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सुख-दुख...

आइये “कपड़ा-फाड़” फाइट में सब नंगे हो लें!

अंधा बांटे रेवड़ी, बार-बार अपने को दे। कहावत सबने सुनी है। उस्ताद का जितना बड़ा या खास चेला होगा, उस्ताद अंधा होने के बाद भी, बार-बार मेवा की मात्रा उसी शिष्य के हाथों में ज्यादा से ज्यादा परोसेगा-भरेगा। देखने-कहने को उस्ताद भले ही अंधा हो। मेरी आंखों के सामने और जेहन में जो भगदड़ मची है, उसमें न कोई अंधा उस्ताद है। न कोई किसी का खास  चेला या शिष्य।

अंधा बांटे रेवड़ी, बार-बार अपने को दे। कहावत सबने सुनी है। उस्ताद का जितना बड़ा या खास चेला होगा, उस्ताद अंधा होने के बाद भी, बार-बार मेवा की मात्रा उसी शिष्य के हाथों में ज्यादा से ज्यादा परोसेगा-भरेगा। देखने-कहने को उस्ताद भले ही अंधा हो। मेरी आंखों के सामने और जेहन में जो भगदड़ मची है, उसमें न कोई अंधा उस्ताद है। न कोई किसी का खास  चेला या शिष्य।

यहां सबको सबको दिखाई दे रहा है। सब उच्च शिक्षित-सुसंस्कृत हैं। हाई-सोसायटी से ताल्लुक रखते हैं। सब अच्छे ओहदे वाले हैं। इनमें कुछ अपनी अलग ही ठसक भी रखते हैं। कहने का मतलब सब दुरुस्त दिमाग वाले हैं। बावजूद इसके सब “कपड़ा-फाड़” फाइट में कूद पड़े हैं। आटे की लोईयां रखकर, अपनी आंखों को हर किसी ने काले कपड़े से बांध लिया है। ताकि दिखाई देना तो दूर, आसमान में सूरज निकला है, या काले बादल छाये हैं। इस तक का अनुमान वे नहीं लगा पा रहे हैं। और हरकारा लगा रहे हैं….आइए आप भी कूद पड़िये आंख पर काली पट्टी बांधकर कपड़ा-फाड़ फाइट में। नंगों के खिलाफ छिड़ी फाइट में। नंगे होकर।

गुवाहटी में रात के वक्त “पव” में जन्म-दिन पार्टी से निकल रही मोहतरमा को कथित गुंडों की जमात ने पकड़ लिया। पव के ठीक बाहर। अपनी पर उतरी पूरी करने के लिए। ये सब क्या और कितना चाह रहे थे? उन्हें अपने सोचे हुए में कितनी सफलता मिली? और कितने असफल रहे? यह तो वे ही बेहतर बता सकत हैं। लेकिन जो कुछ वे अंजाम दे रहे हैं। या अपने सोचे हुए में से वे जितने को परवान चढ़ा पा रहे हैं, वो इस हद तक ऊंचाई ले लेगा। इसकी कल्पना उनमें से किसी ने नहीं की होगी। यह मैं दावे से कह सकता हूं।

अब आईये जानते हैं, इस “कपड़ा-फाड़” फाइट में फांदने वाले किरदारों के कूदने से उछले गंदे पानी की छींटे कितनी ऊंचाई तक पहुंची? रात के अंधेरे में सरेआम सड़क पर हो रहे युवती के “चीर-हरण” को कथित “रोशनी” (कैमरे में क़ैद करके) दी, भगवान श्रीकृष्ण या नारद मुनि के रुप में मौके पर पहुंचे, एक चैनल के खबरनवीस और कैमरापर्सन ने। उन्होंने चीर-हरण कार्यक्रम को लाइव रिकार्ड कर लिया। अपने धंधे के उसूलों को निभाते हुए। इसके बाद वे कैसे चूक गये? उसूलों को निभाने में। यह तो वे ही बतायें (रिपोर्टर और कैमरामैन)। उनके द्वारा कैमरे में क़ैद वीडियो आखिर “YOUTUBE” पर “UPLOAD” कैसे हो गया?

कपड़ा-फाड़ फाइट में अब कूदना या कुदाना था खाकी को। यानि इलाके की पुलिस को। पुलिस अगर इस फाइट में समय रहते कूद गई होती, तो जिस तरह बाद में उसकी कपड़ा-फटाई या चीर-हरण (कई पुलिस वाले सस्पेंड हुए। जिले के कप्तान को तबादला करके रवाना कर दिया गया) हुआ। शायद वो नहीं हुआ होता। लेकिन किसी और के चीर-हरण (पीड़ित लड़की) में अपना चीर-हरण गुवाहटी पुलिस ने खुशी-खुशी करवा लिया हो। इसलिए उसकी खुशी में बाकी लोग या यूं कहें कि हम-सब भी खुश हैं।

कैमरामैन-रिपोर्टर, पीड़िता, पुलिस के बाद कपड़ा-फाड़ फाइट में कपड़े उतरे न्यूज चैनल के एडिटर के। उन्होंने इस्तीफा देकर अपने कपड़े फटने का सबूत पेश कर दिया। कपड़ा-फाड़ फाइट की तेज “फड़फड़ाहट” की आवाज यहीं भला कहां दबने वाली थी। अभी कुछ और भी बचे थे अपने कपड़े फड़वाने के लिए। सो, सल्तनत के गलियारों से निकलकर पूर्व छात्र नेता और मौजूदा राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य अलका लाम्बा ने छलांग लगा दी। कपड़ा-फाड़ फाइट की आग को ठंडा करने की उम्मीद में। मगर उनकी छलांग के छींटे उन पर तो आये ही। देश भर में उनके कूदने की आवाज सुनाई दी। इसे उनका अति-उत्साह कहिये। या फिर अकल और उनमें अनुभव की कमी। इस कपड़ा-फाड़ फाइट में, अलका लांबा की हालत भी “शर्मनाक” हो गयी। अलका लाम्बा गयी तो थीं, लड़की को न्याय दिलवाने और गुवाहटी जाकर कर आयीं, उसकी पहचान ही उजागर।

फाइट चूंकि “कपड़ा-फाड़” के कपड़ों को सिलने की थी। इसलिए जिस-जिसने कपड़ों को सिलने के लिए सिलाई-मशीन चलाई, सिलाई मशीन की सुई उसी-उस के हाथ में चुभती चली गयी। कपड़ा-फाड़ फाइट से परेशान राज्य सरकार ने सोचा, कि कुछ सफाई देकर कपड़ों को “रफू” करके इज्जत को बचा लें। राज्य सरकार के सरकारी विभाग (जनसंपर्क) ने अपनी “सफाई-चिट्ठी” में पीड़ित की पहचान उजागर करके, रही-सही कसर भी पूरी कर दी। अंत में देखिये निकली न बिलकुल सही बात। कपड़ा फाड़ “फाइट” में, जिस-जिसने कपड़े सिलने की कोशिश की, उसी-उसकी उंगली में सिलाई-मशीन की सुई चुभती चली गयी। यानि एक कपड़ा-फाड़ “फाइट” में सबके कपड़े फटते चले गये। किसी के कम फटे किसी के ज्यादा। और किसी ने “रफू” करने के चक्कर में ऐसे पैबंद लगा लिए, जो जिंदगी भर उसका साथ निभायेंगे। जैसे राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य अलका लाम्बा और गुवाहटी के तत्कालीन एसएसपी (जिला पुलिस कप्तान)।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एडिटर (क्राइम) के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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