प्रिय यशवंत जी, मजदूर दिवस के दिन जब मीडिया के तकरीबन 250 कर्मियों पर छंटनी की गाज गिरी तो वाकई बहुत खराब लगा। एक तरफ जहां सारे न्यूज़ चैनलों पर दिनभर मजदूर दिवस से जुड़ी खबरें दिखाई जाती रहीं वहीं सीएनईबी के 250 कर्मियों को नोटिस थमाए जाने का कोई जिक्र नहीं हुआ। हमें भी काफी तकलीफ हुई क्यूंकि मैं इस संस्थान से जुड़ा रहा हूं। 4 साल से ज्यादा समय तक चैनल चलाने के बाद उसका बंद होना निश्चित तौर पर मैनेजमेंट की दूरदर्शिता और कल्पनाशीलता पर सवाल खड़े करता है। ज्यादातर अनप्रोफशनल लोगों की जमात इकट्टा की गई .. भाई-भतीजों को नौकरी दी गई और उन लोगों ने संस्थान का बेड़ा गर्क कर दिया।
संस्थान में कई ऐसे लोग थे जो सिर्फ मालिकों के रिश्तेदार होने का दंभ भरते – कुछ काम नहीं करते और काम करनेवालों पर शासन चलाने की कोशिश करते। ऐसे लोग सभी अधिकारियों के शासन में रहे लेकिन अनुरंजन झा के वक्त इन लोगों में ज्यादातर को किनारे लगा दिया गया या फिर कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं गई जिससे संस्थान पर असर पड़े। सबसे बड़ी समस्या चेयरमैन का विजन रहा जिनका कोई विजन ही नहीं है। पिता की खड़ी की गई विरासत पर कोई मेहनत नहीं की गई और चैनल बंद होने के कगार पर पहुंच गया। इस चैनल को बचाया जा सकता था अगर निकम्मों की फौज नहीं खड़ी की जाती और कमान किसी अच्छे प्रोफशनल के हाथों सौंपी जाती।
एक बात और महज एक महीने का पगार पकड़ा कर 250 से ज्यादा लोगों को विदा करना निश्चित तौर पर उचित नहीं है। एक महीना कैसे बीत जाएगा, कर्मियों को पता नहीं चलेगा और फिर किनके घर में चूल्हा जलेगा और किनके घर में नहीं, इसका कोई ठिकाना नहीं। पहले भी अनप्रोफेशनलिज्म की वजह से वॉयस ऑफ इंडिया (वीओआई) नाम का ग्रुप धराशायी हो चुका है और सैकड़ों मीडिया कर्मियों को बरोजगार बना चुका है। इस मामले में मीडिया समुदाय चुप है .. मीडिया के संगठन चुप हैं … मंत्रालय की चुप्पी है … सरकार खामोश है। इन सबको जगाने की जरूरत है क्योंकि यह हादसा किसी के साथ हो सकता है। अभी भी वक्त है इस संस्थान को बचाया जा सकता है। इसे बचाने के लिए हम सबको सोचना चाहिए। फिलहाल नाम मत छापिए… हम इन सब कर्मियों के साथ हैं … जरूरत पड़ने पर आगे आएंगे। नेपथ्य की भूमिका भी जिंदगी में अहम होती है।
सीएनईबी का एक पूर्वी कर्मी.






