Uday Prakash : कल सारे टीवी चैनलों में मोदी-मोदी थे. 'टाइम्स नाउ' तो पता नहीं कितनी बार गोवा में उनका भाषण पूरा का पूरा दिखाता रहा. अर्नब गोस्वामी अतिरंजना और एक-तरफ़ा लफ़्फ़ाज़-बौद्धिक उत्तेजना के एंकर हैं.
लेकिन मोदी?
कहते हैं कि जब कोई भी शासक सड़क पर चलता है, तो उसकी परछाईं उसके साथ, पीछे-पीछे चलती है. और लोग उसे नहीं, उसकी परछाईं को देखते हैं. यह भी कहावत है कि कोई अपने इतिहास या अतीत से उसी तरह नहीं अलग हो सकता, जैसे कोई अपनी परछाईं से कूद कर बाहर नहीं निकल सकता. गोवा में नारे लग रहे थे. तालियां बज रही थीं. जोश और उन्माद था …लेकिन सब का सब राजनीतिक. सत्ता पर कब्जा जमाने का जोश. लगता है इस बार २०१४ में चुनावी लड़ाई मोदी बनाम गैर मोदी के बीच होगी!
'जय हिंद' और 'वंदे मातरम' के बीच।
'हिंदुस्तान' और 'हिंदू-राष्ट्र' के बीच।
'भारत' और 'भारतमाता' के बीच।
'मनुष्यत्व' और 'हिंदुत्व' के बीच।
'विस्थापन' और 'डवलपमेंट' के बीच।
'लोकतंत्र' और 'कार्पोरेट-तंत्र' के बीच।
'डर', 'संदेह', 'आशंका' बनाम 'आक्रामकता', 'उन्माद', 'हिंसा' और 'द्वेष' के बीच।
यह सच ज़रूर है कि कांग्रेस और भाजपा में कोई खास अंतर अब नहीं बचा लेकिन कांग्रेस के पास नरेंद्र मोदी जैसा कोई वक्ता फ़िलहाल नहीं है. शब्दाडंबर, चुट्कुले, किस्से, झूठ और अलंकृत भव्यता किसकी निश्चित पहचान है, इसे सब जानते हैं. क्या यह चुनाव बीमार, बूढी़, भ्रष्ट कांग्रेस और उन्मत्त हिंसक भाजपा के बीच होगा।
मान लें कि अगर कांग्रेस कठ-मुखे मनमोहन सिंह की जगह राजनीतिक बाल-कलाकार, चुलबुल गांधी को नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा करती है..तो सभी को शुरू में हंसी आयेगी… ज़रूर! कहां एक दैत्याकार बड़बोले गोलियाथ के सामने एक पिद्दा-सा नौटंकी का बितुनिया! लेकिन ! ….उस परछाईं का क्या होगा, जो धीरे धीरे सभी को दिखाई देने लगेगी?
एक की परछाईं में २००२ का भयावह जन-संहार, १९९० से लेकर १९९२ तक की रथयात्रा और फिर बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस और दूसरे की परछाईं में आंसू, पारिवारिक बलिदान, अपमान और उद्दंड, ना-समझ लड़कपन …लेकिन पीछे-पीछे १९८४ का आपरेशन ब्लू-स्टार और दिल्ली के सिख-विरोधी दंगों की संदिग्ध परछाईं …! ये परछाइयां किसी का पीछा क्यों नहीं छोड़तीं?
लेकिन हम?
हम क्या करें? क्या परछाइयों को भूल कर, आज, इस वक्त, जो कोई भी जो कुछ बोल रहा है, सिर्फ़ उसे सुनें और २०१४ में अपना वोट दे आयें? क्या मीडिया, भव्यताएं, लफ़्फ़ाज़ियां और हमारा सामूहिक विस्मरण सारी अतीत की परछाइयों को मिटा डालेगा? असमंजस है! भ्रष्टाचार, उत्पीड़न, ठगी, कालाधन, हिंसा, लूट, झूठ को छिपाते इन मैनिफ़ेस्टो पर अब कोई यकीन नहीं आता। परछाइयां ही परछाइयां दिखाई देती हैं!
उदय प्रकाश के फेसबुक वॉल से साभार.






