Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

अमर उजाला, अमेठी के पत्रकार अरविंद शुक्‍ला का निधन

अमेठी के युवा पत्रकार अरविन्द शुक्ला का गत मंगलवार को किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ में निधन हो गया। तबियत खराब होने पर उन्हें पहले सुलतानपुर में एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया फिर हालत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिया गया था। लगभग 40 वर्षीय श्री शुक्ला इस समय अमर उजाला से जुड़े हुए थे। इससे पूर्व वह दैनिक जागरण से भी जुड़े रहे थे। 

अमेठी के युवा पत्रकार अरविन्द शुक्ला का गत मंगलवार को किंग जार्ज मेडिकल कालेज, लखनऊ में निधन हो गया। तबियत खराब होने पर उन्हें पहले सुलतानपुर में एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया फिर हालत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिया गया था। लगभग 40 वर्षीय श्री शुक्ला इस समय अमर उजाला से जुड़े हुए थे। इससे पूर्व वह दैनिक जागरण से भी जुड़े रहे थे। 

श्री शुक्ला के आसमयिक निधन की घटना ने उनके परिजनों को ही नही बल्कि उनके पत्रकार एवं गैर पत्रकार शुभचिन्तकों को भी झकझोर कर रख दिया है। बुधवार को अमेठी के पास स्थित पैतृक गांव में उनकी अन्त्येष्टि हुई, जिसमें उन्हें अन्तिम विदाई देने के लिए जुटी भारी भीड़ ने उनकी आम एवं खास लोगों के बीच पैठ को प्रदर्शित किया। अमेठी के सांसद एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा. संजय सिंह तथा उत्तर प्रदेश के खनन राज्यमंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति ने श्री शुक्ला के निधन पर शोक व्यक्त किया है।  

मंगलवार की सुबह की शुरुआत ऐसी अमंगल खबर से होने की उम्मीद नहीं थी। शोक में डूबे पत्रकार राजेश मिश्रा ने खबर दी कि अरविन्द शुक्ल नहीं रहे। खबरों की दुनिया में अरविन्द को जानने चाहने वालों की संख्या काफी है। गांधी परिवार के कारण अमेठी पहुंचने वाले लखनऊ दिल्ली सहित तमाम स्थानों के पत्रकारों को अरविन्द से मिलना बहुत जरूरी होना था। उनकी स्मृति अद्भुत थी। अमेठी में गांधी परिवार के जुड़ाव और सक्रियता के सिलसिलेवार ब्यौरे उनकी जुबान पर थे।

चालीस साल के अरविन्द शुक्ल पिछले दो दशकों से अमेठी की पत्रकारिता से सक्रिय रूप से जुड़े थे। यहां की हर छोटी बड़ी खबर पर उनकी नजर थी और उनकी बेहतर प्रस्तुति की क्षमता और कौशल उनके पास था। छोटी जगहों पर रहकर भी कैसे बड़ी खबरें की जा सकती इसका उदाहरण वह तमाम रिपोर्टिंग है जो इस बीच अरविन्द करते रहे। जिज्ञासु प्रकृति और पढ़ने की प्रवृत्ति ने उनकी जानकारी को विस्तार दिया था। खबरों को भांपने और फिर उनकी तह तक पहुंचकर पीछे का सच जानने के प्रयासों ने उनके अमेठी शहर में भी तमाम प्रशंसक बनाये। आमतौर पर अखबार छोटे स्थानों पर काम करने वाले अपने संवाददाताओं से राजनीतिक खबरें लिखवाने में परहेज करते हैं। लेकिन अरविन्द ने अपनी विश्लेषण क्षमता और तथ्यपरक प्रस्तुति से ऐसे मौके बार-बार हासिल करके अखबार की डेस्क से लेकर पाठकों तक को अपना कायल बनाया।

हिन्दी दैनिकों में जिलों के पन्नों के खबरों के लिहाज से दो पहलू हैं। एक यह है कि वहां की खबरें लिखने वालों का खूब मौका मिल रहा है। दूसरा पहलू फिक्रमंद करने वाला है। तमाम अच्छी खबरें और लेखन एक छोटे दायरे में सिमट कर रह जाता है। नतीजतन अनेक प्रतिभाएं उस मुकाम में वंचित रह जाती है, जिसकी वे अपनी योग्यता के कारण हकदार होती हैं। अरविन्द इन सीमाओं से लगातार निकलने की कोशिश में लगे रहे। दो प्रमुख अखबारों से उनका जुड़ाव रहा, जिसमें उन्होंने तमाम ऐसे खबरें, फीचर लिखे जिन्हें पाठकों ने खूब सराहा। इधर कुछ समय से वे कसमसा रहे थे। अखबार की बन्दिशों के बीच चाहकर भी वे ऐसा नहीं लिख पा रहे थे, जिसे वे जरूरी समझते थे। भाविष्य की योजनाओं को गढ़ते अरविन्द कभी अपने साथियों की स्टोरी संवारते तो कभी उन्हें इन्ट्रो सुझाते हमेशा मदद को तैयार रहते। अमेठी के किसी भी घटनाक्रम के साथ अरविन्द के मोबाइल की व्यस्त टोन लम्बी खिंचती जाती। बाहर के पत्रकारों के लिए अरविन्द से भरोसेमंद शायद कोई स्त्रोत नहीं थे।

अपने मृदु व्यवहार और साफ सुथरी पत्रकारिता के जरिए स्थानीय स्तर पर भी अरविन्द ने बड़ी संख्या में प्रशंसक बनाये। उनके निधन की खबर के बाद निवास पर जुटी शोकाकुल भीड़ और श्रद्धांजलि देने वालों का तांता इसका प्रमाण था। मेरा तो उनसे दूसरी पीढ़ी का साथ था। अरविन्द के पिता श्री राममूर्ति शुक्ल और मैंने साथ पत्रकारिता शुरू की। पिता अन्यंत्र व्यस्त हुए तो पुत्र अरविन्द साथ हो लिए। दो दशकों के बीच अरविन्द ने जब भी कुछ खास लिखा तो टेलीफोन पर मैं पहला श्रोता होता था। पता नहीं फोन पर ही कितनी खबरें बनी बिगड़ी। पिता का मित्र होने के नाते उनसे पिता जैसा सम्मान मिला। लेकिन पत्रकारिता में तो वे सिर्फ साथी थे। ऊर्जा उत्साह से भरे इस भरोसेमंद साथी का साथ बिछड़ना विचलित कर रहा है। कानों में आवाज गूंज रही है, ‘खबर का ये ऐंगिल देखिए’।

राज खन्‍ना

पत्रकार

सुल्‍तानपुर

(प्रेषक – अशोक कुमार साहू, यूनीआई संवाददाता, रायपुर)

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...