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लखनऊ

अपट्रॉन का भी बाप है सहारा शहर का लीज घोटाला

लखनऊ। जमीन सोना है और बिल्डर इस पर नोटों की खेती करते हैं। सोना उपलब्ध कराते हैं वह अफसर, जो खाते तो सरकार की हैं, लेकिन दलाली सिर्फ बिल्डरों की करते हैं। अपट्रॉन इंडिया की लीज भूमि शालीमार बिल्डर के हाथों कौड़ियों के भाव बेची गयी, यह लीज भूमि हड़पने का एक छोटा घोटाला है। नगर निगम और एलडीए के दस्तावेजों में करीब ढाई हजार करोड़ का लीज घोटाला बरसों से सुलग रहा है जिसके मास्टरमांइड सहारा प्रमुख सुब्रत राय सहारा हैं। यह एक ऐसा घोटाला है, जिसने साबित कर दिया कि पैसा फेंको सब बिकता है…..

लखनऊ। जमीन सोना है और बिल्डर इस पर नोटों की खेती करते हैं। सोना उपलब्ध कराते हैं वह अफसर, जो खाते तो सरकार की हैं, लेकिन दलाली सिर्फ बिल्डरों की करते हैं। अपट्रॉन इंडिया की लीज भूमि शालीमार बिल्डर के हाथों कौड़ियों के भाव बेची गयी, यह लीज भूमि हड़पने का एक छोटा घोटाला है। नगर निगम और एलडीए के दस्तावेजों में करीब ढाई हजार करोड़ का लीज घोटाला बरसों से सुलग रहा है जिसके मास्टरमांइड सहारा प्रमुख सुब्रत राय सहारा हैं। यह एक ऐसा घोटाला है, जिसने साबित कर दिया कि पैसा फेंको सब बिकता है…..

सुर्खियों में आयी अपट्रॉन इंडिया कंपनी की जमीन लीज पर थी। सर्किल रेट के हिसाब से यह जमीन करीब पांच सौ करोड़ की बैठेगी। स्वामित्व नगर निगम का भले था। लेकिन अफसर शालीमार बिल्डर के हाथों जमीन नीलाम होने तक इंतजार करते रहे। कुछ ऐसा ही लीज घोटाला 1994-95 में अंजाम दिया गया था। गोमती नगर स्थित सहारा शहर जिस भूमि पर बसा है दस्तावेजों में वह भी नगर निगम और सहारा इंडिया के बीच इस गाढ़ी दोस्ती की तह में गए तो करीब ढाई हजार करोड़ के घोटाले का खुलासा हुआ। जिसमें एलडीए भी साझीदार है। एलडीए के ऊपर नगर निगम का करोड़ों का बकाया था। नतीजतन सीमा विस्तार होने पर एलडीए ने गोमती नगर स्थित उजरियांव गांव की करीब 350 एकड़ भूमि नगर निगम को दी थी। नगर निगम ने इसमें से करीब 199 एकड़ भूमि 30 वर्ष की लीज पर सहारा इंडिया को नियम विपरीत  दे दी। हालांकि दस्तावेजों में यह भूमि 170 एकड़ बतायी जा रही है।

सबसे पहली गड़बड़ी तब हुयी जब सहारा को 06.12.1994 को उक्त जमीन पर कब्जा दिखाया गया। जबकि नगर निगम ने खुद 12.01.1995 को कब्जा हासिल किया था। यही नहीं 170 एकड़ के अतिरिक्त एलडीए ने भी सहारा को नियम विपरीत 100 एकड़ ग्रीन बेल्ट दे दी। न्याय विभाग ने शासन को भेजी अपनी राय में खुद लिखा है कि यह पट्टा विलेख शून्य होना चाहिए। सारे दस्तावेज तत्कालीन आवास सचिव अतुल कुमार गुप्ता और एलडीए उपाध्यक्ष दिवाकर त्रिपाठी के बीच आदान – प्रदान भी हुए थे।

तत्कालीन सचिव नगर विकास जयशंकर मिश्रा को भी अतुल कुमार गुप्ता ने पत्र  लिखा था। यही नहीं नगर निगम ने सहारा इंडिया को जो 170 एकड़ भूमि लीज पर दी थी। जिस पर नियम विपरीत सुब्रत राय सहारा ने सहारा शहर बसा रखा है। उसके बारे में खुद शासन ने कहा था कि भूमि देने में गड़बड़ी की गयी है। तत्कालीन लखनऊ कमिश्नर की जांच रिपोर्ट तक का पता नहीं है। पत्रावली से यह रिपोर्ट गायब  है। एलडीए ने सहारा द्वारा करां जा रहे अवैध निर्माण पर ध्वस्तीकरण एवं विकास रोकने के आदेश भी दिए।

सहारा प्रमुख सुब्रत राय सहारा के रसूख के आगे पूरा मामला ही दबा दिया गया। 31.08.98 को तत्कालीन प्रमुख सचिव न्याय एन.के.मेहरोत्रा(मौजूदा लोकायुक्त यूपी) ने न्याय विभाग की राय देते हुए कहा कि नगर निगम ने भूमि का स्वामी न होते हुए भी 23.06.1995 को सहारा इंडिया के पक्ष में विलेख पट्टा कर दिया था। चंूकि पट्टा सिर्फ 100 रूपए के स्टांप पर हुआ था। जो सीधे-सीधे राजस्व चोरी का था। इसलिए विलेख निष्प्रभावी था। इसी तर्ज पर एलडीए अफसरों ने भी 28.02.1995 को सहारा इंडिया को ग्रीन बेल्ट की करीब 100 एकड़ दी थी। भूमि 28.02.1995 को दी गयी थी। यह लाइसेंस एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन था। यह राय तत्कालीन प्रमुख सचिव न्याय एन के मेहरोत्रा ने दी थी। जिसकी प्रति निष्पक्ष प्रतिदिन के पास मौजूद है।

तत्कालीन विशेष सचिव आवास बलवीर सिंह चौहान ने भी 20.03.1995 को अपनी टिप्पणी में इन सनसनीखेज तथ्यों का जिक्र किया था। 22.03.1999 को खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपने आदेश में साफ लिखा था कि सहारा इंडिया को लीज पर दी गयी 170 एकड़ भूमि के विलेख का अधिकार नगर निगम को नहीं था। इसलिए संबधित विलेख को निष्प्रभावी मानते हुए भूमि को वापस लिए जाने कें संबध में तत्काल अग्रेतर कार्यवाही की जाए।

वहीं लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने जो 100 एकड़ भूमि (ग्रीन बेल्ट) सहारा इंडिया की दी है। मुख्यमंत्री के नोट में साफ साफ लिखा था कि न्याय विभाग की पृष्ठ 84 पर राय के अनुसार इसकें संबध मंे किए गए पट्टा विलेख को शून्य माना जाना चाहिए। इस संबध में क्योंकि पट्टा विलेख शून्य है परन्तु एलडीए द्वारा 30 वर्ष के लिए किराया प्राप्त कर चुकने के कारण और सहारा इंडिया का प्रश्नगत भूमि पर कब्जा होने के कारण किराएदारी सृजित हो गयी है अतः प्रश्नगत भूमि ग्रीन बेल्ट की भूमि होने के कारण इस किराएदारी को समाप्त करने के लिए भी न्याय विभाग की राय के अनुसार तत्काल विधिक कार्यवाही की जाए। इसके बाद यह हजारों करोड़ की लीज भूमि हड़पने का यह घोटाला विधानसभा में भाजपा नेता हुकुम सिंह ने उठाया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने एलडीए और नगर निगम की लीज समाप्त करने व अवैध रूप से बसे सहारा शहर के ध्वस्तीकरण के आदेश भी दिए थे।

सुब्रत राय सहारा के रसूख और तत्कालीन नगर विकास मंत्री लालजी टंडन के हस्तक्षेप के कारण न तो लीज डील निरस्त हुयी और न ही सहारा शहर को ध्वस्त किया गया। एलडीए की 100 एकड़ और नगर निगम की 170 एकड़ से अधिक भूमि लीज के तौर पर सहारा इंडिया के पास है। जिसकी वर्तमान बाजार कीमत करीब ढाई हजार करोड़ के आस पास होगी। एलडीए और नगर निगम के अफसरों ने नियमों को ताख पर रख लीज डीड का निष्पादन किया था। नगर निगम और एलडीए की लीज की भूमि सुब्रत राय सहारा ने सहारा शहर में बेचकर खूब माल भी बटोरा है।

इसी तर्ज पर बसपा की करीबी कंपनी शालीमार ने अपट्रॉन इंडिया की लीज की भूमि 74.50 करोड़ में खरीद ली है। जबकि इस जमीन की वर्तमान बाजार कीमत करीब 500 करोड़ के आस – पास है। इस घोटाले में नगर निगम शालीमार बिल्डर उर्फ संजय सेठ आईएफसीआई और अपट्रॉन इंडिया के अफसर शामिल है। सब कुछ योजनाबद्व तरीके से अंजाम देने के बाद हल्ला मचाने का नाटक खेला जा रहा है। अपट्रॉन और सहारा शहर की तर्ज पर नगर निगम और एलडीए ने जिन बेशकीमती जमीनों को लीज पर दे रखा है उसकी उच्चस्तरीय  जांच होनी चाहिए जिसमें हजारों करोड़ के घोटालों का खुलासा होगा।

लखनऊ से मनीष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.  मनीष निष्पक्ष प्रतिदिन अखबार के लखनऊ ब्यूरो चीफ हैं.

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