अमर उजाला के तीन मीडियाकर्मियों को सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा फेलोशिप चयन मामले में खबर आ रही है कि तीनों लोग संस्थान को अंधेरे में रखकर अपना फेलोशिप कर रहे हैं. हालांकि बातचीत में इन लोगों साफ इनकार किया है कि ये लोग फेलोशिप कर रहे हैं. परन्तु मंत्रालय की वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से इन लोगों का नाम चयनित लोगों में अब भी शामिल है. सूत्रों का कहना है कि ये लोग अमर उजाला प्रबंधन को अंधेरे में रखकर फेलोशिप पूरा कर रहे हैं.
सूत्र यहां तक बता रहे हैं तीनों पत्रकार अपनी त्रैमासिक रिपोर्ट भेज रहे हैं. जबकि इनके प्रोफाइल को देखते हुए ही प्रबंधन ने इस फेलोशिप पर आपत्ति जताई थी. इस बारे में एक संपादक का का कहना है कि कोई भी पत्रकार अपने संस्थान से अनुमति लेकर फेलोशिप कर सकता है. परन्तु संस्थान यह देखता है कि फेलोशिप करने वाले पत्रकार की प्रोफाइल क्या है. अगर वह डेस्क पर कार्यरत हैं तो ज्यादातर संस्थान आपत्ति नहीं जताते हैं, क्योंकि उनके काम के घंटे निर्धारित होते हैं, परन्तु अगर वो रिपोर्टर अथवा फोटोग्राफर होता है तो ज्यादातर संस्थान इस पर आपत्ति जताते हैं. कारण कि रिपोर्टिंग और फोटोग्राफी अखबार में चौबीस घंटे का कार्य माना जाता है.


इस मामले में भी दिलचस्प तथ्य यह है कि कुलदीप कुमार श्रीवास्तव डीएनई होने के साथ सिटी चीफ हैं तो अनिल सिद्धार्थ रिपोर्टर हैं. तीसरे संजय बनौधा फोटोग्राफर हैं. लिहाजा तीनों लोगों का वर्क प्रोफाइल रिपोर्टिंग से ही जुड़ी हुई है. शायद इसीलिए संस्थान ने इन लोगों के फेलोशिप पर आपत्ति भी जताई हो. पर जो खबर आ रही है उसमें यह बताया जा रहा है कि संस्थान की आपत्ति के बाद ये लोग चोरी-छिपे फेलोशिप कंप्लीट कर रहे हैं. फेलोशिप 2013 तक पूरा करना है.
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