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अपने स्ट्रिंगरों को बेवकूफ बना रहा है सी न्‍यूज

 

सेवा में, श्री मान यशवंत जी, प्रभारी भड़ास 4 मीडिया. न्यू दिल्ली. सी न्यूज उत्तराखंड – उत्तर प्रदेश अपने स्ट्रिंगरों को बेवकूफ़ बना रहा है. दिसंबर 2011 के बाद स्टोरी का कोई पैसा नहीं मिला है. दिसम्बर माह के बाद से उत्तराखंड – उत्तर प्रदेश के सभी स्ट्रिंगरों की जेब ढीली होनी शुरू हो गयी है. अब स्ट्रिंगरों के पास ज़हर खाने को भी पैसा नहीं, लेकिन चैनल के डेस्क से अब भी फ़ोन ऐसे आता है कि मानो आज तक या स्टार न्यूज़ चैनल जेसे ब्रांड की ब्रेकिंग न्यूज़ छुट गयी हो और टीआरपी जमीन पर आ गिरी हो… लेकिन जिस तरह की स्थिति से अब स्ट्रिंगरों के सामने है उनका जीना मुहाल हुआ है, वो अब वाक्य ही दयनीय है और आने वाले समय में अब किसी को भी सी न्यूज़ से कुछ मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा है. 

 

सेवा में, श्री मान यशवंत जी, प्रभारी भड़ास 4 मीडिया. न्यू दिल्ली. सी न्यूज उत्तराखंड – उत्तर प्रदेश अपने स्ट्रिंगरों को बेवकूफ़ बना रहा है. दिसंबर 2011 के बाद स्टोरी का कोई पैसा नहीं मिला है. दिसम्बर माह के बाद से उत्तराखंड – उत्तर प्रदेश के सभी स्ट्रिंगरों की जेब ढीली होनी शुरू हो गयी है. अब स्ट्रिंगरों के पास ज़हर खाने को भी पैसा नहीं, लेकिन चैनल के डेस्क से अब भी फ़ोन ऐसे आता है कि मानो आज तक या स्टार न्यूज़ चैनल जेसे ब्रांड की ब्रेकिंग न्यूज़ छुट गयी हो और टीआरपी जमीन पर आ गिरी हो… लेकिन जिस तरह की स्थिति से अब स्ट्रिंगरों के सामने है उनका जीना मुहाल हुआ है, वो अब वाक्य ही दयनीय है और आने वाले समय में अब किसी को भी सी न्यूज़ से कुछ मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा है. 
 
पता नहीं क्यों ये दो कौडी के चैनल अपने अस्तित्व को बनाते बनाते अपने और अपने स्टाफ के परिवारों के खाली पड़े पेट से निकलने वाली बद्दुआओ को ले रहे हैं. ये न्यूज़ चैनल वाले यह भूल जाते हैं कि स्ट्रिंगर न्यूज नही भेजेंगे तो चैनल क्या दिखायेगा…? स्ट्रिंगर किसी भी न्यूज़ चैनल की महत्वपूर्ण कड़ी है और जब भुगतान की बात आती है तो यह न्यूज़ चैनल वाले इस महत्वपूर्ण कड़ी स्ट्रिंगरों को भूल जाते हैं. क्‍या यह रूट लेबल पर मेहनत करने वाले स्ट्रिंगरों के साथ उचित व्‍यवहार है.
 
         
यशवंत जी, मैं आप को बता दूं कि सी न्यूज़ का उत्तराखंड एक्सप्रेस व् उत्तराखंड के तमाम बुलेटिनों पर अब या तो घिसी-पीटी पुरानी खबरें चलती है या फिर एजेंसियों से खरीद कर उन बुलेटिनों का अस्तित्व बचाया जा रहा है क्योंकि सुचना से मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों को लेने के लिये कुछ तो दिखाना ही पड़ेगा या युं कहें कि चैनल को बैलगाड़ी की तरह घसीटा जा रहा  है.. बेल गाड़ी भी इस लिय क्योंकि आगरा के स्ट्रिंगर भी अब फिल्ड में न्यूज़ बनाने से पहले पेट्रोल पम्पों पर 50-50 रुपयों का तेल डलवाने के लिय एक दुसरे की जेबें झांकते नज़र आते हैं. अब जिन स्ट्रिंगरों का इधर-उधर से आईडी दि़खा कर थोड़ा बहुत पैसा आ रहा है अब वो बेचारे इक्का दुक्की खबर भेज ही देते हैं.
 
एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.
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