अमर उजाला के तेज तर्रार पत्रकारों में शुमार धर्मवीर की आईपीएस अधिकारी आशुतोष द्वारा की गयी पिटाई और अखबार में दो लाइन की खबर भी नहीं छपने से दुखित पत्रकार के सम्बन्ध में लोग संपादक मृत्युंजय से जानना चाहते हैं कि -आफिस क्यों नहीं आ रहे धर्मवीर सिंह. संपादक में नैतिक साहस हो तो वे इस बात का खुलासा करें. धर्मवीर सिंह छात्र जीवन से ही सरल स्वभाव और मान सम्मान के साथ जीने वाले युवक हैं. अमर उजाला जैसे टिमटिमाते हुए अखबार के जुझारू पत्रकार हैं.
स्थानीय संपादक मृत्युंजय और एसएसपी आशुतोष की मौजूदगी में पत्रकार धर्मवीर ने आईपीएस अधिकारी आशुतोष का प्रतिवाद किया था और कहा था कि मुझे भाई मत कहो. संपादक और उसके चंगू-मंगू समझ गए कि बस इतने से समझौता हो गया. जिस शहर में बचपन से लेकर जवानी तक जिस धर्मवीर की इज्जत थी, प्रतिष्ठा थी, उसी शहर में वह अपमानित होकर मुंह दिखाए, यह संभव नहीं है. प्रतिकार होना चाहिए था. लेकिन संपादक ने हाथ खींच लिया. धर्मवरी को दर्द यह भी है कि अखबार कम से कम खबर प्रकाशित करता ताकि शासन प्रशासन तक यह संदेश तो जाता कि जो कुछ हुआ है वह गलत है और दोषी के खिलाफ न्यूनतम कार्रवाई तो होनी ही चाहिए, लेकिन सब कुछ हजम कर गए संपादक और अखबार.
धर्मवीर के ही नहीं गोरखुपर के अन्य दूसरे पत्रकारों के सीने भी एक आग जल रही है. एक तड़प है. यह आग और तड़प तो तब ही बुझेगी जब आरोपी आईपीएस अधिकारी पर करवाई हो. पत्रकार चाहते हैं कि शासन स्तर से कार्रवाई हो ताकि ऐसे करने वाले उदंड और सत्ता मद में रहने वाले अधिकारियों को सबक मिले. पत्रकारों ने तय किया है कि यदि शासन स्तर से एसएसपी के विरुद्ध करवाई नहीं होती है तो आज नहीं तो कल न्यायालय के माध्यम से कार्रवाई जरूर होगी. हो सकता है तब तक यह देखने के लिए संपादक गोरखपुर में न रहें, लेकिन एक सवाल तो लोगों को परेशान किये ही है कि आफिस क्यों नहीं आ रहे धर्मवीर?
गोरखपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





