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अब अन्धेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के

नये मीडिया के सन्दर्भ में एक कहानी बार-बार दोहराने योग्य हैं. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के एक गांव का सातवीं पास व्यक्ति काफी परेशान था मनरेगा की बे-इमानी को लेकर. उसे काम भी नहीं मिलता था और अधिकारियों से लांछित भी होना पड़ता था. उसे किसी ने फेसबुक के बारे में बताया. वो कस्बे के कैफे में गया और फिर नियमित जाने लगा. सीखा उसने फेसबुक और अपने गांव के भ्रष्टाचार की बात लिखने लगा. कुछ समय में ही उसकी मेहनत सफल हुई. बातें जिलाधिकारी तक पहुंचीं. उस व्यक्ति को बुलाया गया और न केवल उसे अच्छा काम दिया गया बल्कि सम्मानित भी किया गया अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम का इतने खबसूरत ढंग से उपयोग को लेकर. 
नये मीडिया के सन्दर्भ में एक कहानी बार-बार दोहराने योग्य हैं. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के एक गांव का सातवीं पास व्यक्ति काफी परेशान था मनरेगा की बे-इमानी को लेकर. उसे काम भी नहीं मिलता था और अधिकारियों से लांछित भी होना पड़ता था. उसे किसी ने फेसबुक के बारे में बताया. वो कस्बे के कैफे में गया और फिर नियमित जाने लगा. सीखा उसने फेसबुक और अपने गांव के भ्रष्टाचार की बात लिखने लगा. कुछ समय में ही उसकी मेहनत सफल हुई. बातें जिलाधिकारी तक पहुंचीं. उस व्यक्ति को बुलाया गया और न केवल उसे अच्छा काम दिया गया बल्कि सम्मानित भी किया गया अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम का इतने खबसूरत ढंग से उपयोग को लेकर. 
 
तो जुकरबर्ग ने भले फेसबुक को मित्रों के आपसी संवाद में आदान-प्रदान की सहूलियत के लिए फेसबुक का निर्माण किया लेकिन जाने-अनजाने आज यह माध्यम भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के तीसरे नागरिकों के दुःख-दर्दों का साझीदार बन कर भी सामने आया है. बाज़ार में ढेर सारे नए-नए फीचरों के साथ आते नित नए-नए मोबाइल सेट ने और मोबाइल सेवा प्रदाता कंम्पनियों के नाम मात्र के कीमत वाले प्लानों ने तो सच में इसे हम गरीबों का माध्यम बना डाला है.
 
कुछ दशक पहले तक भले ही पत्रकारिता, साहित्य और फिल्मों में जहां गांव-गरीब, किसान-मजदूर की बातों को जगह मिलती रही हो लेकिन आज आप मुख्यधारा कहे जाने वाले संचार माध्यमों में ऐसे किसी सरोकार की बात भूले-भटके भी नहीं सुन सकते. या यूं कहें कि ऐसी कोई भी खबरें बिरले ही आपकी आंखों से अब गुजरती हो जिसका कोई बाज़ार मूल्य नहीं हो. इसके अलावा साहित्य में भी, किस्से कहानियों में भी अब कोई पंच परमेश्वर, कोई बड़े घर की बेटी, कोई श्रीकांत या मैला आँचल, परती परिकथा के लिए कोई जगह नहीं होती न ही फ़िल्में आज दो गज ज़मीन के लिए या दो आंखें बारह हाथ के लिए बनती हैं. इश्क कमीना के इस ज़माने में मुन्नी को बदनाम करने वाले गीत-गान ही आज राष्ट्रीय सरोकार के विषय या फिर सनी लियोनी द्वारा कपड़ा पहन लेना राष्ट्रीय चिंता के विषय होते हैं. संविधान के 72-73वें संशोधन के बाद भले पंचायतों की मजबूती देख अखबारों में अब गांव-कस्बे के संस्करण भी निकाल लिए हों, भले कोक-पेप्सी की तरह अब इन संस्करणों ने गांव तक का रुख कर लिया हो लेकिन अखबार को आर्थिक रूप से फ़ायदा पहुचा सकने वाली खबरों को छोड़ दें तो उन पृष्ठों में ऐसे सरोकार कहीं नहीं देखने को मिलते.
 
ऐसे में सुदूर गांव-कस्बे में बैठा कोई जागरूक व्यक्ति आज जिस तरह इस नए मीडिया का इस्तेमाल कर अभिव्यक्त करने लगा है खुद को, यह काबिले गौर बात है और काबिले तारीफ़ भी. न केवल फेसबुक बल्कि ढेर सारे वेबसाइटों ने भी इस कमी को पूरा किया है. आप किसी कम नामचीन साईट पर भी लेख आदि लिखते हैं और उसका लिंक फेसबुक पर शेयर करते ही ग्लोबल हो जाते हैं. कंटेंट में अगर ज़रा भी दम रहा, कुछ नयी जानकारी भले ही जरा टूटे-फूटे शब्दों में भी रही तो वो जल्द ही वह मास तक कम्युनिकेट हो जाता है. फिर हर सूचना का चावल लेकर सुदामा की तरह द्वारिका-दिल्ली में आपको सकुचाते हुए खड़े होने की ज़रुरत नहीं होती. सूचना खुद माध्यम बन कर अपना पाँव फैला लेता है. आपके सूचना के बीज को वट वृक्ष बनने में फिर जरा सी ही देरी होती है. हाल-फिलहाल में इन्हीं गांव-खेड़ों से निकले-बने जनमत ने राजनीति में भी क्या कमाल दिखाया है, कैसे इसने राजनीति को भी प्रभावित किया है. किस तरह राष्ट्रीय दलों को भी अपना चेहरा बदल लेने को मजबूर किया है इस पर ढेर सारे उदाहरण देने की ज़रुरत नहीं है. जिस तरह एक बड़े राष्ट्रीय दल को अपना नेता तक घोषित करने में इस सोशल मीडिया ने दबाव बना कर अपनी बात मनवाई है यह तो राजनीति शास्त्र के अध्येताओं के लिए अचंभे का विषय ही है. कल के राजनीति विज्ञान के छात्र ‘रूसो’ के बोर सिद्धांतों से ज्यादा इन गाथाओं को पढ़ना पसंद करेंगे. 
 
अपनी इस उपलब्धि के अलावा इस माध्यम की एक और सबसे बड़ी विजय यह रही कि इसने दिल्ली दर्प दमन किया है. वहां बैठ कर सिगार सुड़कते हुए खुद को बौद्धिकता का समंदर समझते हुए संपादकों को बताया है कि आपको अब अभिव्यक्ति का बिचौलिया बनने की ज़रुरत नहीं है. आप बस नीरा राडिया में अपना साफल्य ढूंढते रहें, अपना दुःख-सुख हम आप ही बतिया लेंगे, बिना आपके ही. आपको न ही कष्ट करने के ज़रुरत है और न ही हमारे दुःख का सौदा कर हम आपको मर्सिडीज पर चढ़ने देंगे. आप हैं बड़े बुद्धि के गागर तो बने रहिये, राजनीति के आगे मेमिया कर भी जनता के आगे शेर बने रहिये लेकिन अगर मेरे खेत में बीज और खाद की कमी है या सिंचाई की ज़रुरत है तो इसी माध्यम का उपयोग कर हम शासकीय अधिकारियों का कंठ दबा सकेंगे. हमें कम से कम आपके जैसे बिचौलियों की ज़रुरत तो कतई नहीं है. बल्कि आपको भी अगर इस नए मीडिया का शौक चर्राया हो तो प्लीज़ कतार में खड़े होइए. काम लायक लगेगी आपकी बात तभी आपको लाइक करेंगे या कमेन्ट भी. ज्यादा बॉसगिरी दिखाया तो दो-चार सुना भी देंगे और ब्लोकिया-धकिया भी देंगे. खैर. 
 
पत्रकारिता के कुछ साल तक के पुराने छात्रों ने भले इस मीडिया के बारे मे कुछ नहीं पढ़ा हो लेकिन अब तो यह माध्यम पत्रकारिता समेत सभी शैक्षिक संस्थानों में विमर्श का विषय हो गया है. पहले कभी आकाशवाणी के छोटे-छोटे ‘एलआरएस’ (लोकल रेडियो स्टेशन) ने गांव तक की बात कहने का दायित्व लिया था लेकिन उसमें भी जनता की भूमिका बस रिसीवर तक की थी. उसमें उनकी कोई सहभागिता नहीं थी. लेकिन इस माध्यम ने हर श्रोता को वक्ता भी बनाया है. रेडियो या आजकल के कम्युनिटी रेडियो से भी जुड़ना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं थी. लेकिन सभी सम्प्रेषण विधाओं को एक तकनीक में समेट देने वाले इस माध्यम ने तो आपको ऑडियो, विडिओ, टेक्स्ट, कार्टून, एनीमेशन सबका बादशाह बना दिया है. जिस भी विधा में आप अपनी बात कहना चाहें, फेसबुक है न. पत्रकारिता के कुछ साल भी पुराने छात्रों ने भले नए मीडिया के बारे में नहीं पढ़ा हो लेकिन अब पत्रकारिता समेत सभी शैक्षिक संस्थानों के लिए यह विषय, विमर्श का हो गया है. हाल ही में वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ने इस पर एक दो-दिनी सेमिनार का आयोजन किया. भोपाल और दिल्ली आदि में लगातार ऐसे सेमिनार आयोजित हो रहे हैं. यानी देश की राजधानी से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक में अब लोग जुट रहे हैं. अभिव्यक्ति के इस नए आकाश तक कैसे और अच्छे पंखों के साथ परवाज़ कर सकें, इस पर विमर्श कर रहे हैं. 
 
प्रसन्नता की बात है कि पूर्वांचल के देवरिया में कुछ उत्साही मित्रों ने भी इस विधा पर विमर्श करने के लिए एक गोष्ठी का आयोजन किया है. जिस देवरिया की पवित्र भूमि ने प्रदेश-देश को एक से एक साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी मुहैया कराये हों वहां यह गोष्ठी नए मीडिया के क्षेत्र में भी एक नयी तरह से प्रेरणा देने का काम करेगी. देश के अन्य छोटे-छोटे क्षेत्रों तक के लोग इससे प्रेरणा लेकर अपने यहां भी अभिव्यक्ति के इस सबसे अनोखे, सबसे सुन्दर, सबसे सरल, सबसे सस्ते, सबसे तीव्र माध्यम का उत्सव मनाने को क्रमशः इकट्ठा होंगे यही उम्मीद भी और यही शुभ कामना भी. आयोजकगणों को अशेष साधुवाद.
 
लेखक पंकज झा पत्रकार और बीजेपी नेता है. वर्तमान में वे भाजपा के छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखपत्र दीपकमल पत्रिका के संपादक के रूप में कार्यरत हैं. पंकज से  [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


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