इस समय उत्तर प्रदेश पुलिस के जानकार लोगों में एक घर की बहुत अधिक चर्चा है. इस घर की चर्चा लखनऊ के सबसे पाश कहे जाने वाले गोमतीनगर से सटे गोमतीनगर विस्तार योजना के पूरे इलाके में भी है. असल में चर्चा यह है कि उत्तर प्रदेश के एक आला पुलिस अधिकारी का बड़ा आलिशान घर बन रहा है.
यूपी के किसी बड़े आईपीएस अधिकारी का गोमतीनगर या उसके आस-पास घर बनना कत्तई बड़ी बात नहीं है, पर जिस तरह से इस घर को बनवाने में पूरे पुलिस महकमे के खुले सहयोग की बात कही जा रही है वह इसे चर्चा में ला रही है. कहा जा रहा है कि इस घर को बनवाने में रात-दिन पुलिस के कई जवान जुटे रहे और तब जा कर यह घर तैयार हो सका.
मुझे भी कुछ लोगों से इस घर के बारे में जानकारी मिली और मैं भी इसके बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने को उत्सुक हुई. मैंने इसके लिए अपने एक साथी को लगाया. हमें तो बस इतना ही मालूम था कि वह घर गोमतीनगर के बगल से गुजरने वाले रेलवे लाइन के उस पार नए बस रहे गोमतीनगर विस्तार योजना में है पर यह विस्तार योजना तो कई किलोमीटर में फैला है. ऐसे में मात्र इतनी जानकारी से कैसे वह घर मिल सकेगा, यह कहना बहुत मुश्किल था. फिर भी हमारे साथी ने हिम्मत की, अपने एक दोस्त को लिया और वह घर खोजने निकल पड़े.
जब वे दोनों करीब एक घंटे बाद लौट कर आये तो दोनों बहुत घबराए से दिख रहे थे. मैंने जब पूछा कि क्या हो गया तो हमारे साथी ने कहा कि बड़ी गडबड हो गयी. वैसे उन्हें यह घर खोजने में थोड़ी भी दिक्कत नहीं हुई. हुआ यह कि उन्होंने जैसे ही रेलवे लाइन पार किया और जिस पहले आदमी से मिले, उससे उन्होंने पूछा कि भाईसाहब, यहाँ क्या डीजी साहब का मकान बन रहा है. उस आदमी ने यह तक नहीं पूछा कि किस डीजी साहब का, किस विभाग के डीजी का और तुरंत कहा- “हाँ, आप सेक्टर चार चले जाईये. वहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नाम से तीन अपार्टमेंट के समूह बन रहे हैं. वहीँ सरस्वती अपार्टमेंट के ठीक बगल में डीजी साहब का मकान है.” उन्होंने बताया कि आगे जाने पर उन्होंने जिससे भी डीजी साहब का मकान पूछा, सबने एक बार में ही उस घर की ओर का रास्ता बता दिया. इस तरह वे रेलवे क्रासिंग से करीब दो किलोमीटर पर स्थित सरस्वती अपार्टमेंट पहुंचे. वहाँ एक चाय वाले से पूछा तो उसने भी एकदम से कहा- “वो रहा, सामने डीजी साहब का मकान है.”
हमारे साथी उस मकान के सामने पहुँच गए थे. उनके अनुसार मकान काफी बड़ा बन रहा था. इसके अलावा मकान के सामने की जमीन पर कब्जा कर के कई सारे पेड-पौधे लगाए गए थे. वहाँ दो माली बड़ी मेहनत से काम कर रहे थे. बगल में पुलिस का एक टेंट भी लगा था, जिसमें दो पुलिस वाले बैठे हुए थे. इसके अलावा घर के गेट पर भी एक पुलिसवाला था. उन्होंने दूर से मकान के कई सारे फोटो भी लिए. इसी बीच मेरे साथी के दोस्त ने उनको उकसा दिया कि चल कर नजदीक से फोटो लेते हैं और वे भी उसके झांसे में आ गए. वे नजदीक गए और तुरंत एक फोटो लिया लेकिन तब तक गेट पर खड़े उस पुलिस वाले ने उन्हें देख लिया. वह पुलिस वाला ऊँचे आवाज़ में चिल्लाया जिस पर ये दोनों तुरंत अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ कर वहाँ से भाग लिए.

इतना सब तो ठीक था लेकिन जब वे लोग वापस आ रहे थे तो एक जगह वे रास्ता भटक गए. जब तक किसी से पूछ कर वे सही रास्ते पर आ पाते तब तक दो पुलिसवाले दो अलग-अलग मोटरसाइकिलों पर आ कर इन दोनों की मोटरसाइकिल के दोनों तरफ से खड़े हो गए. इस तरह अचानक दो पुलिसवालों से अपने आप को घिरा हुआ देख कर ये दोनों लोग एकदम से डर गए. इसके बाद उनमें से एक मोटरसाइकिल सवार ने दूसरे से कहा कि यही था जिसने फोटो खींचा था. दूसरा पुलिसवाला ज्यादा दबंग किस्म का था. उसने साथी से पूछा कि क्या उसने फोटो खींचा है? साथी घबरा रहे थे और उन्होंने कहा कि उन्होंने फोटो नहीं खींचा है. इस पर पहले वाले ने और तेजी से उसे डांट कर कहा कि यह झूठ कह रहा है, इसी ने फोटो खींचा है. दूसरे पुलिसवाले ने और भी सख्ती से फिर पूछा. यह सिलसिला चलता तभी मेरे साथी के सहयोगी का दिमाग अचानक काम किया. उसने तुरंत मामला अपने हाथ में लिया. अपनी आवाज़ तेज की और उन लोगों से हड़का कर पूछा- “हमने फोटो खींची या नहीं खींची यह तो बाद की बात है, पहले आप बताइये कि आप कौन हैं और आप किस हैसियत से हमसे यह सवाल कर रहे हैं?”
इस सवाल से उनमें से दूसरा सिपाही एकदम से सहम गया और उसने पैंतरा बदल लिया. उसने कहा-“अच्छा, तो आप लोगों ने फोटो नहीं खींचा है, कोई बात नहीं, ठीक है.” इतना कह कर वह वहाँ से जाने लगा. पहले वाला सिपाही कुछ बेवकूफ किस्म का रहा होगा. वह उस समय भी फोटो खींचे जाने की बात पर अटका हुआ था पर दूसरे सिपाही ने उसे अपने साथ चलने को कहा. मेरे साथी की हिम्मत इससे बढ़ गयी और उन्होंने तुरंत इन दोनों के मोटरसाइकिलों के नंबर नोट कर लिए- यूपी 32 डीजेड 464 और यूपी 32 बीजी 2523. इसके बाद भी वे दोनों लोग मेरे घर तक आये तो लगातार घबराए से रहे कि कहीं वे पुलिसवाले और अधिक संख्या में ना आ पहुंचे और कोई मार-पीट ना कर लें. बात मजेदार भी थी और गंभीर भी. प्रश्न यह था कि मकान बन रहा है, वह तो ठीक है पर इसमें इतने सारे पुलिसवाले क्यों लगे हैं? साथ ही यह भी प्रश्न था कि क्या किसी घर का बाहर से फोटो खींचना इस देश में कोई गुनाह माना जाता है? यदि नहीं तो वे पुलिसवाले इस तरह धमकी देने क्यों गए थे?

अगले दिन मैं भी वह “घर” देखने पहुंची. आखिर इतनी सारी बात सुन कर उत्सुकता जो बहुत बढ़ गयी थी. मैंने भी उन लोगों की बात की सत्यता आजमाने के लिए रेलवे लाइन पार करते ही जो पहला आदमी मिला उससे पूछा कि डीजी साहब का मकान कहाँ बन रहा है और मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब उसने करीब दो-ढाई किलोमीटर दूर के उस मकान का एकदम सही पता बता दिया. जब मैं उस घर के पास पहुंची तो वही चायवाला मिला. मैंने उससे पूछा कि यह किस डीजी साहब का मकान है तो उसने तुरंत उनका नाम भी बताया. मैंने पूछा कि यहाँ पुलिसवाले होंगे, उनसे मिलना है तो उसने कहा कि बस वहीँ अंदर टेंट में बैठे होंगे, आप जा कर मिल लीजिए. मैं वह मकान और उसके रक्षक सिपाहियों की फौज देख कर चली आई लेकिन मैंने उस मकान का फोटो नहीं खींचा क्योंकि मैं कत्तई नहीं चाहती थी कि मैं भी पिछले दिन वाली स्थिति से गुजरूं. अब मैं जानती हूँ कि यह मकान कतिपय पुलिसवालों और गोमतीनगर विस्तार के लोगों के बीच इतनी चर्चा में क्यों है.
डॉ. नूतन ठाकुर
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता






