लखनऊ से प्रकाशित उर्दू दैनिक आग और हिन्दी दैनिक इन्कलाबी नजर में पत्रकारों से बंधुवा मजदूरों की तरह काम लिया जा रहा है. यहाँ के पत्रकारों को साप्ताहिक अवकाश के अलावा और कोई सुविधा नहीं है. यहाँ पर पत्रकारों का पत्रकारिता के नाम से उत्पीड़न किया जा रहा है. अगर किसी पत्रकार को कभी घर में कोई काम पड़ जाए या उसके घर कोई मर जाए या पत्रकार को ही कोई बुखार जैसी समस्या हो जाये तो संस्थान की बला से, संस्थान में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है कि उसे अवकाश मिल जाए.
कर्मचारी ने अवकाश ले लिया तो उसकी उस छुट्टी का पैसा काट लिया जाता है. संस्थान का उस पत्रकार के साथ कोई हमदर्दी नहीं होती है, जबकि संस्थान इस समय काफी फायदे में चल रहा है, पर मालिकान इन सबसे बेखबर हैं. मालिकान तो इसकी आड़ में अपने काले धन को सफेद धन बनाने में जुटे हैं, उनको न ही पत्रकारों से कोई सरोकार है न ही पत्रकारिता से कोई सरोकार है. संस्थान में आये दिन कोई न कोई नियम बनाए जाते हैं. परन्तु पत्रकारों के हित की कोई बात नहीं करता है. और इन सबका कारण है संस्थान का ही जीएम हैदर और विज्ञापन विभाग का मैनेजर मेराज सिद्दीकी, ये दोनों व्यक्ति मालिकान को केवल मूर्ख बना रहे हैं.
संस्थान में इनके आगे किसी की भी नहीं चलती है. यहाँ तक कि समाचार पत्र के सम्पादक भी इनके आगे बेबस हैं, लेकिन इतना तो साफ है कि सम्पादक महोदय पत्रकारों की समस्या को लेकर काफी चिंतित हैं. कई बार उनकी हैदर से पत्रकारों के हित की बात को लेकर तू-तू मैं-मैं भी हुई. बेचारे सम्पादक भी हैदर की कठपुतली बन कर काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि आज के समय में नौकरी मिलना आसान नहीं है तो मुझे अपनी कुर्सी भी तो बचानी है. अखबार में क्या छप रहा है, क्या नहीं छप रहा है हैदर को कोई मतलब नहीं है. मतलब है तो केवल मान्यता से, बस किसी तरह से मान्यता हो जाए. मजेदार बात ये है कि जब माह की सात तारीख को वेतन दिया जाता है तो जैसे मजदूरों को वेतन लाइन लगा कर मिलता है, वैसे ही बेचारे इन पत्रकारों को लाइन में ही लगवा कर वेतन दिया जाता है. और वेतन के समय बहुत हंगामा भी होता है. कभी किसी पत्रकार का एक-दो दिन का वेतन काट लिया जाता है तो कभी किसी का बिना मतलब का वेतन काट लिया जाता है, जिसका पैसा हैदर और मेराज की जेब में जाता है.
अब हैदर काफी सतर्क हो चुका है. अब वो संस्थान में ऐसे कर्मचारियों को रख रहा है जो काम तो नहीं जानते हैं, अलबत्ता कानाफूसी अच्छी तरह जानने और करने में माहिर हैं, जिनको खबर लिखने का कोई अनुभव नहीं है लेकिन हैदर की चापलूसी करके ये अपनी दबंगई से सब पर हावी हैं. ये न तो मीटिंग में आते हैं और न ही कोई काम करते हैं. अगर कोई खबर है इनके पास तो ये हाथ से ही घंटे भर एक खबर लिखने में समय बर्बाद करते हैं, अगर इनसे मीटिंग में आने को बोला जाता है तो ये सीधे गालियों से बात करते हैं. ये केवल पुलिस की दलाली ही करने में ही ये मस्त हैं!
शाहनवाज






