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अरबों के जादूगोड़ा चिटफंड घोटाले में हिंदुस्तान का एक पत्रकार भी शामिल!

: जादूगोड़ा चिटफंड घोटाले पर मीडिया खामोश क्यों है?  : प्रिय यशवंत जी, बहुत दुःख और आश्चर्य लग रहा है की छोटी-छोटी बातों को घी डालकर ब्रेकिंग और देश की सुर्खियां बना देने वाला मीडिया समूह (खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया)  झारखंड के जादूगोड़ा में हुए इतने बड़े अरबों रुपये के चिटफंड घोटाले के बारे में कुछ नहीं दिखा रहा है. देश की अधिकाँश जनता को इस महाघोटाले की खबर तक नहीं है जबकि कागजी तौर पर इसकी शिकायत जिले के निचले अधिकारी से लेकर प्रधानमन्त्री कार्यालय तक की गयी है. लगता है इन मीडिया समूहों को नान–बैंकिंग चिटफंड कंपनियों से मोटा विज्ञापन मिलता है,जि सके कारण ये मीडिया समूह बड़ा आर्थिक सपोर्ट खोना नहीं चाहते हैं और लुट चुकी जनता को न्याय नहीं दिलाना चाहते.

: जादूगोड़ा चिटफंड घोटाले पर मीडिया खामोश क्यों है?  : प्रिय यशवंत जी, बहुत दुःख और आश्चर्य लग रहा है की छोटी-छोटी बातों को घी डालकर ब्रेकिंग और देश की सुर्खियां बना देने वाला मीडिया समूह (खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया)  झारखंड के जादूगोड़ा में हुए इतने बड़े अरबों रुपये के चिटफंड घोटाले के बारे में कुछ नहीं दिखा रहा है. देश की अधिकाँश जनता को इस महाघोटाले की खबर तक नहीं है जबकि कागजी तौर पर इसकी शिकायत जिले के निचले अधिकारी से लेकर प्रधानमन्त्री कार्यालय तक की गयी है. लगता है इन मीडिया समूहों को नान–बैंकिंग चिटफंड कंपनियों से मोटा विज्ञापन मिलता है,जि सके कारण ये मीडिया समूह बड़ा आर्थिक सपोर्ट खोना नहीं चाहते हैं और लुट चुकी जनता को न्याय नहीं दिलाना चाहते.

यह सोचने का बहुत बड़ा मुद्दा है कि जादूगोड़ा जैसे छोटे से इलाके में इतना बड़ा चिटफंड का रैकेट (पन्द्रह सौ करोड़) चल गया तो पूरे देश में कितनी चिटफंड कंपनियां अवैध तरीके से प्रलोभन देकर लोगों का पैसा निवेश करा रही हैं एवं बहुत-सी कंपनियां पैसा लेकर भागने की तैयारी में होंगी. जादूगोड़ा की एक सामाजिक संस्था इंडियन डेमोक्रेटिक ह्यूमन राईट आर्गेनाइजेशन के द्वारा इस कंपनी के भागने से कई महीने पहले ही उपायुक्त पूर्वी सिंहभूम, वरीय आरक्षी अधीक्षक पूर्वी सिंहभूम, स्थानीय थाना आदि को लिखित आवेदन देकर जांच एवं कार्रवाई की मांग की गयी थी. ३ जनवरी २०१३ को रिट केस नंबर ४४ झारखंड उच्च न्यायालय में दर्ज कराई गयी थी. परन्तु चिटफंड कंपनी के संचालकों की प्रशासनिक पकड़ इतनी मजबूत थी कि किसी ने इनके विरुद्ध कोई कानूनी कारवाई नहीं की. नतीजा यह हुआ कि जादूगोड़ा वासियों का अरबों रुपये डूब गया.

इस चिटफंड कंपनी के मालिक कमल सिंह एवं दीपक सिंह के (दोनों फरार हैं) और इनके खासमखास, सलाहकार और संरक्षक हिन्दुस्तान अखबार के घाटशिला ऑफिस के पत्रकार अरुण सिंह और स्थानीय नेता टिकी मुखी जो कमल सिंह के हर काम में उसके साथ शरीक रहते थे और महीने में एक दो बार दूसरे राज्यों में घूमने जाते थे, जहाँ ये महंगे होटलों में ऐय्याशी करते थे, ये दोनों अभी भी जादूगोड़ा में खुलेआम घूम रहे हैं. इनसे पूछताछ करने वाला कोई नहीं है, जबकि ये लोग कमल सिंह (चिटफंड संचालक) के हरेक राज में शामिल थे. हिन्दुस्तान अखबार के लोकल पत्रकार अरुण इस चिटफंड कंपनी पर इतने मेहरबान हैं कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी न्यूज़ नहीं छाप रहे हैं, केवल मामूली खानापूर्ति की जा रही है.

आदरणीय शोभना भरतिया जी, भड़ास के माध्यम से आपसे आग्रह है कि अरुण कुमार सिंह पर हिन्दुस्तान मीडिया की ओर से जांच बैठाया जाए. इसका कारण यह है कि ये महाशय कई महीनों से घाटशिला कार्यालय नहीं गए हैं. पिछले दो सालों से इनका मुख्य काम कमल सिंह के ग्रुप को संरक्षण देना ही था. इन्हें कमल सिंह द्वारा लाख रुपये के करीब मासिक वेतन देने की चर्चा है. बदले में अरुण सभी को मैनेज करने का काम करते थे. यह सब आप अन्य अखबारों और हिन्दुस्तान अखबार में छप रहे समाचारों को पढकर समझ सकती हैं.

इस मामले में अभी तक जादूगोड़ा थाना में एक सौ से अधिक लोगों ने प्राथमिकी दर्ज करवाई है, जिसमें कई ने एजेंटों के नाम से भी प्राथमिकी दर्ज करवाई है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है की किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. आरोपी खुलेआम सड़कों पर घूम रहे हैं. कुछ आरोपी फरार हो गए हैं. लोग अब आरोप लगाने लगे हैं कि प्रशासन द्वारा मिलीभगत के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं किया जा रहा है. प्रशाशन द्वारा कमल सिंह के एक भी कार्यालय में न तो जांच की गयी है और न ही सील किया गया है. केवल लोगो से प्राथमिकी दर्ज करवा कर खानापूर्ति की जा रही है.

असल में कमल सिंह के चिटफंड कंपनी के मामले में निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच हो जायेगी तो नीचे से लेकर ऊपर तक कई अधिकारी नप जायेंगे, क्योंकि कमल से गिफ्ट लेने वालों की संख्या बहुत बड़ी है. निवेशकों का यह हाल यह है कि उनके घरों में चूल्हा जलना बंद होने के कगार पर है. अनुमान के अनुसार करीब पांच हज़ार से अधिक लोग इसके चुंगल में फंसकर अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई गंवा चुके हैं.

सरकारी संस्था यूसिल माइंस, जो सीधे गृह मंत्रालय के अधीन चलता है और यहाँ से बहुमूल्य युरेनियम निकालता है, के कई बड़े अधिकारी कमल सिंह के इस रैकेट में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं तो कई जादूगोड़ा से भाग चुके हैं और कंपनी से रिजाइन दे दिया है. इस संस्था के सर्वेसर्वा चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर दिवाकर आचार्या की भी मिलीभगत सामने आ रही है क्योंकि कमल सिंह के मॉल का उद्घाटन दिवाकर आचार्या ने ही किया था.

सामाजिक संस्था इंडियन डेमोक्रेटिक हयूमन राईट के अध्यक्ष धीरेन भगत ने कोल्हान आयुक्त को खत लिखकर इसे यूरेनियम तस्करी और देशद्रोह का मामला बताते हुए जून माह में कार्रवाई की मांग की थी, परन्तु किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. अब कमल सिंह के जादूगोड़ा से अरबों लेकर भाग जाने के बाद अधिकारियों की नींद खुल रही है, लेकिन यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि बाहर की टीम के आये बिना स्थानीय प्रशासन द्वारा सही जांच कभी नहीं की जाएगी.

एक बार मेरा सभी बड़े मीडिया घरानों से आग्रह है कि देश की जनता का हित देखते हुए जादूगोड़ा आयें और अपनी आँखों से देखें कि क्या हाल हुआ है जादूगोड़ा वासियों का. कितनी बेटियों की शादी रुक गयी है, कितने बच्चे पढ़ाई बीच में छोडकर वापस आ गए हैं, कितने घरों के चूल्हे बुझ गए हैं. कम से कम एक बार जादूगोड़ा आकर वास्तविकता तो जानें. उसके बाद निश्चय कीजियेगा कि यह सच्चाई देश के सामने आना चाहिए या नहीं.

जादूगोड़ा से आपका एक पत्रकार भाई.

पत्र लेखक ने अपना नाम और मेल आईडी गोपनीय रखने का आग्रह किया है.


मूल खबर..

1500 करोड़ लेकर भाग गए चिटफंड कंपनी के संचालक, पैसे लेकर चुप रहे मीडियावाले

चिटफंड कंपनी भागने के बाद खाने के लाले पड़ रहे जादूगोड़ा वासियों को

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