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अरुण शौरी और दिलीप पडगांवकर के खिलाफ विनोद मेहता की भड़ास

हाल ही में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता की जीवनी प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने कुछ नामचीन पत्रकारों को उनके काम के लिए आड़े हाथ लिया है। मेहता की जीवनी का नाम है-लखनऊ ब्वाय। मेहता ने दो बार शादी की लेकिन उनका कोई बच्चा नहीं है। मेहता ने स्वीकार किया है कि जब वे उम्र के दूसरे दशक में थे तो एक स्विस लड़की से उनका संबंध था और इस संबंध से एक बच्चा भी पैदा हुआ था। उस जमाने में वे किसी अखबार में कॉपी राईटर थे। उन्होंने एक कॉलगर्ल के ब्वॉयफ्रेंड होने का भी नाटक किया था क्योंकि उसे अपने बहन की शादी करनी थी। इसके एवज में उन्हें 500 रुपये मिले थे! अपनी आत्मकथा में मेहता ने भारतीय पत्रकारिता के दो दिग्गज अरुण शौरी और दिलीप पडगांवकर पर तीखे कटाक्ष किए हैं। मेहता ने दोनों के दिखावटी चरित्र और दोहरी मानसिकता की आलोचना की है।

हाल ही में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता की जीवनी प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने कुछ नामचीन पत्रकारों को उनके काम के लिए आड़े हाथ लिया है। मेहता की जीवनी का नाम है-लखनऊ ब्वाय। मेहता ने दो बार शादी की लेकिन उनका कोई बच्चा नहीं है। मेहता ने स्वीकार किया है कि जब वे उम्र के दूसरे दशक में थे तो एक स्विस लड़की से उनका संबंध था और इस संबंध से एक बच्चा भी पैदा हुआ था। उस जमाने में वे किसी अखबार में कॉपी राईटर थे। उन्होंने एक कॉलगर्ल के ब्वॉयफ्रेंड होने का भी नाटक किया था क्योंकि उसे अपने बहन की शादी करनी थी। इसके एवज में उन्हें 500 रुपये मिले थे! अपनी आत्मकथा में मेहता ने भारतीय पत्रकारिता के दो दिग्गज अरुण शौरी और दिलीप पडगांवकर पर तीखे कटाक्ष किए हैं। मेहता ने दोनों के दिखावटी चरित्र और दोहरी मानसिकता की आलोचना की है।

अरुण शौरी के बारे में

बीते सालों में मैं और अरुण शौरी ने एक दूसरे को बिल्कुल नजर-अंदाज किया है। हम एक दूसरे से नहीं मिले और नापसंदगी की हद तक दूर-दूर रहे। इसका मुझे कोई दुख नहीं है। बात अस्सी के दशक के शुरुआत की है। शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस के संपादक के रुप में एक खबर ब्रेक की थी जिसका नाम था-इंदिरा गांधी एज कॉमर्स। इस स्टोरी में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए आर अंतुले द्वारा चलाई जा रही एक संस्था का भंडाफोड़ किया गया था जो अवैध धन की उगाही करता था। उस संस्था का नाम था-इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान। जाहिर है, खबर छपने के बाद अंतुले को इस्तीफा देना पड़ा और उनके सितारे गर्दिश में जाते गए। उस समय एक्सप्रेस और शौरी इंदिरा गांधी के धुर विरोधी थे और उन्होंने कांग्रेस की प्रतिष्ठा को निश्चय़ ही बड़ा धक्का पहुंचाया था। शौरी उस वक्त सातवें आसमान पर थे और सिविल सोसाईटी और मीडिया जगत के डार्लिंग से कम नहीं थे।

उसी समय फ्री प्रेस जर्नल का एक नौजवान रिपोर्टर मुझसे मिलने आया। उसके साथ इंडियन एक्सप्रेस में काम करनेवाला उसका एक दोस्त भी था। उसने कहा कि उसके पास एक धमाकेदार खबर है लेकिन उसे नहीं लगता कि संडे ऑब्जर्वर जैसा नया अखबार उस खबर को छापने की जहमत मोल लेगा। उस रिपोर्टर के मुताबिक अंतुले वाली खबर में एक्सप्रेस के सारे स्टॉफ और ब्यूरो के लोग इस बात से खफा थे कि खबर का सारा श्रेय अरुण शौरी ले रहे है। हलांकि उस खबर को पकाने में शौरी का भी योगदान था लेकिन उसका ज्यादातर काम एक्सप्रेस ब्यूरो ने किया था लेकिन जब खबर छपी तो उसमें दूसरों का नाम नदारत था। 

बस फिर क्या था। संडे ऑब्जर्वर ने ’शौरी एंड द पेंटहाउस कंस्पिरेसी’ के नाम से खबर प्रकाशित की। पेंटहाउस का नाम इसलिए लिया गया क्योंकि शौरी उस इमारत में रामनाथ गोयंका के साथ कथित रुप से बैठे पाए जाते थे। शौरी ने इस लेख के लिए संडे ऑब्जर्वर से मांग की कि वह पूरे पन्ने का उनका साक्षात्कार प्रकाशित करे और आरोप लगाया कि ऑब्जर्वर की खबर तोड़-मरोड़ कर पेश की गई है।

उसके बाद इस आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई में नौजवान पत्रकार कुमार केतकर भी कूद पड़ा। उसने संपादक के नाम पत्र में संडे ऑब्जर्वर को लिखा कि हर घड़ी अपने काम का ढ़ोल पीटने वाले और सार्वजनिक नैतिकता का ठेकेदार बननेवाले शौरी जैसे पत्रकारों की पौध इस पेशे में लगातार बढ़ती जा रही है। अगर समय रहते इस प्रवृति पर रोक नहीं लगाई गई तो यह एक कुप्रथा का रुप धारण कर लेगी।

दिलीप पडगांवकर के बारे में

19 अक्टूबर सन् 1989 को द इंडेपेंडेंट ने आठ कॉलम की एक खबर प्रकाशित की-मोरारजी देसाई नहीं बल्कि वाई बी चौहान ने अमेरिका के लिए जासूसी की थी। करीब दो दिनों तक इस खबर की सुध किसी ने नहीं ली सिवाय मिड-डे के जिसने हमारी रिपोर्ट को लगभग हूबहू छाप दिया। बाकि मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया। लेकिन ये बात टाईम्स ऑफ इंडिया के संपादक दिलीप पडगांवकर को रास नहीं आई। वे असुरक्षित मानसिकता के संपादक थे।

ये बात सही थी की टाईम्स के दूसरे संपादक मेरी सक्रियता से घवराए हुए थे लेकिन दिलीप पडगावकर कुछ ज्यादा ही घवराए हुए थे। मेरी टीम दिन रात मेहनत करके एक ऐसा अखबार निकाल रही थी जो दिलीप के अखबार से बेहतर दिखती थी। कई दिन तो यह बहुत ही बेहतर दिखती थी। पडगांवकर का डर उस वक्त और भी बढ़ गया जब अपने किसी वरिष्ट प्रबंधक को उन्होंने ये कहते हुए सुना कि समीर जैन जल्द ही मुझे टाईम्स ऑफ इंडिया का संपादक बना सकते हैं। उसके बाद पडगांवकर और महाराष्ट्र टाईम्स के संपादक गोविंद तलवालकर ने मिलकर तय किया कि चाह्वान वाली खबर को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 21 अक्टूबर के संपादकीय में उन्होंने उस खबर के लिए इंडेपेंडेट और मुझ पर तीखे वार किए। उन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मेरे ऊपर हमला करवाने/होने की भी धमकी दी और सलाह दी कि अगर ऐसा होता है तो इसका जिम्मेदार मैं खुद होऊंगा।

भाषा की शालीनता और संयम को धता बताते हुए टाईम्स ने मेरे ऊपर जहरीले हमले किए जिसे देखकर ऑब्जर्वर प्रबंधन भी हैरान था। क्योंकि दोनों ही अखबार ’सिस्टर पब्लिकेशन’ थे। एक विपक्षी नेता ने मीडिया से कहा कि ऑब्जर्वर में छपी चाह्वान वाली खबर आपत्तिजनक हो सकती है लेकिन टाईम्स ऑफ इंडिया इसको लेकर कुछ ज्यादा ही हंगामा मचा रहा है। मेरी पडगांवकर से कोई जाती दुश्मनी नहीं है। पडगावंकर वैसा ही इंसान है जितनी उसकी क्षमता है। हां, ये बात जरूर है कि एक ऐसा संपादक जिसने दावा किया था कि वह देश के प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम कर रहा है, उसे जरूर टाईम्स ऑफ इंडिया के पतन और गिरावट के लिए जिम्मेवार मानना पड़ेगा। इसके लिए पडगावकर पूर्णत: जिम्मेवार है जब दिलीप के मालिकानों ने उन्हें झुकने के लिए कहा तो वे रेंगने लगे।  उसके बाद तो ये बात सारे संपादकों के लिए मानो नजीर सी बन गई।

साभार : जनतंत्र डॉट कॉम

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