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अरविन्द केजरीवाल ने मीडिया को बिका हुआ कहा था तो सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया को तकलीफ हुई थी

Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द केजरीवाल ने मीडिया को बिका हुआ कहा था तो सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया को तकलीफ हुई थी और उसने पहले पन्ने पर सफाई छापी थी। जिस अखबार के मालिकान कह चुके हैं कि वो खबरों के धंधे में नहीं विज्ञापनों के धंधे में हैं उन्हें बिका हुआ कहना तकनीकी तौर पर भले ही मुश्किल हो पर मैं इसे क्या कहूं यह भी नहीं समझ पा रहा हूं। है कोई जो मुझे जरा इस बारे में समझा सके।

Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द केजरीवाल ने मीडिया को बिका हुआ कहा था तो सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया को तकलीफ हुई थी और उसने पहले पन्ने पर सफाई छापी थी। जिस अखबार के मालिकान कह चुके हैं कि वो खबरों के धंधे में नहीं विज्ञापनों के धंधे में हैं उन्हें बिका हुआ कहना तकनीकी तौर पर भले ही मुश्किल हो पर मैं इसे क्या कहूं यह भी नहीं समझ पा रहा हूं। है कोई जो मुझे जरा इस बारे में समझा सके।

देखिए यह आर्टकिल, आनंद पटवर्द्धन का लिखा…

http://bhadas4media.com/article-comment/18440-indian-media-fully-sold-out-to-corporates.html

टाइम्स ऑफ इंडिया की बात चली तो याद आया कि दिल्ली में चुनाव हारने के बाद अखबार ने पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बारे में लिखा था कि पार्टी में वे बेअसर या बिना ताकत वाली हो गई हैं। इसमें खबर सिर्फ यह थी कि तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में शीला दीक्षित पावर-पैक्ड (शक्ति से भरपूर) मंच से दूर, दर्शकों के बीच वीआईपी एनक्लोजर में बैठी थीं। इसमें यह भी लिखा था कि पूर्व मुख्यमंत्री स्पष्ट रूप से पुरानी हो गई हैं और पार्टी दिल्ली में राज करने के 15 साल के उनके अनुभव पर निर्भर नहीं कर रही है।

इस खबर की शुरुआत यह बताते हुए की गई थी कि पार्टी ने दूसरी पंक्ति के नेतृत्व के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है। पर शीला दीक्षित के मामले में लिखा था कि पूर्वी दिल्ली से सांसद उनके पुत्र संदीप दीक्षित भी मौके पर अग्रणी लोगों में नहीं थे। खबर तो यह थी। पर तब इसका कोई कारण नहीं बताया गया था। साफ है कि दूसरी पंक्ति के लिए अगर मार्ग प्रशस्त किया गया है तो संदीप को वहां होना चाहिए था और अगर संदीप वहां नहीं थे तो इसका कोई और कारण होगा। पर पाठकों को इस बारे में बताने की कोई जरूरत नहीं समझी गई। बाद में जो हुआ उससे तो लगता है कि अखबार को इसकी कोई हवा ही नहीं थी। हिन्दी के अखबारों की खबरों में इस तरह मीन-मेख निकालने का कोई मतलब नहीं है पर टाइम्स ऑफ इंडिया से तो कुछ उम्मीद रहती ही है। अब जब शीला दीक्षित ने राज्यपाल के पद की शपथ ले ली है तो क्या मानूं उनकी ताकत बनी हुई है या खत्म हो गई।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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