: अश्लील एसएमएस, एमएमएस और फोन कॉल्स के खिलाफ जेहाद की ब्रांड-एम्बेसेडर बन चुकी हैं अलंकृता : लखनऊ : बाली उम्र की एक पुलिस कप्तान अचानक ही बड़ी सुर्खियों में आ गयीं जब सीधे राजधानी में बैठे पुलिस महानिदेशक ने उनके प्रयासों की सराहना कर डाली। जुम्मा-जुम्मा चार साल की नौकरी वाली अलंकृता सिंह अब महिलाओं-युवतियों को अश्लील एसएमएस, एमएमएस और अवांछनीय फोन कॉल्स के खिलाफ जेहाद की यूपी में ब्रांड-एम्बेसेडर बन चुकी हैं।
डीजीपी अम्बरीश चंद्र शर्मा ऐसे प्रयासों को अनूठा बताते हैं। कहा गया है कि उन्हीं की तर्ज पर ही ऐसे प्रयासों को प्रदेश भर में लागू करने के लिए ऐसे मामलों के लिए एंटी-आब्सीन कॉल सेल बनाया जाए। जिला प्रभारियों से लेकर सारे आईजी इस बारे में तत्काल कार्रवाई करें। इतना ही नहीं, इन अधिकारियों से कहा गया है कि ऐसी सेल को प्रभावी बनाने और उसकी कोशिशों-नतीजों की खबर मुख्यालय को नियमित भेजेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि यह पहला मौका है, जब इतनी कम उम्र वाली किसी पुलिस अधिकारी की कोशिशों को डीजीपी स्तर से प्रदेश भर के पुलिस अफसरों में नजीर की तरह पेश किया गया।
वाणिज्य कर के अपर आयुक्त रहे पिता एसएस गंगवार और मां विनय की बेटी अलंकृता मूलत: बरेली की हैं। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंन 2002 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित एमएससी किया। सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान वे पीसीएस भी पास हुईं लेकिन सन 08 में तीसरी कोशिश ने उन्हें आईपीएस पुलिस की वर्दी पहना दिया। बरेली वाले घर में तो उनकी एक छोटी बहन है, लेकिन शादी के बाद बिहार के सीवान वाले घर में भरा-पूरा संयुक्त परिवार मिला। पति विद्याभूषण पड़ोसी अमेठी के जिलाधिकारी हैं।
नौकरी की शुरूआत ट्रेनिंग के दौरान नोएडा से हुई। एनसीआर का इलाका होने के चलते महिलाओं के साथ ऐसी समस्याएं खूब दिखीं। ज्यादा मामलों में महिलाओं इसे इग्नोर कर ही देती हैं, लेकिन बाकी लड़कियां अपने घरवालों को बता भी देती हैं। शादी-शुदा होने पर कुछ लोग अपने पति की मदद लेती हैं। ऐसे अपराधों के खिलाफ दिल्ली में काफी सख्ती है। एनसीआर होने के बावजूद नोएडा जैसे सीमांत इलाकों के लोगों की अपेक्षा दिल्ली जैसी ही होती है। जबकि संसाधनों आदि मामलों में दिल्ली के

अलंकृता सिंह
खुद एक महिला होने के चलते बचपन से ही अलंकृता को खूब अहसास था कि बेहूदा और अश्लील कॉल्स और फोन संदेश महिलाओं पर कितने भारी पड़ते हैं। वक्त-बे-वक्त बजने वाले फोन की घंटी किसी न किसी अनिष्ट की आशंका से महिलाओं के रोंगटे खड़ी कर देती है। कभी बेहूदा, अश्लील प्रस्ताव, गंदे एमएमएस, वगैरह-वगैरह। अलंकृत बताती हैं कि हर युवती को कभी न कभी कमोबेश ऐसी समस्याओं का साबका पड़ता ही रहता है। सामाजिक ताना-बाना इतना जटिल होता है कि ऐसी शिकायतें, युवतियों पर अक्सर उनपर ही उल्टी पड़ने लगती हैं। कई बार तो माता-पिता तक यह शिकायत वे करना चाहती हैं तो उनके अभिभावक उनपर भड़क पड़ते हैं डांट-फटकार उल्टे उनके खाते में जुड़ जाती है। नसीहत यह भी मिलती है कि छोड़ो पढ़ाई-लिखाई, तुम्हें कौन नौकरी करना है। शादी करो और अपना घर सम्भालो। कई बार तो ऐसा भी होता है कि पति से शिकायत करने पर वे उल्टे-पुल्टे सवाल कर तनाव और बढ़ा देते हैं। अक्सर घरवालों में भी ऐसी शिकायतों के चलते गंभीर मानसिक तनाव से जूझना पड़ता है। जाहिर है कि, सिर्फ यह सोच कर कि कौन झंझट करे, ज्यादातर युवतियां ऐसी हरकतों की शिकायत न करने के, खुद को खामोश ही कर देती है। जिन्दगी भर। लेकिन अलंकृता का मकसद ऐसी घटनाओं से जूझना था।
अलंकृता को सुल्तानपुर में पहली बार पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी मिली थी। नोएडा में जो सोच पनपी थी, वह यहां ठोस करने का वक्त मिला। नोएडा के मुकाबले सुल्तानपुर बहुत पिछड़ा इलाका है। हालांकि सोच को लागू करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी थी। लेकिन स्कूल और कालेज वगैरह के बीच सीधे पहुंच बनाने की कोशिश की गयी। बीएसए और डीआईओएस के सहयोग से प्राचार्यों के साथ बैठकें की गयीं जिनमें महिलाओं और खासकर लड़कियों को जानकारियों और उससे निपटने के लिए पुलिस तक पहुंचने की कोशिशें दी गयीं।
अलंकृता ने अपने रूटीन निरीक्षण के दौरान भी कालेजों से सम्पर्क करने का अभियान शुरू किया था। लेकिन वे हैरत में पड़ गयीं जब लम्भुआ के एक कालेज के प्राचार्य ने ऐसे अभियान के दौरान सीधे लड़कियों पर ही बंदिशों की वकालत शुरू कर दी। मसलन, आज-कल के माहौल से बचने के लिए उनकी नसीहत थी कि लड़कियों को सिर से पैर तक पूरी तरह ढंका-छिपा रहना चाहिए। लेकिन इससे अलंकृता का हौसला कम नहीं हुआ। परचे बांटे गये, फोर्स को इस मसले पर संवेदनशील बनाने का भी काम किया और महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराध से निपटने की मुहिम शुरू हो गयी। पौने दो महीने में 160 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 150 का निपटारा किया गया। तरीका था कि पुलिस सीधे ऐसे कॉलर्स से सम्पर्क करे और चेतावनी दे। जहां मामले बालिग लड़कों से जुड़े हों, वहां उनके अभिभावकों से सम्पर्क किया जाए। जहां दिक्कत जहां हो, वहां अंतिम अस्त्र चलाया जाए। मतलब, सीधे जेल। एक मामले में तो 26 साल के एक व्यक्ति को पुलिस ने जेल भेजा है।
केवल महिला-उत्पीड़न नहीं, अलंकृता सिंह संगठित अपराधियों से भी जूझ चुकी हैं। सुल्तानपुर पहुंचते ही उनका सामना लुटेरों-राजनीतिकों और उनके समर्थकों से पड़ा। लुटेरों ने एक युवा व्यवसायी पियूष सिंह से लाखों की लूट की थी। पुलिस ने जब लुटेरों को पकड़ा तो सैकड़ों शराबी उपद्रवियों ने उनके सामने ही तांडव करते हुए डीएम की कार को नदी में फेंक दिया। पहले तो वे हतप्रभ थीं, लेकिन जल्दी ही आक्रामक हुईं और उपद्रवियों से इतर-बितर करते हुए 350 से ज्यादा लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया। पियूष बताते हैं कि यूपी में उद्योग शुरू करने की ख्वाहिश पर इस हादसे ने बज्रपात कर दिया था, लेकिन अलंकृता के कार्रवाई ने वापस विश्वास जमाया। अलंकृता के तौर-तरीकों के किस्से और भी खूब हैं।
अलंकृता का मकसद तो अपराध-शास्त्र को ही अपनाने का ही है। लेकिन वे इसके लिए अपने मूल गणित-विषय के बजाय अब मनोविज्ञान और उससे भी पहले समाजशास्त्र का अध्ययन करना चाहती हैं ताकि जटिल मानवीय समस्याओं को मनो-सामाजिक गणितीय-सूत्रों के बल पर हल कर सकें। पुलिस बल में कल्याण योजनाओं को लागू करना भी उनका मकसद है। दरअसल, उनका कहना है कि केवल ईमानदारी ही नहीं, बल्कि ईमानदारी में क्रियाशील प्रोफेशनलिज्म की जरूरत होती है। यह पूछने पर कि यदि उनका पति कभी महिलाओं के उत्पीड़न के मामले पर उदासीन हुआ तो उन्हें कैसा महसूस होगा, अलंकृता का तपाक भरा जवाब था कि ऐसा हो ही नहीं सकता। फोर्स में शामिल महिलाओं की
भाषा-बोली में अक्सर भद्दी गालियां शामिल होती जा रही हैं, अलंकृता का जवाब है कि अक्सर मौकों पर कभी ऐसी जरूरत अनिवार्य तौर पर हो जाती है।
लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. सौवीर से संपर्क [email protected] और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.





