: फ़ैज़ एकाग्र समारोह में पाकिस्तान, जर्मनी सहित भारत के साहित्यकारों ने किया विमर्श : इलाहाबाद : शहर इलाहाबाद और यहां की अदबी रवायत व गंगा-जमुनी तहजीब के लिए रविवार का दिन यादगार बन गया। मशहूर नज्म, कविता व शायरी रचने वाले रचनाकर्मी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जन्मशती के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा व प्रगतिशील लेखक संघ के सहयोग से इलाहाबाद संग्रहालय के पंडित ब्रजमोहन व्यास सभागार में फ़ैज़ एकाग्र पर दो दिवसीय (दिनांक 22 एवं 23 अक्टूबर) अंतरराष्ट्रीय समारोह के दूसरे दिन फ़ैज़ की बेटी सलीमा हाशमी, शमीम फ़ैज़ी की संयुक्त अध्यक्षता में फ़ैज़: गद्य के हवाले से ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’ पर आधारित अकादमिक सत्र में शाहिना रिज़वी, अबू बक़र आज़ाद, अजीजा बानो ने बतौर वक्ता के रूप में वैचारिक विमर्श किया।
वर्धा हिंदी विवि द्वारा ‘बीसवीं शताब्दी का अर्थ : जन्मशती का सन्दर्भ’ श्रृंखला के तहत आयोजित समारोह में सलीमा हाशमी ने अपने वालिद के साथ बिताए पलों को साझा करते हुए कहा कि उनका जीवन खानाबदोश का रहा। लोग मेरी मां एलिस (अंग्रेज थी) से पूछते थे कि क्या आप उर्दू की शायरी समझती हैं, तो वो कहतीं थीं कि मैं उनकी शायरी तो नहीं समझतीं हूं पर शायर को बहुत अच्छी तरीके से समझती हूं। सन् 1952 में हैदराबाद जेल से उनके द्वारा लिखे 25 खत मुझे मिले, दीमक खा चुके थे। वे हैदराबाद जेल में ढ़ाई साल रहे। मुकदमे की सुनवाई इन-कैमरा चले। ख़त के मार्फत हमारे वालिद हमेशा अम्मी को समझाते रहे कि हम इंसानियत के ह़क में लड़ रहे हैं। हिन्दुस्तान के हालात का भी जिक्र वे अपने खतों में करते हैं। 1947 ई. में जब विभाजन हो रहा था, हमलोग श्रीनगर में थे। वे लाहौर से अम्मी को लिखते हैं कि डार्लिंग ब्रिटिश अपनी मंसूबों पर कामयाब हो गया और हम बंट गए। ब्रिटिश इससे बड़ा कोई और अपराध नहीं कर सकता था, जो उन्होंने किया। अब्बा के सामने जो दर्द था वह आज भी है, ये खत्म होना चाहिए।
शमीम फ़ैज़ी ने कहा कि फ़ैज़ द्वारा संपादित लोटस का जिक्र करते हुए कहा कि आज तीसरी दुनिया में चल रहे नव औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ एक मेनीफेस्टो की तरह है। बनारस से आईं शाहिना रिज़वी ने कहा कि फ़ैज़ ने दबे कुचले ज़ुबानों को आवाज दी। बकौल फ़ैज़ ‘मुकाम फैज़ कोई राह में जंचा ही नहीं…, वे तरक्कीपसंद इंकिलाबी थे।
दिल्ली विवि के अबू बक़र आज़ाद ने शिक्षण के नक्काद के हवाले से कहा कि फ़ैज़ ने अपने दोस्तों के गलत चीज को कभी भी सही नहीं कहा और दुश्मनों के सही को कभी गलत नहीं कहा। वे अपनी शायरी से इतने मशहूर हुए कि वे एक बेहतरीन शायर के रूप में जाने गए। फ़ैज़ जो भी रचते वह उनकी अपनी होती थी। वे अपने समय के उपन्यासकारों पर सवाल खड़े करते हैं। अजीजा बानो ने कहा कि फ़ैज़ में जिंदगी से जुड़ी समस्याओं को रखने का अंदाज अलग था। फ़ैज़ एक अच्दे आलोचक भी थे उन्होंने अपने समकालीन रचनाकारों पर बहुत लिखा है।
साहित्यकार असरार गांधी ने सत्र का संचालन किया तथा वर्धा हिंदी विवि के इलाहाबाद केन्द्र के प्रभारी व ‘बीसवीं शताब्दी का अर्थ : जन्मशती का सन्दर्भ’ श्रृंखला के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने स्वागत वक्तव्य दिया।
फ़ैज़ ने गज़ल की नई परंपरा की नींव डाली- नामवर सिंह
हिंदी के शीर्ष आलोचक व हिंदी विवि के कुलाधिपति नामवर सिंह की अध्यक्षता में गज़ल की परंपरा और फ़ैज़ ‘सुलूक जिससे किया हमने आशिकाना किया’ विषय पर आधारित सत्र के दौरान साहित्यकार देवी प्रसाद त्रिपाठी, फ़ैज़ की बेटी मुनीजा हाशमी, जर्मनी के आरिफ नक़वी, पाकिस्तान की ज़ेबा अल्वी, अर्जुमंद आरा, कुलपति विभूति नारायण राय, एहतराम इस्लाम बतौर वक्ता के रूप में विमर्श किया। नामवर सिंह बोले, परंपरा नहीं परंपराएं होती हैं। माशूक से क्या सिर्फ प्रेम की ही बातें होती है। फ़ैज़ की कुछ गज़लें माशूका के लिए हैं। उनकी गज़ल आम तौर की गज़ल नहीं है। वे मीर गालिब की परंपरा से हटकर कहते हैं। फ़ैज़ ने गज़ल की नई परंपरा की नींव डाली। उन्होंने गजल के रूप को बदला है। उन्होंने गज़ल में लंबा सफर 40 साल का तय किया है, उन्होंने गज़ल के तेवर को बदला, अंदाज को बदला। दुनिया जैसे-जैसे बदलेगी फ़ैज़ के गज़लों के नए अर्थ निकलेंगे। उनकी ज़बान और अंदाज को समझने वाले हमारे बीच हैं। फ़ैज़ के गज़ल के मायने बदलेंगे। इस सेमिनार से हमलोग कुछ लेकर जा रहे हैं।
कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय समारोह से फ़ैज़ के कई रोचक पहलुओं से हम रू-ब-रू हुए। स्टीफन ज्विंग ने कहा था कि किसी बड़ी हस्ती के जन्मशती को याद करते हुए उनके समय को जानना महत्वपूर्ण होता है। पिछली शताब्दी के सौ वर्षों में दो महायुद्ध हुए। विध्वंस के नए तरीके औजार आए। इन्हीं सौ सालों में उपनिवेशवाद का खत्मा हुआ और समाजवाद पनपा व नष्ट हुआ। मानवाधिकरों के लिए चार्टर आया और सबसे बड़ी बात है कि इसी सौ वर्षों में इतने बड़े साहित्यकार पैदा हुए, जिनकी हम जन्मशती मना रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में यहां लोगों को आते हुए कम पिछले दस वर्षों में कभी नहीं देखा। यहां जो बहसें हुई इससे हम फ़ैज़ को नए तरीकों से जान पाए।
साहित्यकार देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि फ़ैज़ पर इतना बड़ा मज़मा कराने के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि के कुलपति विभूति नारायण राय बहुत ही बधाई के पात्र हैं। जेएनयू में सन् 1981 में फ़ैज़ की 70 वीं साल गिरह मनायी जा रही थी तो इलाहाबाद का जिक्र आया तो वे एक दिन के बजाय ढ़ाई दिन के लिए यहां आये और 14 प्रोग्राम हुए। खाना विभूति नारायण राय के घर में रखा। फ़ैज़ साहब की हिदायतों में थी कि मैं फिराक साहब के यहां जाना चाहता हूं। फिराक ने इलाहाबाद विवि में वाईस चांसलर को कहा कि फ़ैज़ नफीस किस्म के आदमी हैं, कोई फिराक नहीं, इसलिए उनकी खास ख्याल रखिएगा। फ़ैज़ को सुनने के लिए लाखों लोग पहुंचे थे। एक सुबह वे जल्दी तैयार हो गए। उन्होंने कहा कि शहर घूमना है, सब देखना है। संगम से घूमाते हुए पूरे सवा घंटे तक शहर को देखते रहे, समझते रहे, कुछ भी बोले नहीं। ट्रेन लेट करवानी पड़ी। उसी इलाहाबाद में आज फिर इतना बड़ा आलमी कार्यक्रम करवा रहे हैं, जिसमें सलीमा हाशमी, मुनीजा हाशमी पहुंची हैं। उनकी शायरी का इंकलाब दुखी बेवाओं, बच्चों, मज़दूरों के नाम है। फ़ैज़ के इंकलाब को किसी सरहदों में बांधा नहीं जा सकता है। वे मद्धिम आवाज में इश्क के अंदाज से जुर्म व शोषण को बयां करते थे। उनकी शायरी में जो बहाव है वह किसी समंदर की लहरों की तरह नहीं बल्कि नदी की शांत धारा की तरह है।
जर्मनी से आए सज्जाद ज़हीर ने कहा कि मैं फ़ैज़ को भाई कहता था। कुलपति राय को जर्मनी की तरफ से मुबारकबाद देना चाहता हूं कि इतना बड़ा कार्यक्रम करवाया। जर्मनी में सालगिरह मनायी गई, यूरोप में भी कार्यक्रम हुए, लंदन में टिकट लेकर कार्यक्रम हो रहे थे, कम से कम आठ सौ से एक हजार के करीब लोग पहुंचे थे। सवाल यह है कि आज हम उनसे क्या सीख रहे हैं। फ़ैज़ के चंद अल्फ़ाज दुहराना चाहता हूं-तरक्कीपसंद अदब किसी तंजीम का नहीं है किसी सोसायटी के लिए नहीं है। तरक्कीपसंद वो अदब है जो इंसानियत की राह पर लाता है, आज इसकी बहुत जरूरत है। वे अफ्रो-एशियाई की पत्रिका लोटस के संपादकीय कार्य के लिए कभी-कभी जर्मनी आते थे। आज जब हम सारी दुनिया के हालात देख रहे हैं, नवआबादीयत की तरफ और पुराने कोलोनियल की तरफ जाने के लिए कोशिशें हो रही हैं, इसपर हमें सोचने की जरूरत है।
फ़ैज़ की बेटी मुनीज़ा हाशमी ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से नकारात्मक और सकारात्मक बातें जान पाती हूं। वे बड़े खामोश रहते थे। दादी कहती थी फ़ैज़ कुछ मांगता ही नहीं है, कुछ दे दिया तो ठीक। मेरा बेटा है-अली। वो भी अपने नाना की तरह ही शांत रहता है। वालिद साहब कहते थे कि अरे इतना शांत व खामोश नहीं रहा करो, मेरे तरह ही कुछ भी नहीं मिलेगा। यहां आकर लगा कि फ़ैज़ इंसानियत के शायर थे। वे तो मेरे लिए सिर्फ वालिद थे। अखबार के लिए काम करते थे, जब हम सोते थे तो वो जागते थे और वे जागते थे तो हम सोते थे। हिंदुस्तान के संदर्भ में जब उनके लिए सीट ऑफर की गई थी तो फ़ैज़ ने कहा था कि यह मेरे लिए प्रेमिका की तरह है और पाकिस्तान पत्नी।
अर्जुमंद आरा ने कहा कि फ़ैज़ अपनी बात को बहुत ही धीमी आवाज में कहते थे। वे नकारात्मकता में भी सकारात्मकता को तलाशते हैं। जेल के दौरान उन्होंने वतन के हौसले को जगाते रहा। फै़ज कोलोनियलिज्म के खिलाफ लड़ते रहे। मिश्र में तख्ता पलट करने के लिए या फिर लीबिया में हुकूमत के खिलाफ जो जनांदोलन हो रहे हैं तो आज के संदर्भ में फ़ैज़ प्रासंगिक लगते हैं। हम एक नई अमन की दुनिया किस प्रकार का देखना चाहते हैं ऐसे संदर्भ में फ़ैज़ का जन्मशताब्दी पर विमर्श होने से हम लाभान्वित हो रहे हैं।
उदयपुर विवि से आईं उपन्यासकार सरवत खान ने कहा कि अज़ीब फनकार के फ़ैज़ पूरी कायनात की बात करते हैं। मार्क्सीय दृष्टिकोण से उनकी शायरी इंसानी जज्बातों को रखते हैं। उनका पसंदीदा जुमला है- मैं इंसान हूं… हर सूफी हर सभी का फिक्र भी इंसानियत ही है। वे फनकार में जम्हूरियत के लिए आवाजें भरते हैं। उनकी शायरी ने रूमानियत के तौर अपनी बात करते रहे। फ़ैज समस्या को खुद समझा और दूसरों को समझाया। उनके वतन की मोहब्बत की बात है कि लैला ए वतन को हमारे सामने लाया। जब बिकता है बाज़ार में बिकते हैं मज़दूरों के गोश्त… के लिखने से ही ऐसा लगता है कि वे मार्क्सीय हो गए थे। आम आवाम की फिक्र ही फ़ैज़ को मार्क्सीय से नजदीक लाता है। मार्क्स के शर्त पर फ़ैज शायरी के अर्थ देते हैं। जो जिंदगी के तर्जबों से मुखतलिब होते हैं। उनके यहां तहजीबी ललकार हैं। मार्क्स का पाठ पढ़ाने वाले रशीद खां जहां के बदौलत बचपन से इंसानियत का मंजर था उनमें। मैं समझती हूं कि वे मार्क्सवाद के बहुत करीब दिखते हैं।
एहतराम इस्लाम ने दखल देते हुए कहा कि गज़ल की क्या परंपरा रही है और फ़ैज़ ने उसे कितना तोड़ा और जोड़ा है। वे प्रगतिशील विचारधारा के मानने वाले थे। कहा जाता है कि फ़ैज़ परंपरावादी गज़लकार नहीं है जबकि इसे आगे बढाने में मीर, इकबाल, मजाज के साथ ही फ़ैज़ का नाम आता है। गज़ल ने गीत विधा के रूप में पहचनवाया। फ़ैज ने नज्मों को तोड़ा है गजलों को मूल्यों का आईना बनाकर पेश किया है। फ़ैज़ ने गजल की सिर्फ परंपरा को तोड़ने से अपने को बचाया। फ़ैज़ गजल के मिशाल थे।
बनारस से आए संजय श्रीवास्तव कहा कि फ़ैज़ को वर्ल्ड लिट्रेचर में लेकर जाएं। मूवमेट व जनता के कवि के रूप में मानते हैं बोल कि लब आजाद हैं…। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि जिस रूप में फ़ैज की कविता इंसानियत के लिए है वह विश्व कविता के रूप में आनी चाहिए। आज के साहित्यकारों में वह तड़प नहीं दिखती हैं जो कि मानवीयता के लिए अपने को समर्पित कर दें जैसा कि फ़ैज़ ने अपने को जेल में समय गुजारे। सालिहा जर्रीन ने भी अपने विचार से फ़ैज़ शायरी व शख्शियत से रू-ब-रू कराया।
कार्यक्रम के दौरान प्रो.एहतेशाम हुसैन और मसीहुज्जुमा द्वारा संकलित पुस्तक ‘इंतेखाबे जोशे’ का विमोचन मंचस्थ अतिथियों के द्वारा किया गया। सत्र का संचालन करते हुए ए.ए.फातमी ने कहा कि जो काम उर्दू विवि या उर्दू अकादमी को करना चाहिए वो काम हिंदी विवि ने किया। इसके लिए कुलपति विभूति नारायण धन्यवाद के पात्र हैं। सभागार तालियों से गूंज उठा।
इलाहाबाद के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक क्षेत्र सभागार में आयोजित मुशायरा एवं कवि सम्मेलन यादगार बनी। शायरी व कविता के फ़नकारों ने खास इश्किया अंदाज में प्रेम, भाईचारा, एकता व सौहार्द पर शायरी पेश कर उपस्थितों को खूब रिझाया। इस अवसर पर पंकज द्वारा निर्मित पोस्टर प्रदर्शनी आकर्षण के केन्द्र में थी। प्रेस-विज्ञप्ति






