दांव तो सिर्फ दांव ही होता है जिसका इस्तेमाल हर मौके पर किया जा सकता है, लेकिन राजनीति में चलता है सबसे अधिक आखिरी दांव। जिसे हर नेता अपने आप को सत्तासीन होने की गरज से बार-बार ऐसे ही दांव चलने का सिगूफा छोड़ता है, जिसमें कुछ कामयाब होते हैं, कुछ नाकामयाबी का दंश झेल करके आगे-पीछे होते रहते हैं। साल 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव की तिथि का ऐलान कर दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में 5 राज्यों के साथ ही चुनाव कराने का ऐलान चुनाव आयोग ने कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सात चरणों में संपन्न करवाये जाएंगे। पहले चरण के लिए अधिसूचना 10 जनवरी को जारी की जाएगी। पहले चरण के लिए मतदान 4 फरवरी को संपन्न होगा। इसके बाद 8 फरवरी, 11 फरवरी, 15 फरवरी, 19, फरवरी, 23 फरवरी और 28 फरवरी को विभिन्न चरणों में मतदान करवाये जाएंगे।
यह चुनाव कई राजनैतिक दलों के लिये आखिरी दांव के माफिक होता हुआ नजर आ रहा है। इस आखिरी दांव मे सबसे बड़ा दांव लगा है मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी का। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिये प्रभावी ढंग से संर्घषरत है लेकिन समाजवादी पार्टी में हुये हालिया उठापटक के बाद सपा में कई स्तर का संकट दिख रहा है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को अपना वजूद बरकरार रखने का खतरा मंडरा रहा है, यह तभी संभव है जब समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार बने, लेकिन आज के हालात इस बात की पुष्टि नहीं करती कि सपा की एक बार फिर से उत्तर प्रदेश में सरकार बनने जा रही है। भले ही तमाम एक्जिट पोल समाजवादी पार्टी के पक्ष में आकंडे़ सबसे बडे़ दल के रूप में काबिज होने के दे रहे हों, लेकिन ऐसी गिनती का कोई आंकड़ा सामने नहीं आ पा रहा है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार उत्तर प्रदेश में बनने का संकेत दे रहे हो।
खेत खलिहान और किसानों के हिमायती समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव के जीवन का करीब-करीब यह ऐसा आखिर चुनाव माना जा सकता है, जिसमें सपा कुछ कमाल करने का सपना संजो करके रखे हुये है। ऐसे मे क्या मुलायम सिंह यादव का यह सपना हकीकत में अमली जामा पहन पायेगा या फिर सिर्फ सपना ही बन करके रह जायेगा। मुलायम सिंह यादव के सामने कई किस्म का संकट बताया जा रहा है। एक बात सपा में अभी तक सीटों का सही ढंग से बंटवारा नहीं हो सका है। रोज-रोज किसी ना किसी प्रत्याशी को बदला जा रहा है। इससे साफ हो रहा है कि सपा की टिकट वितरण प्रणाली में कहीं ना कहीं लोच है, तभी तो ऐसा माहौल देखा जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव का गांव सैफई इटावा से करीब 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। जहां के लोग मुलायम सिंह यादव से इस बाबत उम्मीद लगाये बैठे हुये हैं कि सपा की आने वाले विधानसभा चुनाव में सरकार बनेगी और गांव देहात और किसानों का भला होगा। मुलायम सिंह यादव से उम्र में एक दो साल बडे़ सैफई गांव के प्रधान दर्शन सिंह का कहना है कि मुलायम सिंह यादव किसान के बेटे हैं इस लिये वे किसानों की तकलीफों को भली-भांति समझते हैं। किसान इस समय बेहद परेशान हैं, मायावती के राज में किसानों की कोई मदद किसी भी स्तर पर नहीं हो रही है, चाहे उसे खाद की जरूरत हो या फिर बीज की। किसी भी चीज की भरपाई नहीं हो पा रही है ऐसे में सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही उत्तर प्रदेश की बिगड़ी हुई किस्मत का सितारा बुलंद कर सकते हैं। मुलायम सिंह यादव के सहपाठी रहे दर्शन सिंह करीब 35 साल से सैफई से मुलायम सिंह यादव के प्रेम के चलते प्रधान बनते चले आ रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की वजह से दर्शन सिंह के खिलाफ कोई भी आदमी चुनाव मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं कर पाता ऐसे में दर्शन को प्रधान तो बनना ही होगा। किसी भी के लिये इतना सब कुछ करने वाले के लिये दुआ तो निकलेगी ही, इसी लिये दर्शन सिंह भी मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश का ताज पहनाने के लिये दुआ करने में लगे हैं।
2007 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता से मुलायम सिंह यादव बेदखल हो गये थे और मायावती की ताजपोशी होते ही मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई में जारी विकास कार्य को विराम लग गया। यहां पर कई करोड़ की लागत से बन रहा मल्टी परपज स्टेडियम, सैफई हवाई अड्डा, इटावा मैनपुरी रेल परियोजना और किसानों को रोजगार देने की नीयत से बनाया जा रहा दुग्ध विकास केंद्र का निर्माण अधर में लटक गया है। इसी इलाके के कुइया गांव के प्रधान चंदगीराम का मानना है कि मुलायम सिंह यादव की जब तक ताजपोशी नहीं होती तब तक यह विकास योजनायें ठप ही पड़ी रहेंगी और मुलायम की वापसी के बिना इनका कोई भी तारणहार नहीं हो सकता है। इसलिये अब की बार मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री बने। यह तो रही मुलायम सिंह यादव के गांव के लोगों की बात, ऐसा ही उनके जिले इटावा के लोगों का भी सोचना है।
2012 के चुनाव में जहां सत्तारूढ बहुजन समाज पार्टी अपनी ताकत का एहसास करने के लिये एक बार फिर से वापसी का सपना सजोये बैठी हुई हैं, वहीं समाजवादी पार्टी बसपा को पद से हटाने के लिये संघर्षरत नजर आ रही है। इसके लिये उनके पुत्र और प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव पूरे उत्तर प्रदेश के दौरे पर अपने पिता के उस क्रांतिरथ को लेकर निकले हुये हैं, जिससे 1989 मे मुलामय सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने में कामयाबी पाई थी। जो अब तक करीब-करीब पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा सत्ता हासिल करने के लिये कर चुके हैं। उनके मुकाबले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी उनके ही आगे-पीछे यात्रायें करने में लगे हुये हैं। दोनों युवाओं के बीच इस बात की भी स्पर्धा बनी हुई है कि अपने-अपने दल का जनाधार बढ़ा करके अपने-अपने दल को मजूबती प्रदान की जाए।
मुलायम सिंह यादव के प्रभाव वाले मध्य उत्तर प्रदेश में सपा कई किस्म के संकटों के दौर से गुजर रही है, जहां मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र मैनपुरी में उनकी समधिन उर्मिला यादव ने बगाबत कर दी है। वो कांग्रेस में आकर इसी क्षेत्र के करहल विधानसभा से सपा को ही चुनौती देने के लिये अखाडे़ में कूद चुकी हैं। उर्मिला यादव धिरोर विधानसभा से 1992 और 1997 में सपा से एमएलए रह चुकी हैं। इसके अलावा एटा संसदीय इलाके के पूर्व सपा सांसद देवेंद्र यादव भी ताल ठोंक करके बसपा में जाने के बाद एक बार फिर से नये दल कांग्रेस में चले गये हैं। 24 दिसंबर को देवेंद्र के कद को नापने के लिये कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने कासगंज में कांग्रेस की रैली करा के देवेंद्र की ताकत को नाप गये। सबसे हैरत की बात है कि रैली से पहले ही देवेंद्र की विवाहित बेटी बासु यादव को पटियाली विधानसभा का टिकट भी दे डाला गया है।
2009 के संसदीय चुनाव में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के मेहबरबानी के चलते राममंदिर आंदोलन के कभी नायक रहे कल्याण सिंह एटा सांसद बन चुके हैं। इस सीट से कल्याण को जितवाने के लिये मुलायम सिंह यादव ने अपने दल के प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतारा था। मुलायम सिंह यादव के सहयोग से सांसद बनने के बाद दोनों के बीच अमर सिंह के बयानों के बाद बेहद कटुता आ गई है। कल्याण के विकल्प के रूप में मुलायम अपने पुराने साथी मुस्लिम नेता आजम खां को वापस ले आये हैं, जिन पर सपा के मजबूत वोट बैंक को एकजुट करने का दारोमदार है।
बात कर लेते है फिरोजाबाद संसदीय सीट की। पार्टी के कद्दावर लोगों को जनता की अदालत में खड़ा करने की बजाय जिस प्रकार से उन्होंने अपनी वधु पर दांव खेला, जिसमें घर की बहू डिंपल यादव की हार के बाद तो वास्तव में मुलायम अपना आत्मसम्मान ही खो बैठे और इसकी वजह साफ है कि मुलायम के परिवार की यह पहली घटना है कि वर्चस्व बनाने के बाद मुलायम परिवार का कोई सदस्य पहली मर्तबा जनता की अदालत में अपने ही परिवार के उस सदस्य के सामने बौना साबित हुआ, जिसने राजनीति के गुर उन्हीं सपा मुखिया से सीखे थे। अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं की हार ने आज मुलायम को तोड़ दिया हैं, हालांकि अब वह इससे निजात पाने की मुहिम छेड़ना चाहते हैं परंतु शायद अब उनके तरकस में वह तीर नहीं रह गए जिनकी बिना पर वे अपने रूठों को मना सकें और पार्टी की मुख्यधारा से जोड़ सकें।
मुलायम सिंह यादव एक बार नहीं तीन-तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इतना ही नहीं मुलायम केंद्र में एच.डी. देवेगौडा और इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में देश के रक्षा मंत्री भी रहे। मुलायम जिस राजनीति को साधते हुये कांग्रेस के दरवाजे पर पहुँचे हैं, असल में वह राजनीति देश में उस वक्त की पहचान है, ऐसे में मुलायम की लोहिया से सोनिया के दरवाजे तक की यात्रा के मर्म को समझना होगा। यहां पर इस बात का भी जिक्र करना जरूरी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मुददे को जितना देश के दूसरे नेताओ ने नहीं उछाला होगा उससे कहीं अधिक मुलायम सिंह यादव ने उछाल कर एक खाई पैदा कर ली थी। एक समय तो ऐसा लगता था कि जैसे मुलायम सिंह यादव से बड़ा कोई दूसरा राजनैतिक दुश्मन सोनिया गांधी का नहीं होगा, लेकिन मुलायम सिंह यादव के इस गुस्से का शायद बदला सोनिया गांधी ने परमाणु मुद्दे पर कांग्रेस के लिये सपा से समर्थन लेकर मुलायम सिंह यादव को ठेंगा दिखा दिया।
मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी का उदय कांग्रेस के विरोध की राजनीति के साथ शुरू हुआ था, परंतु जिस प्रकार से कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की पार्टी के साथ गठबंधन कर कांग्रेस की जड़ों को खोखला कर दिया था, कमोवेश उसी तरीके से जुलाई 2009 में परमाणु करार के मुद्दे पर केन्द्र सरकार बचा कर एक बार फिर से राजनैतिक एवं ऐतिहासिक भूल कर डाली। इस भूल ने मुलायम को वामपंथियों से दूर कर दिया, यह भूलें यहीं पर थम जाती तब भी ठीक था। मुलायम सिंह यादव कांग्रेस को अपना खास समझने लगे कि 2009 के संसदीय चुनाव में फिर चुनावी खाका बना डाला, मुलायम को अपनी गलती का एहसास तब हुआ जब आखिरी दौर में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने गठबंधन की राजनीति बंद करने की घोषणा कर दी।
1997 मे मायावती ने राजनैतिक तौर पर मुलायम सिंह यादव को कमजोर करने की गरज से इटावा को बांट करके औरैया को जिले का दर्जा दिया था, उसके बाद इस जिले में भी सपा की हालत अच्छी नहीं मानी जा रही है। मुलायम के सबसे खास रहे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धनीराम वर्मा अपने बेटे को नेता बनाने के चक्कर में मुलायम सिंह से दूर जा चुके हैं। महेश वर्मा धनीराम वर्मा के बेटे हैं, जो बसपा के टिकट पर मुलायम के बेटे अखिलेश यादव से कन्नौज लोकसभा के चुनाव 2009 में हारने के बाद औरैया जिले की बिधूना सीट पर हुये उपचुनाव में बसपा के एमएलए बन गये। इससे पहले महेश के पिता और मुलायम सिंह यादव के सबसे खास धनीराम वर्मा एमएलए थे। मैनपुरी लोकसभा सीट से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। इस सीट पर किशनी विधानसभा से सपा की एमएलए संध्या कठेरिया भी बागी हो कर बसपा में जा चुकी हैं। मैनपुरी जिले की धिरोर विधानसभा को नये परिसीमन मे खत्म करके उसका आधा हिस्सा करहल और आधा फिरोजाबाद जिले की नवसृजित सीट सिरसागंज मे जोडं दिया गया है। इस सीट से कभी एमएलए और मुलायम सरकार में राजस्व मंत्री रहे बाबूराम यादव के बेटे अनिल यादव को भाजपा ने करहल से प्रत्याशी बना करके सपा के लिये मुश्किल खड़ी कर दी है।
मुलायम सिंह यादव के गृहनगर इटावा में भी सपा के दिन बेहतर नहीं कहे जा सकते हैं क्यों कि मुलायम के भाई शिवपाल सिंह यादव के निर्वाचन क्षेत्र जसवंतनगर से बसपा ने एक बागी सपाई मनीष यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है। मनीष यादव परंपरागत सपाई हैं। साल 2003 में इनके भाई समाजवादी पार्टी की छात्र ईकाई के अध्यक्ष दलवीर सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के बाद से मनीष यादव के खिलाफ कई अपराधिक मामले सपा सरकार में दर्ज कराये गये। परिणामस्वरूप मनीष ने बदले के रूप में शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने की मन बनाया तो मायावती ने उसे पूरा भी कर दिया। मनीष यादव कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव का तिलस्म अब टूट रहा है। पिछले साल हुये पंचायत चुनाव में इसी इलाके से शिवपाल सिंह यादव का बेटा आदित्य यादव जिला पंचायत पद के लिये खड़ा हुआ था, लेकिन मुलायम के तिलस्म के बाबजूद भी वो हार गया। इसलिये यह कहा जा सकता है कि मुलायम चूक गये हैं।
इटावा सदर सीट से मुलायम सिंह यादव के सबसे खास और 2002 मे पहली बार जीते महेंद्र सिंह राजपूत 2007 के चुनाव में सपा से जीते लेकिन उनका मन सपा नेताओं से उचट गया तो बसपा में चले गये। इस सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें बसपा ने महेंद्र को उम्मीदवार बनाया और महेंद्र लगातार तीसरी बार जीत करके हैट्रिक कायम की। यह है मुलायम सिंह यादव के घर का हाल तो पूरे उत्तर प्रदेश का हाल खुद आंका जा सकता है। मुलायम ने अपने घर की सीट इटावा सदर से सपा को काबिज कराने के लिये अपने दल से दो बार के सांसद रहे रघुराज सिंह शाक्य पर दांव खेला है, जो बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत से मुकाबला करेंगे।
इस सबके बाबजूद सपा के छोटे-बडे़ नेताओं को पूरा भरोसा है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत ही नहीं मिलेगा बल्कि सपा सरकार बना करके एक नया आयाम कायम करेगी और माया के लूट राज से लोगों को राहत देगी। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव का आखिर दांव जरूर कामयाब होगा क्यों कि राजनैतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं
कि मायाराज में जो कुछ भी काला सफेद हुआ लोगों ने देखा है। उससे निजात दिलाने मे सपा ही कामयाब हो सकती है इसलिये जिस समय जनमत का दिन आयेगा उस दिन आम मतदाता मायाराज के कारनामों को ही मददेनजर रख करके मतदान करेगा।
लेखक दिनेश शाक्य सहारा समय उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के इटावा में रिपोर्टर हैं.






