Mohammad Anas : कितनी शर्म की बात है कि शहीद डिप्टी एसपी की पत्नी डा. परवीन आज़ाद को जब सरकार, प्रशासन और बाकी की मशीनरी नहीं झुका पाई तो समाज में बदनाम करने के लिये, लोगों के बीच गलत छवि बनाने के लिये उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने परिवार के आठ लोगों के लिये नौकरी की मांग की है… अरे ओ पेड मीडिया, अरे ओ समाज में रह रहे इंसान के रूप में भेड़िये, तुम किसी की लाश पर अपना फ़ायदा क्यों देखने लगते हो…
तुम जब परवीन आज़ाद की बहादुरी के किस्से से परेशान हो गये तो उसे बदनाम करने लगे… अरे महामूर्खों राज्य सरकार ने खुद ही परिवार के उन लोगों की लिस्ट मांगी थी जो इस लायक हैं कि नौकरी पर रखे जा सकें… नागफ़नी के उपर बैठने वालों, तुम्हे शर्म ना आयी एक ऐसी महिला को बदनाम करते हुए जिसने तुम्हारी रक्षा, देश की अस्मिता के लिये कुर्बान हुए अपने पति को बिना दफ़नाये, तीन दिन तक अन्न का एक दाना भी नहीं उतरने दिया गले के नीचे से…
ऐसी महिला को तुम्हें अपना आदर्श बनाना था, उसी को लेकर तुम सब घिनौना खेल खेलने लगे… मैं धिक्कारता हूं उन सबको जो इस तरह के अफ़वाह में शामिल हैं और जिनके लिये देश की रक्षा करने वाले वर्दीधारी से इस कदर नफ़रत है! क्या तुमने उसका बोलना सुना है, वो सिर्फ़ बोलती नहीं है, आग बरसाती है, अन्याय के खिलाफ़… क्या तुमने उसके अंगारे जैसे सवाल नहीं सुने… कभी सुना था किसी महिला के मुंह से ऐसे सवाल, जिसका पति मर चुका हो… मैंने तो हमेशा देखा है इन हालात में महिलाएं और पुरुष दोनों गश खा-खा कर बेहोश होते रहते हैं!
थूकता हूं तुम सब पर जो अफ़वाह फ़ैला रहे हो, थू थू थू …. मैं महिला दिवस का आज का दिन किसी मलाला या निर्भया को नहीं बल्कि परवीन आज़ाद को समर्पित करता हूँ जो तमाम भारतीय महिला एवं पुरुष के लिये एक मिसाल है… जीवटता की, बहादुरी की मिसाल… अकेले संघर्ष किया है परवीन आज़ाद ने, वरना लोग तो खाये पीये और अघाये किस्म के हैं, उन लोगों में मैं भी हूँ.. मेरा कोई अपना नहीं गया है ना इसमें, तो कैसे महसूस हो दर्द… यहां तो कोई अपना भी चला जाता है तो हम तेरहवी और चालिसवां मना कर उसे भी भूल जाते हैं!
ज़िया तुम्हारी शहादत हम नही भुलायेंगे,
ज़रूरत पड़ी तो सब कुछ दांव पर लगायेंगे!
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ज़िया उल हक़ वलीपुर पहुंच जाते हैं… बाकी के पुलिस वाले भी साथ में होते हैं…. गांव में प्रधान की हत्या से आक्रोशित भीड़ लाश रख करके आगे की रणनीति बनाने में जुटी रहती है और उस समय तक राजा भैया के करीबी कुंडा नगर पंचायत के चेयरमैन गुलशन यादव, रोहित सिंह, हरिओम शंकर श्रीवास्तव और राजा भैया का ड्राइवर गुड्डू सिंह भी वही रहते हैं… याद होना चाहिये आप सबको कि शहीद सीओ ने बालू के अवैध खनन को बंद करके राजा के करीबियों कि कमर तोड़ दी थी… शहीद सीओ की अस्थान दंगे पर बनायी रिपोर्ट अगले हफ़्ते आने वाली थी… राजा के दरबार में कभी नहीं गये… इस तरह से खुद राजा की सरकार होते हुए भी एक वर्दी वाले ने उसके साम्राज्य को चुनौती दे डाली थी… इन सब खुन्नस और मनमुटाव से लदे हुए राजा के सिपहसालारों ने गांव के हालात सुधारने आये सीओ ज़िया उल हक़ को बंधक बना कर तब तक मारा जब तक उसकी जान ना चली गयी… जहां एक ओर कुंडा में रघुराज प्राताप सिंह के इशारे के बिना पत्ता नहीं हिलता है, तो क्या यह संभव है कि उसके सबसे खास प्रधान की हत्या होती है और उसे कोई बताया ना हो… गांव में गैंगवार हो जाता है और उसे खबर तक ना हो?… क्या यह संभव है कि राजा भैया मोबाइल से उन सबको क्या करने और ना करने का निर्देश ना देते हों… कई सवाल हैं… पर यह तो तय हो चुका है कि उसी कुंडा में पुलिस की खाकी वर्दी वाले एक नौजवान ज़िया उल हक़ ने उसे कानून की ताकत दिखा दी थी… अब कोई ये कहे कि राजा की सरकार थी, वो चाहता तो ट्रांसफर करवा देता, बात ठीक है करवा देता, लेकिन आज से पहले के उसके आपराधिक इतिहास को खंगाले तो हम पाते हैं कि राजा भैया को कुछ भी करने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई… वो चाहे सीओ राम शिरोमणी पांडेय की सड़क दुर्घटना में मौत रही हो या फ़िर उसके काफ़िले से पास लेने वाले युवक की पीट पीट कर हत्या क्योंकि कुंडा में लोकतंत्र नहीं है, राजा का तंत्र है.
लेखक मोहम्मद अनस युवा, तेजतर्रार और सरोकारी पत्रकार हैं. माखनलाल विश्विद्यालय के पत्रकारिता के छात्र रहे हैं. सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक बोलने और लिखने के लिए जाने जाते हैं. सोशल मीडिया में खासे सक्रिय रहते हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.
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