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दिल्ली

अरविंद केजरीवाल का न्योता आया है…

Srijan Shilpi : अरविन्द केजरीवाल भलीभांति जानते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने और खुद को साबित करने के लिए फिलहाल उनके पास अत्यल्प वक्त है। इसीलिए, उन्होंने बिजली की गति से काम करना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री और विधायक के तौर पर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से जानने के लिए वह ग्रासरूट पर हर नागरिक से सघन संपर्क के अभियान पर फिर से निकल चुके हैं।

Srijan Shilpi : अरविन्द केजरीवाल भलीभांति जानते हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने और खुद को साबित करने के लिए फिलहाल उनके पास अत्यल्प वक्त है। इसीलिए, उन्होंने बिजली की गति से काम करना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री और विधायक के तौर पर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से जानने के लिए वह ग्रासरूट पर हर नागरिक से सघन संपर्क के अभियान पर फिर से निकल चुके हैं।

कल रात के 11 बजे उनकी ओर से हमलोगों को लिखित निमंत्रण आया कि हमारे मोहल्ले की समस्याओं के बारे में जानने के लिए वह आज शाम को कॉलोनी में फिर आ रहे हैं। इससे पहले वह यह पूछने आए थे कि कांग्रेस के बाहरी समर्थन से वह सरकार बनाएं या नहीं। चुनाव अभियान के दौरान भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह सुनिश्चित किया था कि एक-एक मतदाता से व्यक्तिगत रूप से संपर्क हो सके।

उन्होंने रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की सहभागिता से पहली बार हर घर में शिकायत पत्र का फॉर्म वितरित करवाया है, जिसमें कॉलोनी की बिजली, पानी, साफ-सफाई, सीपीडब्ल्यूडी, एन.डी.एम.सी. आदि से जुड़ी सभी तरह की समस्याओं के बारे में बिंदुवार प्रश्न पूछे गए हैं और नागरिकों के सुझाव मांगे गए हैं।

अभी तो उन्होंने अपने पद की शपथ भी नहीं ली है, लेकिन उनके आने की धमक सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली में अचानक आए बदलावों से साफ सुनी जा सकती है। पिछले घोटालों की फाइलें नष्ट की जा रही हैं, गड़बड़ियों से जुड़े रिकॉर्ड फाड़े जा रहे हैं। अभी घर से निकलते ही एन.डी.एम.सी. के कई कर्मचारी फुटपाथ ठीक करते और उसके किनारों पर जगह-जगह पौधे लगाते नजर आए।

कुल मिलाकर बात यह है कि राजनीति की इस नई शैली से पुरानी सभी स्थापित पार्टियों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। हमारे इलाके में पिछले तीन टर्म से यानी कुल पंद्रह वर्षों से शीला दीक्षित विधायक थीं और मुख्यमंत्री भी। पर एक बार भी उन्होंने खुद आकर कॉलोनी की समस्याओं को जानने की जरूरत नहीं समझी। यहां तक कि चुनाव में उनसे हारने वाले भाजपा के प्रत्याशी भी पिछले पंद्रह वर्षों में एक बार भी अपने मतदाताओं से दोबारा संपर्क करने नहीं आए। यदि वे आए होते तो इस बार के चुनाव में तीसरे स्थान पर नहीं होते। प्रत्यक्ष लोकतंत्र की दिशा में इसे अत्यंत सकारात्मक बदलावों का संकेत कहा जा सकता है, बशर्ते यह सब राजनीति का स्थायी भाव बन सके।

सृजन शिल्पी के फेसबुक वॉल से.

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