: नये साल में उगेगा 'आप' की उम्मीदों का सूरज :
दिल्ली में 'आप' की जीत से पूर्व ही भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उसे 'कांग्रेस की बी टीम' कहा था। यह कथन अनायास ही निकला था लेकिन सरकार बनाने से पूर्व मंत्री पद को लेकर विनोद कुमार बिन्नी की बगावत ने इस उक्ति को चरितार्थ कर दिया। कांग्रेस का विरोध कर पार्टी से जुड़े और कद्दावर नेता वालिया को हराने के बाद उनका मंत्री बनना एकदम तय माना जा रहा था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हो सकता है, वह बाद में मंत्री बन भी जायें।
खैर, 'आप' और अरविन्द के कड़े संदेश (पदलोभियों के लिये पार्टी में कोई जगह नहीं) ने सब कुछ सही कर दिया… और यही होना भी चाहिये था। देखा जाये तो इस समय पूरा देश 'आप' को उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। अब आम आदमी की भी यही इच्छा है अरविन्द 'नायक' बनें और अनिल कपूर (नायक फिल्म में हीरो के किरदार में) जैसा चमत्कार कर दिखायें। जब नये साल में उम्मीदों का नया सूरज उदय होने को है, तब पार्टी में छोटी सी बगावत को बीतते साल का बुरा वक्त मान कर 'आप' को आगे की सोचनी चाहिये। यूं भी दिल्ली में सरकार बनाने के बाद बतौर मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के सामने आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आचार संहिता लागू होने से पूर्व कुल मिलाकर तीन महीने का ही वक्त बचेगा। इसी वक्त में अरविन्द को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना है ताकि लोकसभा की जमीन तैयार हो सके। इसको लेकर भाजपा जैसी बड़ी पार्टी में खलबली अभी से मच चुकी है। यहीं नहीं, 'आप' की आहट चौकन्ने हुये केन्द्रीय नेतृत्व ने पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को सचेत भी कर दिया है कि वे 'आप' को बहुत महत्व न दें। कांग्रेस के कुशासन का फायदा उठाने का ख्वाब पाले भाजपा का डर स्वाभाविक भी है क्योंकि लोस चुनाव चुनाव में झाड़ू का जादू चला तो उसका बंटाधार हो जायेगा।
देखा जाये तो 'आप' की डगर न पहले आसान थी और न आगे आसान रहेगी। इन दिनों 'आप' को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में खूब छापा गया और न जाने क्या-क्या लिखा गया। इसमें कई और चीजों पर भी गौर किया जाना चाहिये था लेकिन उन पर कोई विशष चर्चा नहीं हुई। लगभग सबने एक सुर में संसद में लोकपाल बिल पास होने का श्रेय अन्ना हजारे को दे दिया। किसी ने भी यह मुद्दा उठाने की जहमत नहीं उठाई कि अगर दिल्ली में 'आप' की जीत नहीं होती तो क्या लोकपाल बिल यूं ही पास हो जाता। लोकपाल बिल पास करने के लिये क्या 'आप' ने राजनीतिक पार्टियों को मजबूर नहीं किया? दूसरा मुद्दा यह भी उठाया जा सकता था कि अगर अन्ना हजारे भी नेताओं को जवाब देने के लिये राजनीति में उतरे होते और 'आप' के साथ होते तो वर्तमान परिदृश्य क्या होता? क्या तब भी 'आप' की जीत के उतने ही मायने होते या फिर इससे भी बड़ी बात होती? तीसरी बात यह कि अन्ना के वास्तविक सपने 'जन लोकपाल' को दिल्ली में लागू कर अगर अरविन्द ने कमाल कर दिखाया तो हजारे का क्या स्टैंड होगा?
अगर 'आप' ने गांधी के मूल सिद्धान्त 'स्वराज' का सपना दिल्ली में सच कर दिखाया (जिसे अधिकतर विद्वानों-बुद्धिजीवियों ने भी प्रैक्टिकल नहीं माना था) क्या अन्ना तब भी अरविन्द से किनारा किये रहेंगे? क्या तब भी महत्वाकांक्षी व दिल्ली का मात्र कमिश्नर न बनाये जाने से नाराज होकर इस्तीफा दे देने वाली किरण बेदी का अड़ियल बरकरार रहेगा और क्या 'आप' के खिलाफ नरम रवैया नहीं अपनायेंगी? आखिर तब संतोष हेगड़े क्या करेंगे? ये ऐसे तमाम सवाल हैं जो हवा में तैर रहे हैं और यही 'आप' और 'आम आदमी' का भविष्य तय करने में मुख्य भूमिका भी निभायेंगे। इसके अलावा इन दिनों एक बात और देखने को मिली। लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं व चैनलों में 'आप' और 'अरविन्द' की मुसीबतों-चुनौतियों की ही बात की गई और 'आप' को बस पानी का बुलबुला ही समझा गया। अधिकतर लेखकों, विश्लेषकों व कॉलमिस्टों को अब भी यही लगता है कि भविष्य भाजपा का ही है। उन्होंने यह देखकर भी दिखाने की कोशिश नहीं की कि 'आप' को आम आदमी नहीं, बल्कि खास व्यक्ति (अंचलों के बजाय शहर में लोकप्रिय) ही पसंद करता है और इससे सबसे अधिक चोट भाजपा को ही पहुंचनी है, कांग्रेस व अन्य पार्टियों को नहीं। इसकी वजह यह है कि भाजपा का आज भी असली जनाधार शहर में ही है।
वास्तव में अरविंद सियासत का नया व्याकरण रच रहे हैं जो पुराने सियासतदानों को भी समझ नहीं आ रहा है। वो केजरीवाल के तौर-तरीकों को अभी भी शक की निगाह से देख रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के इस बयान को भी इसी नजरिये से देखा जाना चाहिये- 'एसएमएस से राय मांगने का ट्रेंड मेरी समझ में नई आता। मुझे नहीं पता कि ये लोकतंत्र के लिए कितना सही है।' इसमें कोई शक नहीं कि 'आप' और अरविन्द ने उस निराशावादी सोच को बदला है जिसका कल तक मानना था कि देश में कुछ नहीं बदलने वाला। अरविन्द ने सियासत की लीक को तोड़ा है। उन्होंने ईमानदार और जनता के प्रति जवाबदेह सियासी नेतृत्व देने के वादे पर चुनाव लड़ा और उसको पूरा भी कर रहे हैं। उनका जेड प्लस सुरक्षा, सरकारी आवास, लालबत्ती आदि ठुकराना सत्ताप्रिय नेताओं के मुंह पर तमाचा मारने जैसा है। यूपी में उतरने की तैयारी कर रही 'आप' के लिये यह एक नई जमीन तैयार करेगी क्योंकि कोर्ट ने आदेश के बावजूद यहां अभी भी ‘लालबत्ती का खेल’ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। अब केजरीवाल 28 तारीख को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और लोगों को पूरा विश्वास है कि वह देश की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे। और यह उम्मीद उनकी आईआरएस अफसर पत्नी सुनीता व बेटी हर्षिता, बेटा पुलकित को भी है। उनके पूरे परिवार को पता है कि दिल्ली की गद्दी संभालने के बाद अरविन्द के पास उनके लिये समय नहीं होगा लेकिन उन्हीं की तरह उनके परिवार की भी प्राथमिकताओं में देश पहले है।
लेखक रवि प्रकाश मौर्य इलाहाबाद के निवासी हैं और छमाही साहित्यिक मैग्जीन 'प्रयाग' के सह संपादक हैं. उनसे संपर्क 09026253336 के जरिए किया जा सकता है.





