उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद के मिहींपुरवा कस्बे के अमर उजाला के पत्रकार सुधीर मदेशिया के ऊपर पुलिस प्रशासन ने आगज़नी और लूट-पाट सम्बन्धी तमाम मामलों में जनपद के मोतीपुर थाने में एफ.आई.आर. दर्ज कर रखी है. जबकि इस पत्रकार का कुसूर सिर्फ इतना ही था कि वह पत्रकार होने के नाते कस्बे में दुर्गा पूजा के दौरान हुई आगज़नी और साम्प्रदायिक तनाव की घटना को कवर करने के लिए घटनास्थल पर गया था.
सुधीर मदेशिया जहाँ स्वयं अमर उजाला के बहराइच में लांचिंग के समय से ही उससे जुड़ा हुआ हैं. वहीँ उसके पिता दिलीप नारायण मदेशिया भी हिन्दुस्तान अखबार की लांचिंग के समय से ही करीब 11 वर्षों से उसके मिहींपुरवा कस्बे के संवाददाता हैं. सुधीर मदेशिया पर दर्ज हुए इस एफ.आई.आर. की पृष्ठभूमि में एक स्थानीय सत्ता पक्ष के कद्दावर नेता का हाथ माना जा रहा है. 27 सितम्बर से कस्बे में एक बहुचर्चित हत्याकांड का खुलासा इस पत्रकार पिता-पुत्र की जोड़ी ने अपने-अपने अखबारों में किया था. इस हत्याकांड में फिरौती लेने के बाद हत्या हुई थी. इस घटना के सामने आने और इसके तार कुछ लोगों से जुड़े होने के कारण तथा पुलिस द्वारा इसके खुलासे में नाकाम रहने के कारणों का विस्तार से पत्रकार सुधीर मदेशिया द्वारा खुलासा किया गया. इन्ही बातों को लेकर पुलिस और कुछ दबंग नेताओं के निशाने पर सुधीर बना हुआ था.
इसी नाराजगी का खामियाजा इन्हें उस समय उठाना पड़ा जब मिहींपुरवा कस्बे में 7 अक्टूबर को दुर्गा पूजा के दौरान हुई साम्प्रदायिक तनाव और आगज़नी को कवर करने गये. इस घटना में आगज़नी और तमाम तोड़-फोड और लूट की घटनाओं में पहले से ही लोगों और पुलिस के निशाने पर रहे अमर उजाला के इस पत्रकार को उपद्रवी के रूप में प्रशासन ने चिन्हित कर लिया गया. उसके बाद इस पर एक साथ तीन एफ.आई.आर. दर्ज हुई, जिसमें एक तो तत्कालीन मोतीपुर थानाध्यक्ष के द्वारा स्वयं वादी के रूप में दर्ज कराइ गई. इस पूरी घटना को बीते करीब 3 माह का समय गुजर जाने के बाद भी सुधीर मदेशिया को जमानत नहीं मिल सकी है. इसी के साथ ही उसका पूरा परिवार अनजान भय की आशंका से ग्रसित बना हुआ है. इस मामले दो बड़े नाम वाले अखबारों के पत्रकारों का मामला होने के बाद भी दोनों अखबारों की तरफ से ना तो स्थानीय और ना ही ऊपर के लोगों से सुधीर के पक्ष में कुछ भी किया गया है. जिससे उसे कोई राहत मिल सके.
अखबार के माध्यम से अपनी कारगुजारियों और रौब ग़ालिब करने वाले स्टाफ से भरा अमर उजाला जो अभी हाल में ही अपने जिला संवाददाता के हटाने के भीतरघाती तरीके से पूरे जनपद के पत्रकारों में चर्चित है. उसने भी अपने इस पत्रकार की कोई मदद नहीं की है. इसी के साथ ही हिन्दुस्तान जो अब अपने काम से ज्यादा नाम से चर्चित है, उसकी ओर से से भी कोई भी राहत की बात नहीं की गई है. एक कस्बाई पत्रकार की चुनातियों और उसके पीछे लाबी के ना होने का खामियाजा इस पत्रकार को भुगतना पड़ रहा है. एक पत्रकार के साथ घटित इन घटनाओं पर अखबारों का चुप होना उचित नहीं लगता है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






