मुझे श्री कमाल आर खान @kamaalrkhan, जो ट्वीटर पर स्वयं को एक्टर/प्रोड्यूसर/फिल्म क्रिटिक/फिल्म बिजिनेस विशेषज्ञ कहते हैं, का मुझसे सम्बंधित एक ट्वीट देखने को मिला. श्री खान निश्चित रूप से एक अत्यंत लोकप्रिय व्यक्ति होंगे क्योंकि मात्र ट्वीटर पर ही उनके 129898 फॉलोवर हैं जबकि वे स्वयं मात्र 22 लोगों को फालो कर रहे हैं.
मेरे बारे में श्री खान का ट्वीट था- “अमिताभ ठाकुर को मेरे नाम के सहारे पब्लिसिटी पाने का मौका मिला है. इससे पहले उन्होंने निर्मल बाबा केस से पब्लिसिटी पायी. हर आदमी लोकप्रिय होना चाहता है.” मैं श्री खान के अंतिम वक्तव्य से असहमत नहीं हूँ कि हर व्यक्ति लोकप्रिय होना चाहता है. अगर सौ फीसदी लोग ऐसे नहीं भी हों तो भी कम से कम सत्तर फीसदी लोग तो संभवतः निश्चित रूप से लोकप्रिय होना पसंद करेंगे. मैं श्री खान की इस बात से भी सहमत हूँ कि उनसे जुड़ा कोई भी मुद्दा लोगों की निगाह खींचेगा और मुझे भी इससे कुछ ध्यान मिलेगा. यह भी सही है कि निर्मल बाबा मामले से मुझे और मेरे दोनों बच्चों को कुछ लोकप्रियता अथवा सम्मान अवश्य मिला था.
मैं श्री खान की इस बात का भी अकारण विरोध नहीं करूँगा कि धनी और चर्चित लोगों के विरुद्ध कार्य करने के अपने फायदे और लाभ हैं, जिनमे लोगों का ध्यानाकर्षण और कई बार बहादुरी की वाहवाही भी शामिल है. लेकिन इन बातों से अलग जो एक बात मुझे बहुत अजीब लगी वह यह कि श्री खान के इस ट्वीट में कहीं भी उनकी तरफ से यह नहीं दिख रहा था कि उन्होंने कोई गलती की है. मुझे यह सचमुच कष्टप्रद लगा कि एक आदमी जिसके ट्वीटर पर लाखों फॉलोवर हैं और उससे कई गुणा अधिक शायद जमीन पर हों, जो एक बहुचर्चित व्यक्ति है और इसके बाद भी उसे इस बात पर एक बार शर्म तक महसूस नहीं हो रही है कि उसने जो कहा है वह ना सिर्फ अत्यंत ही आपत्तिजनक और घृणित है बल्कि आपराधिक भी है.
राँझना फिल्म की अपनी 20 जून 2013 को यूट्यूब पर लोड हुए 9.40 मिनट के इस वीडियो रिव्यू में श्री कमाल खान ने दो अनुसूचित जातियों के प्रति अत्यंत ही निंदनीय आपराधिक टिप्पणी की. उन्होंने फिल्म के हीरो श्री धनुष के लिए जो कुछ आपत्तिजनक कहा सो कहा, साथ ही यह भी कहा है- “सर, पता नहीं आप यूपी से हैं या नहीं है, बट मैं यूपी से हूँ. पूरे यूपी में जैसा धनुष है वैसे आपको #@$ मिलेंगे, #$^@ मिलेंगे, (दो अनुसूचित जाति) बट एक भी इतना सड़ा हुआ पंडित आपको पूरे यूपी में कहीं नहीं मिलेगा.”
श्री खान की यह टिप्पणी सीधे-सीधे जातिसूचक है और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(x) के अंतर्गत अपराध है. मुझे यह जान कर घोर आश्चर्य हो रहा है कि आज के समय कोई भी आदमी इस तरह की बेतुकी और अनुचित टिप्पणी कैसे कर सकता है, जहाँ वह सीधे-सीधे जो जातियों के प्रति इस प्रकार की अपमानजनक भाषा का प्रयोग करे. यह बात भी मुझे अत्यंत ही गलत लगी कि सम्बंधित व्यक्ति द्वारा इसे ऐसे कहा जा रहा है मानो कोई बड़ी बात नहीं हो और उनका हक हो. यह सोच निश्चित रूप से गंभीर और खतरनाक है. इस प्रकार के शब्द तब और भी गंभीर हो जाते हैं जब यह ज्ञात होता है कि टिप्पणी करने वाला व्यक्ति कथित रूप से जिम्मेदार व्यक्ति है और जिन जातियों पर टिप्पणी की गयी है, वह टिप्पणी स्पष्ट रूप से आपराधिक कृत्य है.
अतः श्री खान के इस ट्वीट पर कि मैंने ऐसा लोकप्रियता पाने के लिए ऐसा किया है, यह संभव है कि उन्होंने सही कहा हो और मेरी उनके नाम के सहारे दो मिनट की पब्लिसिटी पाने की मंशा भी हो, पर साथ ही क्या यह अच्छा नहीं होता कि मेरे सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालने के अलाव श्री खान एक बार भी अपनी गलती की तरफ देखते और यह सोचते और स्वीकार करते कि उनका कृत्य अनुचित और आपराधिक था.
अमिताभ ठाकुर






