इन नौकरशाहों को हुआ क्या है, आखिर इस मर्ज की दवा क्या है। पहले यशवंत सिंह को पकड़ा फिर अनिल को पकडा, फिर यशवंत को छोड़ा तब अनिल को भी 10 सितम्बर को छोड़ दिया। जब छोड़ना ही था तो पकड़ा ही क्यों था। और जब गलत किया तो छोड़ा क्यों? यह यक्ष प्रश्न अभी सुलझा ही नहीं था कि अब इधर पता चला कि असीम त्रिवेदी को देशद्रोह के आरोप में पकड लिया गया। फिर देशद्रोह हटा दिया। हद हो गयी दोगलई की।
अब यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि क्या देशद्रोह है और क्या लोकसंगत, अजीब बिडम्बना है कि जो लोकसभा में, विधानसभा में खुलेआम हो रहा है, वह कोई देशद्रोह नहीं है, जहां देश की जनता के चुने हुए लोग प्रदेश की विशिष्ट कुर्सियों पर सवार होते हैं और फिर उन्हीं कुर्सियों का प्रयोग अपने भाई बन्धुओं की ओर चलाने से भी नहीं चूकते। अब वो करें तो राष्ट्रलीला है और हम जब अपने खुले विचारों को पटल पर रखने की कोशिश करते हैं, तो वह देशद्रोह है।
बड़ा ही रंज होता है यह सोच कर कि क्या यह देष उन्हीं महापुरूषों का है, जिन्होंने विदेशों में जाकर भी अपनी वाणी के माध्यम से लोगों को अपनी गुरूता का भान कराया। बहुत समय नहीं बीता कि अब उन्हीं महापुरूषों के देश में दूरदेश का पत्रकार इस देश के राष्ट्राध्यक्ष को भली बुरी बातें सुनाता है। यही देश था और वही दूरदेश था, तब हम आज की तरह उतने मजबूत भी नहीं थे। हमारी प्रभुता अभी कमजोर थी। उस समय डा. राजेन्द्र प्रसाद जैसे लोग या जवाहर लाल नेहरू जैसे लोगों पर क्यों नहीं किसी ने अंगुली उठायी। यह सब देख कर यही लगता है, कि शायद अन्धेरनगरी और चौपट राजा इसी तरह के रहे होंगे कि गलती करें राष्ट्राध्यक्ष और भुगतें बुद्धिजीवी पत्रकार… जय हो लोकतंत्र की।
संपर्णानंद दुबे
मऊ





