि सिवाय चमचागिरी और लम्बी-लम्बी डींगे हांकने के इसे कुछ खास काम नहीं आता। आज भी यह एक खुली चुनौती है इस पत्रकार के लिए कि यदि इसे कोई खबर लिखने को दी जाए तो इसके जूनियर साथी उससे कम समय में उससे बेहतर खबर लिख देते हैं या संपादित कर देते हैं। सिगरेट फूंकते हुए यह ऐसा जाहिर करता है जैसे नवज्योति निकलता था तो इसके दम पर, पत्रिका चली तो इसकी मेहनत से और अगर आज भास्कर छप रहा है तो इसकी मेहरबानी से। खबर कोई भी हो, किसी भी पत्रकार की हो, पेज कोई सा भी हो अगले दिन क्रेडिट लेने मे बंदा कहीं पीछे नहीं रहता।
पत्रिका में ऐसा माहौल किया कि प्रबंधन ने तंग आकर इसे भीलवाड़ा संस्करण का ब्यूरो बनाकर भेज दिया। एक भू माफिया से सांठ गांठ कर अजमेर में कौड़ियो के दाम जमीन लेकर मकान बना चुके और पत्रकार कॉलोनी में भी प्लॉट ले चुके पत्रकार की पत्नी चूंकि अजमेर में ही नौकरी करती है और बच्चे भी यहीं पढ़ाई करते हैं। भाजपा के एक स्थानीय नेता और होटल व्यवसायी से कॉलेज के जमाने की मित्रता के कारण रोज शाम उसके साथ गुजारने की भी मजबूरी थी, सो बाहर की नौकरी भारी हो रही थी। इसी बीच विधानसभा चुनाव आ गए। पत्रकारिता के सिद्धांतों को हवा में उड़ाने की आदतें भीलवाड़ा में बदस्तूर जारी रही। तंग आए कांग्रेस के प्रत्याशी सीपी जोशी, जो वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं, ने समझाने की कोशिशें की परंतु हरकतों पर लगाम नहीं लगी। आखिरकार जोशी ने शिकायत की और पत्रकार को रातोंरात भीलवाड़ा से पदावनत कर चूरू भेज दिया गया।
वहां जब हालात नौकरी से निकाले जाने के हुए तो इस्तीफा देकर अपने गृह जिले की राह पकड़ ली। वही भाजपा नेता और एक दूसरे मित्र, जो उस समय भास्कर अजमेर के संपादक थे, ने अजमेर भास्कर में जुगाड़ बैठा दिया। इस तरह यह अजमेर भास्कर में नंबर दो हो गया। दफ्तर के सामने ही घर है परंतु यह अच्छी तरह मालूम है कि काठ की हांडी ज्यादा चलने वाली नहीं है। या तो तबादला होगा या फिर नौकरी से निकाला जाना तय है, ऐसे में अपना साप्ताहिक अखबार निकाल लिया। खुद भास्कर में है और पत्नी सरकारी नौकरी में इसलिए बेटे को संपादक और बेटी को प्रकाशक बना दिया। एक जमीन के धंधेबाज का साथ मिल गया जिसे प्रबंध संपादक की कुर्सी दे दी। खुद कुछ नहीं पर सब कुछ।
राजस्थान में अखबार रजिस्ट्रेशन के लिए पांच साल का पत्रकारिता का अनुभव प्रमाण पत्र होना जरूरी है। आवेदन के बाद पुलिस इंक्वायरी भी होती है। इस अखबार के संपादक अभी इंजीनियरिंग कॉलेज में तृतीय वर्ष में पढ़ रहे हैं और प्रकाशक महोदया बारहवीं कक्षा में यानि संपादक की उम्र है करीब 21-22 वर्ष और प्रकाशिका की 18-19 वर्ष। पता नहीं किस अखबार ने इन नाबालिगों को इनके बालिग होने से पहले ही पांच साल का अनुभव प्रमाण-पत्र दे दिया? अजमेर की पुलिस के तो कहने क्या जिसका एसपी गिरफ्तार है और एएसपी फरार, वहां से कैसी भी पुलिस इंक्वायरी होना संभव है। बचे जिला कलेक्टर जिन्होंने अखबार का रजिस्ट्रेशन और डिकलियेरेशन के समय शायद संपादक-प्रकाशक की आयु और अनुभव पर तो गौर करने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
भास्कर के दम पर पत्रकार महोदय ने पकड़ लिए कुछ फ्रीलांसर लेखक जो उन्हें ओब्लाइज करने के लिए फोटो समेत स्थायी स्तंभ लिखने लग गए। सिर्फ एक स्टोरी और बाकी सभी स्थायी स्तंभ। अखबार की कॉपियां सभी अफसरों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, नेताओं और व्यापारियों को निशुल्क डाक से भेजी जाने लग गई। भास्कर चूंकि अपनी प्रिंटिंग प्रेस में बाकी छपाई का काम भी करता है, लिहाजा प्रिंटिंग दैनिक भास्कर की प्रेस में और प्रिंट लाइन एक दूसरी प्रिंटिंग प्रेस की छपने लगी।
बगैर विज्ञापनों के अखबार चलता कैसे? ऐसे में पत्रकार के खुराफाती दिमाग ने अपना काम किया। पेज मेकिंग के लिए भास्कर के ही विज्ञापन बनाने वाले पेज मेकिंग ऑपरेटर्स की सेवाएं ली गई जो नाम मात्र के दाम पर भास्कर के सामने ही स्थित पत्रकार के घर जाकर पेज बनाने लगे। साथ में वे भास्कर के विज्ञापनों का डाटा, विज्ञापनदाताओं की सूची, मार्केंटिंग का डाटा आदि पत्रकार को करीब-करीब रोज ही उसकी पेन ड्राइव में उपलब्ध करवाने लगे। पत्रकार ने एक खेल और खेला। रात करीबन 11 बजे बाद जब मार्केंटिंग टीम जा चुकी होती थी तब वह अपने चहेते व्यापारियों जिनके विज्ञापन अपने अखबार में लगाता था, की बिजनेस न्यूज को बढ़चढ़कर लगाने लगा। काफी समय तक भ्रम की स्थिति रही। प्रबंधन को लगता खबर संपादकीय विभाग से लगी होगी, संपादकीय विभाग को लगता प्रबंधन या मार्केटिंग से लगी होगी।
जब मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव्स को उनके कस्टमर्स अपनी बिजनेस न्यूज नहीं लगने या छोटी खबरें लगने का उलाहना देने लगे तब धीरे-धीरे हकीकत सामने आने लगी। चापलूसी के लिए मशहूर पत्रकार ने मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव्य को पटा लिया। परंतु ऐसा कब तक चल सकता था। मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव्स के साथ अब विज्ञापन एजेंसियों ने शिकायतें की कि भास्कर के नाम पर पत्रकार महोदय विज्ञापन ले आए और अपने साप्ताहिक में छाप दिए। पानी जब सिर से गुजरने लगा तो मामला जयपुर तक जा पहुंचा। स्टेट संपादक ने पत्रकार को बुलाकर अच्छी तरह क्लास ली, लिखित नोटिस भी दिया। पत्रकार ने यह कहकर पीछा छुड़ा लिया कि यह उनका अखबार ही नही है। उनकी बेटी और बेटा इसे निकालते हैं।
इसी बीच स्टेट संपादक का तबादला भोपाल हो जाने से मामला ठंडा पड़ गया। कोई कार्रवाई नहीं होने से पत्रकार की छाती चौड़ी हो गई और अब वह खुला खेल खेलने लग गया। हालात ऐसे हुए कि अजमेर भास्कर का टारगेट ही पिछड़ गया। जाहिर है कोई भी प्रबंधक, मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव या संपादकीय साथी अपनी नौकरी की दम पर कब तक मदद करते। मामला जयपुर कार्यालय में फिर गरमा गया। पत्रकार को बुलाया गया और दो टप्पे की बात की गई या तो भास्कर छोड़ो या अखबार बंद करो। पत्रकार ने कहा, अखबार बंद कर देते हैं, अब कोई शिकायत नहीं मिलेगी। ताजा खबर यह है कि पत्रकार ने अपना अखबार बंद नहीं किया है, चोरी छिपे गिनती की कॉपियां छपना जारी है ताकि धंधा चलता रहे। भास्कर की नौकरी तो चल ही रही है।
अजमेर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






