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सुख-दुख...

आइए, इस धर्मयुद्ध में प्रोमिता का साथ दें

जागरण पब्लिकेशन के स्वामित्व वाले अंग्रजी टैबलायड मिड डे के दिल्ली संस्करण के बंद होने के कारण बवाल खड़ा हो गया है. लगातार घाटे में चलने को कारण बताते हुए मिड-डे ने अपने दिल्ली और बंगलुरू संस्करण को बंद कर दिया. कंपनी के सीईओ मंजोत घोषाल ने मिड -डे के दिल्ली और बंगलुरु संस्करण के बंद होने की सूचना अपने सभी लोगों को दे दी है. मिड-डे में काम कर रहे लोग अचानक से सड़क पर आ गए. न जाने कितने लोग, और कितने परिवार का पेट इस अखबार से चल रहा था मगर अब सभी अखबार प्रबंधन के इस निर्णय से बेकार हो गए.

जागरण पब्लिकेशन के स्वामित्व वाले अंग्रजी टैबलायड मिड डे के दिल्ली संस्करण के बंद होने के कारण बवाल खड़ा हो गया है. लगातार घाटे में चलने को कारण बताते हुए मिड-डे ने अपने दिल्ली और बंगलुरू संस्करण को बंद कर दिया. कंपनी के सीईओ मंजोत घोषाल ने मिड -डे के दिल्ली और बंगलुरु संस्करण के बंद होने की सूचना अपने सभी लोगों को दे दी है. मिड-डे में काम कर रहे लोग अचानक से सड़क पर आ गए. न जाने कितने लोग, और कितने परिवार का पेट इस अखबार से चल रहा था मगर अब सभी अखबार प्रबंधन के इस निर्णय से बेकार हो गए.

मगर मामला सिर्फ नौकरी का ही नहीं है. नौकरी तो आज न तो कल मिल ही जायेगी. मगर अपने घर से हज़ार किलोमीटर से ज्यादा को दूरी पर सिर्फ नौकरी के भरोसे बैठे लोगों के लिए यह तो मुंह न निवाला छिनना जैसा है. कोलकाता की प्रोमिता मुखर्जी मिड-डे के दिल्ली संस्करण में फीचर एडिटर के पद पर कार्यरत थी. पिछले एक साल से वो इस पद पर थी, मगर अब प्रबंधन के एक निर्णय के कारण वो हताश हो गईं. प्रोमिता को भी एक मेल मिला जिसमे कहा गया था कि" प्रबंधन ने वित्तीय घाटे के कारण अपने संस्करण को बंद करने का निर्णय लिया है, और आज से आपकी जरुरत अखबार को नहीं है, आपकी सेवा समाप्त की जाती है". सिर्फ एक मेल और नौकरी समाप्त.

परन्तु प्रोमिता निराश बैठने वालों में से नहीं है. प्रोमिता ने कंपनी के इस निर्णय के विरुद्ध हल्ला बोल दिया है.अब यह लड़ाई सिर्फ प्रोमिता की नहीं है और न ही वो इसे पैसे की लड़ाई मानती है. प्रोमिता ने अपने लड़ाई के लिए न्यू मीडिया को चुना है. प्रोमिता अपने फेसबुक में लिखती है कि –

"For those who came in late, this is not against the shutting down of MiD DAY delhi shutting down or abt usz getting sacked. It is abt the way we were all dismissed thru an insensitive email. The editor Deep Halder, who is entitled to the highest compensation felt it is not abt money, it is abt our dignity. Neither the CEO, nor the executive editor Sachin Kalbag met us or addressed us over a video conference. We were okay with that also. But today, they were forcing us to sign an illegal document saying we are voluntarily resigning. The truth is, the edition is closing, we are not leaving on our own"

प्रोमिता को हमारी जरुरत है. क्योंकि यह सिर्फ प्रोमिता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस हर आदमी की लड़ाई है जो अपना दिन-रात एक कर किसी मीडिया संस्थान को खड़ा करता है. अपने सुख चैन को छोड़कर, और आपकी जान की परवाह किए बगैर जूझता है ताकि लोगों तक सच पहुंच सके. आइये हम प्रोमिता का साथ दे और उसकी इस लड़ाई को आगे बढ़ाएं.

अनंत झा

पत्रकार

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