प्रति: अध्यक्ष, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ, महासचिव, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ… प्रिय साथी, मैं पिछले तीसके सालों से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आता रहा हूं। लेकिन यह आना जाना बस चंद घंटों के लिए ही होता रहा है।पहली बार मुझे आपके विश्वविद्यालय में दूसरे कारणों से जाना पड़ा। पहली बार विश्वविद्यालय के प्रशासन से सामना हुआ। छात्र संगठनों के बीच चल रही प्रतिद्दंदता को देखने का मौका मिला।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में किसी के दाखिले के संबंध में मैं अपना समय व्यतीत कर रहा था। 17 जुलाई 2013 को मैं वहां था और उसके बाद कई दिनों तक आना जाना लगा रहा। दाखिले के समय मैंने ये पाया कि वहां दाखिले के लिए पहुंचने वाले विद्यार्थियों को मदद पहुंचाने के लिए विभिन्न विद्यार्थी संगठनों ने पंडाल लगा रखा था। मेरे लिए बिल्कुल यहां नया अनुभव था। मैं इन पंडालों में पसरी प्रवृतियों की तरफ यहां नहीं जाना चाहता। लेकिन मैं जो एक घटना का उल्लेख करना चाहता हूं शायद उससे उन प्रवृतियों को समझने का आधार मिल सकता हैं।
दाखिले के समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक प्रावधान किया था कि विद्यार्थियों को दस दस रूपये के दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र देने होंगे। कहा ये गया कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उस फैसले के आलोक में यू जी सी के निर्देशों के अनुसार दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र मांगे जा रहे हैं। मेंने यह भी देखा कि वहां विद्यार्थी संगठनों ने दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र के लिए एक व्यवस्था भी कर रखी थी। शपथ पत्र तैयार करवाने के पते और फोन नंबर वहां चिपकाए गए थे। मुझसे कई विद्यार्थियों ने कहा कि शपथ पत्र कोई मुश्किल काम नहीं है। बस दो तीन सौ रूपये के खर्च से ये शपथ पत्र तैयार करवाए जा सकते हैं। लेकिन मुझे ये जानकर हैरानी हुई कि किसी भी विद्यार्थी संगठन ने ये तहकीकात करने की जरूरत ही महसूस नहीं की कि दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र देने की जरूरत है भी या नहीं। बस एक रट की तरह सुनता रहा कि सुप्रीम कोर्ट और यू जी सी का यह निर्देश है। मैं ये दावे के साथ तो नहीं कह सकता लेकिन अनुमान लगा सकता हूं कि शायद किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले और यू जी सी के निर्देशों को देखा भी हो। आखिर ये कैसे हुआ कि सभी के सभी दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र को महज एक औपचारिकता मान रहे थे और उन्हें लगा रहा था कि दो तीन सौ रूपये कोई बड़ी चीज नहीं है।
मैं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में भी दाखिले की प्रक्रिया को देखने गया था। वहां दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र की व्यवस्था नहीं थी। पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों में यह औपचारिकता पूरी करवाई गई और कईयों में ये नहीं करवाई गई। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प शपथ पत्र लेने के प्रावधान को एक अध्ययन के बाद गलत बताया था जिसकी खबर कई समाचार पत्रों में छपी थी। इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय ने शपथ पत्र तो लिये लेकिन दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर नहीं। वे शपथ पत्र ऑन लाइन थे। यानी सादे कागज पर ये शपथ पत्र लिये गए।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के संगठनों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और यू जी सी का यह निर्देश था तो वह पूरे देश के शिक्षण संस्थानों के लिए होता।लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के समय दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र नहीं लिया जा रहा था। इसका साफ अर्थ है कि इस तरह की कोई कानूनी बाध्यता नहीं रही है।मीडिया स्टडीज ग्रुप ने पिछले वर्ष एक अध्ययन के बाद ये मोटा अनुमान लगाया था कि शपथ पत्र को दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र में अनूदित कर देने भर से बाजार को लगभग सौ करोड़ रूपये की कमाई हुई। हजारों हजार विद्यार्थी परेशान हुए। अभिभावकों को भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ का वहन करना पड़ा।
मैं 17 जुलाई को ही कुलसचिव से भी मिला। लेकिन उनके अति असंवेदनशील कुलसचिव होने का मुझे अनुभव हुआ। उन्हें इस संबंध में कुछ भी जानकारी नहीं थी और वे अपनी जिम्मेदारी से भी भागने की कोशिश कर रहे थे। उनके अनुसार दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र की मांग उनके दायरे से बाहर है। वे प्रशासन के उस हिस्से भर को देखते है जिसमें दाखिले की प्रक्रिया शामिल नहीं है।उन्होने दूसरे नौकरशाहों की तरह मुझे इससे-उससे मिलने की सलाह दे रहे थे।
मैं इस घटना का उल्लेख इस रूप में कहना चाहता हूं कि इस दौर में हमारा निर्माण किस रूप में हो रहा है।शिक्षण संस्थान एक भीड़ की मानसिकता का निर्माण करने वाली जगहें बनती जा रही है। बाजारवाद के दौर में यह प्रवृति तेजी से बढ़ी हैं। हम समाज,राजनीति के कई मुद्दों की तरफ सोचते विचारते हुए दिखते हैं लेकिन उससे ज्यादा समाज और राजनीतिक प्रक्रिया से कटे हुए भी है। इसका एहसास तक हममें नहीं है। हमें लगता है कि हम जिस तरह से सोचते विचारते है और जिस दायरे में सोचते विचारते हैं वह हमारी उन्नत चेतना की गवाही हैं। लेकिन वास्तव में हमारा बाजारीकरण तेजी के साथ हुआ है। अराजनीतिकरण एक स्वभाव की तरह हमारे भीतर बैठता चला गया है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में चुनाव और चुनाव में जीत के लिए प्रतिद्वदंता का रूप बदल जाता है और विषय भी बदल जाते हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्यार्थी और पूरा परिसर राजनीतिक चेतना से लवरेज दिखता रहा है। वहां से प्रतिद्वदंता का राजनीतिक रूप ही दिखने की अपेक्षा रहती है।
होना तो ये चाहिए था कि यदि सुप्रीम कोर्ट और यू जी सी ने दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र लेने की व्यवस्था की तो उसका विरोध किया जाना चाहिए था। दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प के बजाय सादे कागज पर शपथ पत्र देने की जरूरत को काफी बताना चाहिए था। लेकिन एक उल्टी प्रक्रिया यहां देखने को मिली और दाखिले में दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र दिलवाने में विद्यार्थी नेतृत्व बतौर सहायक हो गए। मजे की बात तो यह कि मैं 6 अगस्त को फिर विश्वविद्यालय गया तो मुझे ये बताया गया कि प्रशासन ने अब सादे कागज पर शपथ पत्र की मांग की है। हैरानी की बात ये भी है कि इस आशय की जो सूचना प्रशासनिक भवन में लगी थी उसे 1 जुलाई 2013 को जारी दिखाया गया है। मैं तो आपसे अपेक्षा करता हूं कि आप दो नॉन ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र मांगे जाने और फिर उसकी मांग को समाप्त किए जाने की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग करें।
दरअसल मेरा यह पत्र लिखने का कारण केवल इस घटना का बयान करना भर नहीं है। मैं इसके बहाने आपके सामने ये रखना चाहता हूं कि लोकतंत्र पर हमला लगातार तेज हुआ है। शिक्षण संस्थानों पर हमले उसकी एक कड़ी है। लेकिन मैं यहां खासतौर से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीतिक वातावरण पर जिस तरह से हमले होते रहे हैं, उस स्थिति में विद्यार्थी संघ की भूमिका और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। आपको बताने की जरूरत नहीं है कि चुनावों को संपन्न नहीं होने देने के बहाने कैसे पहले ये हमला किय़ा गया। घटनाओं की एक लंबी कड़ी है जो हिन्दी फिल्म रांझना और 31 जुलाई की घटना और उसकी समाचार पत्रों में रिपोर्टिंग के रूप में भी देख सकते हैं।मैं उस चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए आपको ये पत्र लिख रहा हूं और शपथ पत्र की घटना के बहाने जमीनी स्थिति की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं।
मैं फिलहाल एक सुझाव रखना चाहता हूं ताकि अराजनीतिकरण की जो प्रक्रिया पिछले वर्षों में विश्वविद्यालय में चलाई गई उसे कुछ तेजी के साथ दूर किया जा सके। मैं ये सुझाव देना चाहता हूं कि विद्यार्थियों की यह संस्था एक शोध कमेटी का गठन करें। वह समय समय पर विद्यार्थियों के बीच विभिन्न पहलूओं पर अध्ययन आयोजित करें।मसलन ये अध्ययन किया जा सकता है कि विश्वविद्यालय में दाखिले की प्रक्रिया के दौरान किस तरह की समस्याओं का सामना विद्यार्थियों को करना पड़ा। औसतन कितना समय उन्हें इसके लिए लगाना पड़ा। मैं केवल एक संकेत दे रहा हूं। आप लोग खुद उन पहलूओं पर विचार कर सकते हैं।मेरा आशय यह है कि आप दबाव बनाने की स्थिति में रहे और आपके पास सवाल भी रहे।मुझे ये लगता है कि जब कोई समस्या किसी घटना के रूप में हमारे सामने आ जाती है तब वह एक मुद्दे के रूप में हमारे सामने खड़ा हो जाता है। अन्थया प्रशासन के भरोसे स्थितियों को छोड़ दिया जाता है।
मुझे लगता है कि मौजूदा समय और घटनाएं खुद को गहरे तौर पर टटोलने और समझने की मांग कर रही हैं।
आपका
अनिल चमड़िया
वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विशेषज्ञ






