बरसों पहले की बात है। मैं राजस्थान में धमाकेदार काम कर रहा था। मेरी लेखनी का नौ साल बाद भी वहां के लोग सिर्फ लोहा नहीं मानते, मुझे प्यार और सम्मान देते हैं और इसीलिए रोजाना आज भी मेरे मोबाइल पर आने वाले कम से कम तीन-चार फीसदी फोन राजस्थान से ही होते हैं। यही वजह है कि मैं अब तक केवल राजस्थान के लोगों को ही बहादुर मानता हूं। हां होते हैं वहां भी कुछ लोग कायर और बिकाऊ भी। लेकिन बहुतायत बहादुरों की ही है वहां। इस बारे में जाति-पांति से उनका कोई लेना-देना नहीं।
बहादुर का मतलब बहादुर ही होता है वहां के लोगों में। इसके बाद अगर किसी और जगह की बहादुरी देखनी हो तो सीधे जौनपुर चले आइये। यहां सतह पर तो खूब संघर्ष चलते हैं जिन्हें जीतने के लिए लगभग हर बार घिनौना जातीय आधार मुहैया करा दिया जाता है। लेकिन ऐसे संघर्षों से जुड़े ज्यादातर लोग बिलकुल नारियल की तरह होते हैं। अंदर से इतने मीठे, रसीले, मुलायम और गूदादार, कि शुरुआत में यकीन करना मुश्किल हो जाए। अब यह दीगर बात है कि पूरा जौनपुर हर एक बाहरी से, अपने प्रतिद्वंद्वी के बारे में यही कह कर अपने प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता रहता है कि जौनपुर के खून में मूली, मक्का और मक्कारी कूट-कूट कर भरी पड़ी है।
मेरे बुरे दिन थे, यह कहना गलत होगा। दरअसल मेरे गुरू और बड़े भाई सरीखे शेखर त्रिपाठी ने अचानक ही मुझे वहां सारा कुछ छोड़कर फौरन बनारस आने का हुक्म गालियों का तड़का लगा कर सुना दिया। उनका आदेश और मैं इनकार कर दूं, ऐसा हो ही नहीं सकता। पिछले पचीस बरसों से अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने मुझसे गालियों से ही दुलराया है। या यूं कहिये कि मुझे गाली देने का अगर किसी में सार्वजनिक हौसला है तो वह हैं शेखर त्रिपाठी ही। दरअसल, गालियां खाने की आदत मुझे उन्हीं के मुखारबिंद से पड़ी।
तो भैया, किस्मत का मारा, मैं आ गया दैनिक भास्कर जोधपुर से सीधे काशी के हिन्दुस्तान अखबार में। पोस्टिंग मिली जौनपुर, जहां के सांसद थे स्वामी चिन्मयानन्द। तब वे भाजपा में थे और देश के गृह राज्य मंत्री भी। बड़ा नाम था उनका। उनके चेले उनकी तूती बजाते घूमते थे तब। दिल्ली से दौलताबाद तक। स्वामी को यह सब पसंद ही नहीं, उनकी जरूरत बन चुका था। कहने की जरूरत नहीं कि यह तूती बजाने का धंधा उनके उस गिरोह ने सम्भाल लिया था जो अपने परिचय के लिए नहीं, बल्कि अपने अहंकार के लिए ठाकुर कहलाते थे। ठाकुरी-राजनीति की एक धुरी धनंजय सिंह भी थे जो आजकल मायावती की कृपा से जौनपुर जेल में गिरोहबंद हैं। कुंवर वीरेंद्र सिंह को तो यहां के लोग सहकारी बैंक का भट्ठा बिठाने का श्रेय देते हैं। कुछ व्यक्तिगत आक्षेप भी लगते हैं उनपर।
उधर, उनके प्रतिद्वन्द्वी थे पारसनाथ यादव। एक नम्बर के अहीरवादी और उजड्ड। जौनपुर को अपने खानदान की जागीर समझने वाला। अहीरों को ग्वाल और ढंढोर समेत अनेक खंडों में बिखरते मैंने पहली बार जौनपुर में ही देखा। नाम भले ही पारस रहा हो, लेकिन वह था बेहद अक्खड़ और दूसरों पर यह साबित करता रहने वाला कि अगर वह नहीं होगा तो मुलायम सिंह यादव ही नहीं, पूरा यदुवंश ही मुथु के चलते जिस तरह तबाह-बर्बाद हो गया, जौनपुर भी खंड-खंड बिखर जाएगा। वह तो तब जौनपुर के डीएम रहे अनुराग यादव जैसे व्यक्ति ने उसे सम्भाला क्या, गिरने से बचा लिया। वरना, खैर। इस बारे में बाद में बात कर ली जाएगी। अब हैं कुछ ब्रजेश यदुवंशी जैसे लोग जो केवल एक आवाज पर सैकड़ों-हजारों दूधियों को जुटा लेते हैं लेकिन बने रहते हैं शिक्षक और समाजसेवी ही।
रही बात पंडितों की तो… खैर, छोडि़ए। ठाकुरों और अहीरों को गरियाने के अलावा इन लोगों ने कोई उल्लेखनीय काम किया भी तो नहीं। हां, वकीलों, डाक्टरों और समाजसेवियों में इनकी सम्मानजनक पैठ जरूर रही। जो राजनीति में घुसने की कोशिश करते हैं उनका मधुकराना-त्रिपाठियानापन साफ पता चल जाता है। दलितों में विद्यासागर सोनकर और माता प्रसाद जैसे लोग सम्मानित हैं। राजनीति में सपाई जावेद अंसारी का डंका है तो भूमिहारों में जगदीश नारायण राय का। मौर्यों में रावण के धुर समर्थक बन कर हिन्दू देवी-देवताओं को गरियाने की परम्परा पारसनाथ ने शुरू की।
खासबात यह है कि इन सभी जातियों में जो लोग राजनीति से एक खास दूरी बनाकर अपने व्यवसाय तक सीमित रहे, वे बेहद सम्मान के साथ देखे-पहचाने जाते हैं। नजीर है इंडिया ज्वैलर्स वाला दुबे परिवार। मुसलमानों में वामिक जौनपुरी शायर जमाली और अहमद निसार को कौन भुला सकता है। या फिर कैलाशनाथ, इंदू सिंह, गुड्डू सिंह, एनके सिंह, डीपी सिंह, सुभाष सिंह, विनोद कुमार सिंह प्रोफेसर अरूण कुमार सिंह, यतींद्रनाथ त्रिपाठी, आरपी सोनकर, एचडी सिंह, अजय कुमार, मिर्जा दावर बेग, हमीदा बानो दीदी, संजय सेठ, काल बाबा, रजनीश श्रीवास्तव, कमर अब्बास, एमएमएम अब्बास वगैरह। लालाओं में पोलू फोटोग्राफर का नाम बच्चा-बच्चा जानता है।
यह बात है सन 2004 की। इस सवा साल में तब तक मेरी छवि एक धाकड़ पत्रकार की बन चुकी थी। धाकड़ मतलब जो बेखौफ लिखता-बोलता हो और जौनपुरवालों के हिसाब से जिसके खिलाफ दुनिया उठ खड़ी हो। रत्नेश तिवारी ने एक नारा दे दिया कि जौनपुर में दो ही बीर हैं, नदी के उस पार केरारबीर और इस पार कुमार सौवीर। उधर ब्रजेश यदुवंशी ने मुझे जौनपुर का फक्कड़ कबीर कह दिया। मैं गदगद होता जा रहा था और इसी के साथ ही मेरे खिलाफ रणनीतियों की चौसर और अभेद्य बनती जा रही थी। कड़ी निगरानी हो रही थी मुझपर कि मैं कुछ गलत करूं और मेरी शिकायत करके मुझे जौनपुर से बेइज्जत करके भगाने का मार्ग प्रशस्त
किया जा सके। धमकियां मिलीं, गुंडे लगाये गये, दफ्तर पर प्रदर्शन तक किया गया। बहरहाल, आम चुनाव आ गये इन्हीं हालातों में।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. सौवीर से संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.





