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सुख-दुख...

अब तो बस आलोक की यादें ही शेष हैं

हमारे बीच से अचानक चले जाने वाले तेज तर्रार और जुझारू पत्रकार आलोक तोमर का आज जन्‍म दिन है. भूलोक से विदा लेने के बाद पहला जन्‍म दिन. उनसे जुड़ा हर कोई उन्‍हें याद कर रहा है. अगर यह कहा जाए कि भूला ही नहीं है तो बिल्‍कुल गलत नहीं होगा. इन लोगों को लगता है कि आलोक कहीं आसपास ही है, और कभी भी आ सकता है. भिंड का यह शेर नाम का ही आलोक नहीं था, बल्कि पत्रकारिता को भी उसने नाम के अनुरूप ही अलौकिक किया.

हमारे बीच से अचानक चले जाने वाले तेज तर्रार और जुझारू पत्रकार आलोक तोमर का आज जन्‍म दिन है. भूलोक से विदा लेने के बाद पहला जन्‍म दिन. उनसे जुड़ा हर कोई उन्‍हें याद कर रहा है. अगर यह कहा जाए कि भूला ही नहीं है तो बिल्‍कुल गलत नहीं होगा. इन लोगों को लगता है कि आलोक कहीं आसपास ही है, और कभी भी आ सकता है. भिंड का यह शेर नाम का ही आलोक नहीं था, बल्कि पत्रकारिता को भी उसने नाम के अनुरूप ही अलौकिक किया.

अपने अक्‍खड़पन तथा पत्रकारिता के इशु को लेकर किसी से भी टकरा जाने वाले इस शख्‍स ने जीवन में कई परेशानियां भी झेली, पर कभी किसी के सामने झुका नहीं. भाषा पर पकड़ रखने वाला पत्रकार हमारे बीच नहीं है, पर उनसे जुड़ी बातों को लेकर उन्‍हें याद करने वाले कम नहीं हैं. उनकी पत्‍नी तथा उससे भी ज्‍यादा दोस्‍त सुप्रिया अपने आलोक को बहुत मिस करती हैं. आलोक जी के जन्‍म दिन और उसकी तैयरियों के बारे में पूछे जाने पर उन्‍होंने कहा कि अब उनकी यादें ही तो शेष रह गई हैं. हम आलोक के जन्‍म दिन पर कुछ खास तैयारियां तो नहीं करते थे, पर काम निपटाकर बाहर खाना खाने या घूमने चले जाते थे, पर काम की व्‍यस्‍तता होती थी तो ये भी नहीं हो पाता था. आलोक हमारी यादों में हैं और इससे ज्‍यादा बोल पाने की स्थिति नहीं है.

आलोक तोमर के नजदीकी रहे अशोक वानखेडे ने कहा कि आलोक तोमर खुद को पत्रकार समझते ही नहीं थे. वे हमेशा अपने को आम आदमी के बीच रखा तथा जन सरोकार को लेकर लड़े. वे हमेशा जनसरोकार के इशु पर लड़ने के लिए निकल पड़ते थे. इशु को लेकर वो अपने नजदीकी से भी कभी कंप्रोमाइज नहीं करते थे. इसको लेकर उनके तमाम अपने लोगों से विवाद भी हुए, तमाम लोग नाराज भी हुए पर वो कभी पीछे नहीं हटे. जो जानते थे कि आलोक ऐसे ही हैं उनसे आलोक की दोस्‍ती बनी रही. आलोक खबर के लिए बस खबर नहीं लिखते थे, जैसे आज के पत्रकार कर रहे हैं. वे खबर पर काम करते थे, जनसरोकार की खबरों को लेकर वे बेचैन रहते थे. आम आदमी की परेशानी आलोक की खबरों में होती थी. आलोक की भाषा पर जबर्दस्‍त पकड़ थी, साधारण खबरें भी जोरदार लगती थीं.

जब आलोक बीमार थे तब भी उसी अंदाज में अपनी जिंदगी जी रहे थे. अपनी बीमारी को आलोक भी जानते थे फिर भी ऐसा व्‍यवहार करते थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो. आलोक हजारों-लाखों युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं. एक बार जब हम और रवींद दुबे बीमारी के दौरान उनसे मिलने पहुंचे तो उन्‍हों ने अपनी बीमारी को नजरअंदाज करते हुए कहा कि बताओं क्‍या मंगाऊं. यही आलोक के जीने का तरीका था. आलोक भाई ने तो कैंसर को भी मात दे दी थी, पर उनकी मृत्‍यु हार्ट अटैक से हुई, जिसके बारे में हम लोगों ने सोचा ही नहीं था. आलोक पर साइड से आकस्मिक हमले किए गए. आलोक परेशान भी रहे पर कभी वो झुके या टूटे नहीं. जो पत्रकारिता करते हैं आलोक उन्‍हें पल-पल याद आते रहेंगे.

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