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अहमद बुखारी मुसलमानों के एकमात्र रहनुमा नहीं

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने मुसलमानों से समाजवादी पार्टी को वोट देने की अपील करना निहायत की गैरजिम्मेदाराना हरकत है। वह भी उस सूरत में जब उनका दामाद भी सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। अगर उनका दामाद सपा के बजाय किसी और पार्टी से चुनाव लड़ता, तो क्या तब भी वह सपा को जिताने की अपील मुसलमानों से करते? क्या बुखारी देश या उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के एकमात्र रहनुमा हैं? उन्हें यह हक किसने दिया कि वह मुसलमानों को किसी विशेष पार्टी के हक में वोट देने की अपील करें? किसी भी व्यक्ति को यह हक है कि वह चाहे किसी को भी अपना वोट दे, किसी दूसरे का हस्तक्षेप वह क्यों बर्दाश्त करे? अपील करने से पहले बुखारी को इसका खुलासा करना चाहिए था कि उन्होंने किन मुसलिम मुद्दों और मांगों को मुलायम सिंह यादव के सामने रखा? हालांकि उनके वालिद कई पार्टियों को जिताने की अपील मुसलमानों से कर चुके हैं। पार्टी ने जीतने के बाद मुसलमानों के हक में क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है।

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने मुसलमानों से समाजवादी पार्टी को वोट देने की अपील करना निहायत की गैरजिम्मेदाराना हरकत है। वह भी उस सूरत में जब उनका दामाद भी सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। अगर उनका दामाद सपा के बजाय किसी और पार्टी से चुनाव लड़ता, तो क्या तब भी वह सपा को जिताने की अपील मुसलमानों से करते? क्या बुखारी देश या उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के एकमात्र रहनुमा हैं? उन्हें यह हक किसने दिया कि वह मुसलमानों को किसी विशेष पार्टी के हक में वोट देने की अपील करें? किसी भी व्यक्ति को यह हक है कि वह चाहे किसी को भी अपना वोट दे, किसी दूसरे का हस्तक्षेप वह क्यों बर्दाश्त करे? अपील करने से पहले बुखारी को इसका खुलासा करना चाहिए था कि उन्होंने किन मुसलिम मुद्दों और मांगों को मुलायम सिंह यादव के सामने रखा? हालांकि उनके वालिद कई पार्टियों को जिताने की अपील मुसलमानों से कर चुके हैं। पार्टी ने जीतने के बाद मुसलमानों के हक में क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है।

इतना जरूर है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जरूर कीमत वसूली। इसका उदहारण 1989 कर चुनाव है। राजीव गांधी की सरकार पर बौफोर्स तोप दलाली को लेकर वीपी सिंह बयानों के गोले दाग रहे थे। सरकार जनता में विश्वसनीयता खो चुकी थी। दूसरी ओर राम मंदिर आंदोलन पूरे उफान पर था। सांप्रदायिक दंगों की आग में उत्तर प्रदेश के कई शहर जल रहे थे। राममंदिर पर राजीव गांधी की दोगली नीतियों और मलियाना और हाशिमपुरा में पुलिस और पीएसी की ज्यादती के कारण मुसलमानों का कांग्रेस से मोह भंग हो गया था। वे वीपी सिंह को अपने रहनुमा के तौर पर देख रहे थे। मरहूम अब्दुल्ला बुखारी ने मुसलमानों का रुख देखा, तो मुसलमानों से जनता दल को वोट देने की अपील कर दी। समर्थन देने की एवज में उन्होंने जनता दल सरकार से पूरी कीमत वसूली। अपने आदमियों को राज्यसभा में भेजा और जामा मस्जिद पचास लाख रुपये का अनुदान लिया। उन रुपयों का बुखारी परिवार ने क्या किया, यह आज तक किसी को पता नहीं है। यह पूछने की हिम्मत न तो किसी की हुई और न हो सकती थी।

मलियाना और हाशिमपुरा कांड के विरोध स्वरूप अब्दुल्ला बुखारी ने जामा मसजिद को काले झंडे और बैनरों से पाट दिया था। 1989 उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बनी। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ही थे। मलियाना कांड पीड़ितों का एक प्रतिनिधिमंडल अब्दुल्ला बुखारी से मिलने गया था। प्रतिनिनिधि मंडल ने उनसे आग्रह किया था कि वह वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव से कहकर मलियाना जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करवाएं और दोषियों पर मुकदमा चले। इस पर अब्दुल्ला बुखारी का जवाब था, ‘राजीव गांधी, वीपी सिंह, या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।’ उनके इस जवाब पर प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य ने कहा था, ‘जब कोई राजनीतिक दल मुसलमानों का हमदर्द ही नहीं है, तो आप क्यों बार-बार किसी दल को समर्थन देने की अपील मुसलमानों से करते हैं?’ इस सवाल पर बुखारी बोले थे, ‘मुझसे किसी की सवाल करने की हिम्मत नहीं होती, तुमने कैसे सवाल करने की जुर्रत की।’ उनके जवाब से जाहिर था कि मुसलमानों के नाम पर बुखारी परिवार सिर्फ अपने स्वार्थ साधता रहा है। सवाल करने की जुर्रत तो उनके साहबजादे अहमद बुखारी से भी किसी की नहीं हो सकती। पिछले साल लखनऊ में एक उर्दू पत्रकार ने उनसे एक सवाल कर लिया था, तो उनके समर्थकों ने पत्रकार को बुरी तरह मारापीटा था।

ऐसे समय में जब मुसलमानों का रुख लगभग पहले से ही सपा की ओर है, तो बुखारी की अपील उन्हें नुकसान भी कर सकती है। पूरा चुनाव मुसलमानों के इर्दगिर्द होने से नई चीजें पैदा हो रही हैं। आरएसएस भाजपा उम्मीदवार के कमजोर होने की सूरत में अपने कैडर को बसपा को वोट देने की अपील कर चुका है। सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खान और बुखारी परिवार के बीच हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। उनका क्या रुख रहेगा, यह भी देखने वाली बात होगी। वह बुखारी की अपील पर नाराजगी का इजहार भी कर चुके हैं। कल्याण सिंह मुद्दे पर आजम एक बार पार्टी छोड़ चुके हैं। बुखारी प्रकरण से आजम और मुलायम सिंह के रिश्तों के बीच फिर से खटास आ सकती है, जो अंतत: सपा को ही नुकसान पहुंचाएगी। इतिहास बताता है कि जब भी दिल्ली की जामा मस्जिद से किसी के पक्ष में वोट करने की अपील जारी हुई, हवा का रुख देखकर ही हुई। 1977 में जनता पार्टी, 1980 में कांग्रेस और 1989 में जनता दल के पक्ष में अपील जारी हो चुकी हैं। इन चुनावों में यदि बुखारी अपील भी न करते, तो मुसलमान वोट उसी पार्टी को करता, जिसके पक्ष में अपील की गई थी। इस तरह की अपीलों का एक खतरनाक पहलू यह भी है कि दूसरे समुदायों में यह संदेश जाता है कि मुसलमानों का ध्रुवीकरण हो रहा है, जिससे गैर मुस्लिम वोटरों का भी ध्रुवीकरण होता है, जो लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। अहमद बुखारी 2004 में मुसलमानों से भाजपा को वोट देने की अपील भी कर चुके हैं, जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया था। वह मुसलमानों की भावनाओं के विपरीत था, इसलिए मुसलमानों ने जमकर उसकी आलोचना की थी। उसके बाद ही अब सवाल यह है कि क्या सैयद बुखारी की अपील के सहारे मुलायम चुनाव की नैया पार लगा सकेंगे?

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी ब्लागर और जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों वो मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

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