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अमर उजाला के मामले में काटजू की ‌‌हि‌दायत बहुगुणा सरकार के ठेंगे पर

उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार अमर उजाला के साथ मनमानी पर उतर आई है। सरकारी कामकाज की तार्किक आलोचना के एवज में अमर उजाला को जनता के पैसे से ‌मि‌लने वाला सरकारी विज्ञापन रोकने का तुगलकी फैसला करते वक्त इस पूर्व जस्टिस की सरकार ने नियम-कानून भी नहीं विचारा और उसने हफ्ते भर पहले ही प्रेस काउंसिल‌ के अध्यक्ष ‌रिटायर जस्टिस मार्केंडेय काटजू की हिदायत की भी परवाह नहीं की।

उत्तराखंड की विजय बहुगुणा सरकार अमर उजाला के साथ मनमानी पर उतर आई है। सरकारी कामकाज की तार्किक आलोचना के एवज में अमर उजाला को जनता के पैसे से ‌मि‌लने वाला सरकारी विज्ञापन रोकने का तुगलकी फैसला करते वक्त इस पूर्व जस्टिस की सरकार ने नियम-कानून भी नहीं विचारा और उसने हफ्ते भर पहले ही प्रेस काउंसिल‌ के अध्यक्ष ‌रिटायर जस्टिस मार्केंडेय काटजू की हिदायत की भी परवाह नहीं की।

काटजू साहब के स्पष्ट निर्देश थे कि सरकार किसी भी अखबार का विज्ञापन रोकने का एकतरफा फैसला नहीं कर सकती। अगर उसे किसी खबर पर आपत्ति है तो पहले उस अखबार को नोटिस जारी कर जवाब मांगे, फिर कोई फैसला करे। लेकिन अमर उजाला के साथ ऐसा नहीं किया गया।

दरअसल इसके पीछे जोड़-तोड़ कर सूचना विभाग में लौटे महानिदेशक विनोद शर्मा की नाशकारी सोच है। इसकी चाल में फंसी सरकार ने ऐसा कदम उठाया जो उसे बहुत ही भारी पड़ने जा रहा है। काटजू के कहर से बचने के लिए शर्मा ने अखबार को पहले की तरह 18-20 सरकारी विज्ञापन की जगह महज एकाध विज्ञापन ही जारी करने का आदेश दिया है। सरकार और विनोद शर्मा जैसे उसके शातिर कारिंदों को मुगालता था कि विज्ञापन रोकते ही अमर उजाला के हाथ-पांव फूल जाएंगे और वो अपना रवैया बदल लेगा लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी। अमर उजाला इस सब से बेपरवाह पहले की ही तरह डटकर सरकार के निकम्मेपन की पोल-पट्टी खोलकर जनता का पसंदीदा अखबार बना हुआ है। सरकार बजाय अपनी मशीनरी दुरुस्त करने के और रिजल्ट देने के इस तरह ओछे हथकंडे अपना रही है जिसकी राज्य के बुद्धिजीवी वर्ग भी निंदा कर रहा है।

मालूम हो कि बहुगुणा सरकार के एक साल के कामकाज में जनता के संकट और बढ़ गए और मुख्यमंत्री ने जनता से इस कदर मुंह मोड़ रखा है कि गाहे-बगाहे लगने वाले जनता दरबार को पैसा बचाने की दलील देकर खत्म कर दिया है। सीएम के पास दिल्ली में अपने आकाओं के दरबार में हाजिरी लगाने के लिए तो हफ्ते में चार दिन निकल आते हैं, लेकिन सार्वजनिक घोषणा करने के बाद भी वे पहाड़ की जनता का दुखदर्द समझने के लिए किए जाने वाले दौरे को भूल जाते हैं। जनता से इसी बेरुखी का खामियाजा टिहरी संसदीय चुनाव में उनका धंधेबाज बेटा साकेत बहुगुणा भुगत चुका है। अब निकाय चुनाव में और फिर अगले आम चुनाव में भी कांग्रेस की बहुगुणा जी के नेतृत्व में लुटिया डूबना तय है, ऐसी सोच खुद कांग्रेस में ही पुख्ता हो चुकी है।

एक साल की इस सरकार के दौरान कामकाज के नाम पर या तो मंत्रियों के अपनी पसंदीदा चहेती महिला अफसरों के साथ ‌इंग्लैंड, स्वीडन, जापान जैसे देशों के दौरे हुए हैं या वे दिल्ली में मौजमस्ती करते रहे हैं। सरकार में हर मंत्री पैसे बनाने में लगा है और भू माफिया को फायदा पहुंचाने के लिए भूमि कानून तक बदले जा रहे हैं।

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