आकाशवाणी गोरखपुर का स्थापना दिवस 2 अक्तूबर को मनाया जाता है. इस उपलक्ष्य में इसकी पूर्व संध्या पर 1 अक्तूबर को आकाशवाणी परिसर में दिन में एक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ तिवारी, पूर्वोत्तर रेलवे के अधिकारी राकेश त्रिपाठी, आकाशवाणी समाचार गोरखपुर के सहायक समाचार संपादक रमेश चन्द्र शुक्ला, गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अनन्त मिश्र, स्वयं आकाशवाणी के कार्यक्रम प्रमुख डा. अरविन्द त्रिपाठी मंच पर आसीन थे।
कार्यक्रम के आरंभ में केन्द्र के कार्यक्रम प्रभारी डा. अरविन्द त्रिपाठी ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि यह सच है कि आज एआईआर अपनी गौरवपूर्ण परंपरा के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रहा है। उन्होंने कहा कि आज इसके 80 फीसदी लोग कार्य के प्रति संवेदनशील नहीं रह गये हैं। अगर हमें अपना पुराना गौरव वापस लाना है, तो हमें इस दिशा में भी गंभीरता से सोचना होगा।
श्री त्रिपाठी के इस कथन के बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे श्री सर्वेश दूबे ने डा. त्रिपाठी के विचारों को झूठ करार देते हुए कहा कि डा. अरविन्द शायद उलटा बोल गये, आज भी 95 फीसदी लोग यहां काम करते हैं, केवल 5 फीसदी लोग अपवाद हैं। बताते हैं कि 5 फीसदी का उल्लेख करते हुए वो डा. अरविन्द की ही ओर देख रहे थे। कार्यक्रम में विशेष अनुरोध पर बुलाये गये दैनिक हिंदुस्तान गोरखपुर के स्थानीय संपादक नागेन्द्र को जब बोलने को कहा गया, तो उन्होने स्पष्ट कहा कि वो आदतन वक्ता नही हैं, इस कारण वो लिख कर बोलना अधिक उचित समझते हैं।
अपने उदबोधन में नागेन्द्र ने डा. अरविन्द के विचारों से सहमति दिखाते हुए कहा कि कभी आकाशवाणी के 3 उद्देश्य होते थे- Inform, Educate, entertaine पर आज की गहरी प्रतिस्पर्धा के दौर में यह उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है. नागेन्द्र के इन विचारों को सुनकर संचालक सर्वेश ने नागेन्द्र को नसीहत देते हुए कहा कि किसी से स्क्रिप्ट लिखवा कर पढ़ देना आसान होता है, पर बिना जानकारी के बोलना ठीक नहीं. बोलना हो तो मौलिक विचार रखना चाहिये, किसी का लिखा नहीं। संचालक ने यहां तक कह दिया कि नागेन्द्र जी, आपकी बातों से हमारा खून उबल रहा है। इस दौरान संचालक भूल गये कि उनका बड़बोलापन कई कैमरों में रिकार्ड हो रहा है। इस दौरान श्री नागेन्द्र धैर्य की प्रतिमूर्ति बने मंच पर बने रहे।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





