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अमर उजाला ने उत्तराखंड के ‘नीरो’ को नंगा कर दिया

आपदा राहत में लापरवाही पर उत्तराखंड के नीरो की ख्याति से नवाजे जा रहे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अमर उजाला अखबार ने 17 जुलाई के अंक में नंगा कर दिया। 'टीवी पर विरोध देख दौड़े सीएम' नामक शीर्षक के समाचार में बताया गया कि बहुगुणा आपदा पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में हरिद्वार नहीं पहुंच पाए, जब उन्हीं की पार्टी के नेताओं के बयान आए तो वे वहां गए।

आपदा राहत में लापरवाही पर उत्तराखंड के नीरो की ख्याति से नवाजे जा रहे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अमर उजाला अखबार ने 17 जुलाई के अंक में नंगा कर दिया। 'टीवी पर विरोध देख दौड़े सीएम' नामक शीर्षक के समाचार में बताया गया कि बहुगुणा आपदा पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में हरिद्वार नहीं पहुंच पाए, जब उन्हीं की पार्टी के नेताओं के बयान आए तो वे वहां गए।

'ग्राम प्रधानों की सीएम से क्या बात हुई, पता नहीं' वाले हेडिंग के समाचार में सीएम सचिवालय की लुंज-पुंज कार्यशैली का वर्णन है, जबकि 'अफसरों की लेटलतीफी से नहीं बंट सके राहत के चेक' हेडिंग वाली खबर में बताया गया कि अफसरों की लापरवाही के चलते सीएम अपनी घोषणा के मुताबिक चेक नहीं बांट पाए। इसके लिए अमर उजाला बधाई का पात्र है, क्योंकि कुछ अखबार और चैनल कई दिन से आपदा पर सीएम और उत्तराखंड सरकार की कार्यशैली पर सॉफ्ट कॉर्नर अपनाए हुए हैं, इससे दाल में कुछ काला लगता है, जबकि अमर उजाला आरंभ से ही इस मसले पर साहसिक और अपेक्षित रिपोर्टिंग कर रहा है।

यूं तो सच्चाई को समाज के सामने रचनात्मक ढंग से परोसना मीडिया का दायित्व है, लेकिन कुछ अखबार उत्तराखंड में इसके विपरीत हैं। अमर उजाला के प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले एक अखबार का तो क्या कहना। कुछ दिन पहले उसमें सीएम का एक इंटरव्यू छपा, जो कि सौ फीसदी प्रायोजित लग रहा था। उसमें रिपोर्टर द्वारा पूछे गए सवाल ऐसे लग रहे थे, मानों शासन ने ही ये तय किए। आपदा पर असल सवाल पूछे ही नहीं गए। लगता है वह एक प्रकार का विज्ञापन था। वैसे भी जब अखबार वालों के बहुत से अन्य धंधे भी हों तो सरकारों से हाथ तो मिलाना ही पड़ता है। ऐसे में कई सचाइयों को उजागर न करन उनकी कथित मजबूरी बन जाती है। साथ ही कई बार उन्हें सरकारों से ‘जजमानी‘ भी तो लेनी पड़ती है।

अमर उजाला का उक्त प्रतिद्वंद्वी अखबार इस मामले में नंबर एक बताया जाता है। इसलिए वह सरकारों की पोल कम ही खोलता है। मुख्यमंत्रियों से मित्रता इस अखबार का शगल बताया जाता है, तभी तो मोटे विज्ञापन भी मिलेंगे। खैर विजय बहुगुणा को ही क्या दोष दें। बताते हैं कि प्रदेश के एक सीएम साहब, जो कि छपास रोग से बहुत पीड़ित थे, अपने कार्यकाल में अखबारों में मनमुताबिक खबर भिजवाकर बाकायदा हेडिंग भी बता देते थे। उनके कार्यकाल में उन पर लगे कुछ आरोपों को तो कई अखबार पी गए थे। ….चलिए ये पब्लिक है सब जानती है, कितने दिन तक पिंडालू यानी अरबी के पत्तों से तन ढके रखोगे? हवा का झोंका आएगा, नंगे हो जाओगे…

देहरादून से डॉ. वीरेंद्र बर्तवाल की रिपोर्ट.

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