रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के पूर्व सम्पादक अज़ीज़ बर्नी के बारे में कहा जाता है कि विवादों में बना रहना उनकी सबसे बड़ी एवं ख़ास आदत है, उसके लिए वो किसी भी कीमत को चुकाने और किसी भी हद को पार करने को हमेशा तैयार रहते हैं.. भले ही उनकी हरकतों से सहारा परिवार के मुखिया सहाराश्री जी के भरोसे को ठेस पहुँचती हो या उनकी प्रतिष्ठा ही दांव पर क्यों न लग जाए.. जब वो सहारा उर्दू अखबार के सम्पादक के पद पर थे, तब भी बर्नी ने हर वो हथकंडे अपनाए जिससे उन्हें सस्ती लोकप्रियता मिल सके.. इस बार भी बर्नी ने कुछ ऐसा ही किया जिससे सहाराश्री जी का उनके उपर बना हुआ विश्वास खोखला हो जाए.
अपने सम्पादकीय दौर में भी बर्नी ने कभी भी सहारा परिवार या सहाराश्री जी की प्रतिष्ठा की चिंता नहीं की, अगर कुछ किया तो सिर्फ अपनी सस्ती लोकप्रियता पाने की जुगाड़.. जज्बाती और भड़काऊ लेख लिखना और उसके जरिया देश और दुनिया के सामने अपने संस्थान और रोजनामा सहारा उर्दू अखबार को ही कटघरे में खड़ा कर देना उनकी आदत बन चुकी थी.
परन्तु, उनका एक दांव उन्हें उल्टा पड़ गया और उनकी सम्पादक की कुर्सी से ही उन्हें हाथ धोना पड़ गया.. और अपनी ही लेखनी पर उर्दू पाठकों के भारी विरोध के कारण उन्हें खुले तौर पर माफ़ी मांगनी पड़ी.. हालांकि इसके बावजूद भी उन्हें उनका पद वापस नहीं मिला.. बर्नी के बारे में यह चर्चा आम है कि उनके खाने के दांत कुछ और हैं और दिखाने के दांत कुछ और, यानी उन की सोच और गतिविधियों और उनकी लेखनी में कोई मेल नहीं.. वो करते कुछ और हैं और कहते कुछ और.. परदे के पीछे अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे बीजेपी के दिग्गज नेताओं के साथ बैठ कर अपना भविष्य तलाशते हैं, जबकि सामने में उर्दू पाठकों को बरगलाने के लिए जज्बाती लेख लिखते हैं.
लोगों का तो यह भी मानना है कि राज्य सभा की सीट पाने को बर्नी इतने व्याकुल हैं कि जब मौक़ा मिलता है कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के साथ हो लेते हैं, जब वहां भी बात नहीं बनती तो आर एस एस के सामने भी घुटने टेक देते हैं.. देशद्रोह का मुक़दमा झेल रहे बर्नी की इन्हीं हरकतों से परेशान सहारा परिवार के मुखिया ने उनसे किनारा कर लेना ही ठीक समझा.. अज़ीज़ बर्नी के बारे में कहा जाता है कि सम्पादक के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान भी उनकी सहाफत (पत्रकारिता) से ज्यादा सियासत (राजनीति) में रुचि रहती थी.. वो खुद को मुसलमानों के वोट का ठेकेदार बताने से भी परहेज़ नहीं करते थे.. कई बार उन्होंने अपने फेसबुक पर भी खुले तौर पर यह बात कही है.
परन्तु जब उनके लेखनी और गतिविधियों से सहारा संस्थान के प्रतिष्ठा पर लगातार उंगलियाँ उठने लगी तो अंततः सहाराश्री ने उन्हें अपने अखबार से अलग करना ही संस्था के हक में समझा.. तब जा कर बर्नी की बेतुकी लेखनी से उर्दू पाठकों को निजात मिली.. और उर्दू पाठकों ने राहत की सांस ली, क्योंकि अपनी विवादास्पद लेखों के ज़रिये, बर्नी ने अक्सर अपनी ही कौम के लोगों पर उंगलियाँ उठवाने का काम किया.. जिसकी वजह से कई बार आपसी सौहार्द बिगड़ने तक की नौबत आ चुकी थी.. उनके लेखों से तंग आकर पाठकों ने सहारा उर्दू अखबार से ही रूचि ख़तम सी कर ली थी.. शुक्र हो सहाराश्री जी का जिन्होंने देर से ही सही, परन्तु बर्नी को सहारा उर्दू अखबार से पूरी तरह अलग करके उर्दू पाठकों को बर्नी की घटिया और देश और समाज विरोधी लेखों से निजात दिलाई.

लेकिन बर्नी कहाँ मानने वाले, महीनों के वनवास के बाद एक बार फिर वो एक नया शगूफा लेकर प्रकट हुए "मैं जिंदा हूँ, आपसे मिलना और कुछ कहना चाहता हूँ…." सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इस बात के लिए उन्होंने बाकायदा अपना एक प्रचार "दावत ए फ़िक्र" भी छपवाया और वो भी उर्दू के दूसरे अखबार में.. जबकि आज भी सहारा उर्दू अखबार से न सही, परन्तु सहारा परिवार से जुड़े हुए बर्नी ने यह भी नहीं सोचा कि जिस संस्थान और अखबार ने उन्हें अज़ीज़ बर्नी बनाया, उनकी इस हरकत से उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी.. बर्नी जिंदा तो हैं, पर यह बात किसी के भी समझ से परे है कि उनके पास कहने को अब क्या बाक़ी रह गया, अब कौन सा नया हथकंडा बचा रह गया, जिससे उन्हें अपनी सियासत को चमकाने में मदद मिलेगी ?? अपना वो कौन सा नया मुखौटा है जो बर्नी अब लोगों को दिखाना चाहते हैं??
जिस संसथान से बर्नी वर्षों तक जुड़े रहे, जिससे उन्होंने नाम, पैसा, शोहरत सब कमाया, जब उन्होंने ने उसकी चिंता नहीं की, और उसकी प्रतिष्ठा को भी दांव पर लगाया, और अपना मकसद पूरा करने के लिए दूसरे उर्दू अखबार को पैसे देकर अपना प्रचार "दावत ए फ़िक्र" (यानी चिंता पर विचार करने का न्योता) छपवाया, ऐसा स्वयंभू "मसीहा" जिसे अपने वर्षों से जुड़े रहे संस्थान और उसके मुखिया की चिंता नहीं, वो आम आदमी की क्या चिंता करेगा??
शायद उन्हें इस बात का अंदाजा लग चुका है कि सहारा अखबार में अब उनकी एक नहीं चलेगी, इसलिए उन्हें अपनी सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी दूसरे उर्दू अखबार का सहारा लेना ही पड़ेगा.. परन्तु जिस तरह सहारा परिवार के मुखिया सहाराश्री जी ने उन्हें वर्षों तक अपने परिवार का सदस्य बना कर रखा, बर्नी ने ऐसा करके उनके विश्वास को भी चोट पहुंचाई है.. परन्तु बर्नी कहाँ किसी की चिंता करने वाले, उन्हें तो बस अपनी सियासत की रोटी जो सेंकनी है.. बर्नी साहब आप जिंदा तो ज़रूर हैं, लेकिन आप की बेतुकी और विवादास्पद लेखनी अपना दम बहुत पहले ही तोड़ चुकी है, और आपके उर्दू पाठकों के सामने आपका पोलिटिकल एजेंडा और उसे हासिल करने की व्याकुलता भी पूरी तरह बेनकाब हो चुका है.. इसलिए अब वो आपके बहकावे और बरगलाने में नहीं आ सकता.. बाक़ी आपकी मर्ज़ी.
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