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‘आजतक’ पर ‘आपातकाल’ देखा तो याद आया कि मेरी नसबंदी होते होते बची थी

Ashok K Sharma : आपातकाल के दौरान मेरी नसबंदी होते होते बची. आज यह शर्मनाक वाकया याद आ गया. चैनल 'आजतक' पर 'आपातकाल' कार्यक्रम देखते समय. हुआ यह कि 1976 में मेरे पिता श्री यज्ञ दत्त शर्मा (अब 90 के) जिला सूचना अधिकारी थे, उनका मध्य सत्र में अलीगढ तबादला हुआ था. सारी जगहों पर प्रवेश परीक्षाएं हो चुकीं थीं. अलीगढ के डीएस कालेज में वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान के स्नातकोत्तर कोर्स में पाच पांच सीटें बाकीं थीं. मेरे पिता मुझे वहां लेकर गए. परन्तु वहां तो नज़ारा दूसरा था.

Ashok K Sharma : आपातकाल के दौरान मेरी नसबंदी होते होते बची. आज यह शर्मनाक वाकया याद आ गया. चैनल 'आजतक' पर 'आपातकाल' कार्यक्रम देखते समय. हुआ यह कि 1976 में मेरे पिता श्री यज्ञ दत्त शर्मा (अब 90 के) जिला सूचना अधिकारी थे, उनका मध्य सत्र में अलीगढ तबादला हुआ था. सारी जगहों पर प्रवेश परीक्षाएं हो चुकीं थीं. अलीगढ के डीएस कालेज में वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान के स्नातकोत्तर कोर्स में पाच पांच सीटें बाकीं थीं. मेरे पिता मुझे वहां लेकर गए. परन्तु वहां तो नज़ारा दूसरा था.

जिलाधिकारी ने सभी प्राचार्यों को नसबंदी करने का लक्ष्य दे रखा था. उनके लक्ष्य में तीस लोग कम पड़ रहे थे. मेरे पिता से कहा गया कि दस नसबंदी के केस लाकर दें वर्ना आपके बेटे का दाखिला नहीं होगा. दौड़ भाग करके सात नसबंदी के केस तो जुट गए मगर बाकी तीन कहाँ से लाते? हमारे सरकारी वाहन चालक ने कहा कि मैं अब बूढा हो रहा हूँ. बच्चों की भी शादी हो गयी, मैं अपनी नसबंदी करा लूँगा. मेरे पिता बोले, मैं भी करा लेता हूँ.

नौ केस के डिटेल लेकर हम कालेज गए. प्राचार्य ने कहा "कतई मुमकिन नहीं, जिलाधिकारी स्वर्ण दास बागला नहीं मानेंगे. आप अपने बेटे की भी करा लीजिये." मेरे पिता की आँखों में आंसू भर आये, रुंधे गले से बोले, "मेरा इकलौता लड़का है, शादी और बच्चे भी नहीं हुए. हमारा कोई दूसरा लड़का भी नहीं. सोचने का वक्त चाहिए." हम लौट आये. पापा इधर से उधर दौड़ रहे थे. उनकी मुलाकात अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो डॉ. एएम खुसरो से हुई. दरअसल विश्वविद्यालय में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी आने वाले थे.

'आपातकाल' का समय था. खुसरो साहेब मीडिया प्रबंधन को लेकर बहुत चिंतित थे. उनके जनसंपर्क अधिकारी श्री इकरामुल्लाह खान भी परेशान थे. इधर अलीगढ का जिला सूचना कार्यालय साधनविहीन था. मेरे पिता ने मेरी हस्तलिपि का भी साइक्लोस्टाइल मशीन पर स्टेंसिलवाले अंग्रेज़ी और हिंदी प्रेस नोट बनाने में इस्तमाल किया (तब मेरी हस्तलिपि बहुत ही सुन्दर थी). बढ़िया प्रेस कवरेज से उपकुलपति प्रसन्न हुए, तो मेरे पिता से पूछ बैठे मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ वाईडी शर्मा जी?
यूनिवर्सिटी के पीआरओ इकराम साहेब ने मौका गवाए बिना कहा, "जनाब, इनका बीटा अव्वल दर्जे का स्टूडेंट है मगर एमएससी में दाखिला नहीं हो पा रह."

अगले ही दिन, शुक्रवार 6 अगस्त 1976 को सुबह नौ बजे बोटनी विभाग के प्रोफेसर डॉ एमएमआरके आफरीदी ने मेरी परीक्षा ली और मेरा दाखिला हो गया. सोमवार को डीएस कालेज के प्राचार्य कार्यालय से बड़े बाबू का फोन आया, तो पहली बार मैंने अपने पिता को किसी को बहुत गन्दी गाली देकर फोन काटते देखा. इस सारी कवायद में मुझ पर मुस्लिम समाज ने जो उपकार किया उसे मैं कभी भूल नहीं सकूंगा.

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तालीम ने मेरी ज़िन्दगी बदल डाली. मैंने शायरी, कविता, लेखन और भाषण कला भी वहीं की मिटटी की मेहरबानी से पायी. बाद में मुझे स्वर्ण पदक मिला, मैं अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से आईएएस और फिर आईऍफ़एस के इंटरव्यू तक गया. देश के सबसे प्रख्यात प्रकाशकों के यहाँ लेखक के तौर पर पैठ बनी. पत्रकार के रूप में पहचान बनी. आज के हालात देख कर सोचता हूँ, हमें कैसी सरकार चाहिए? वो जिससे मुसलमान डरें या वो जिसमें पूरा देश डरे या कोई तीसरा विकल्प जो ना आपातकाल की बात करे और ना कट्टरता की, जो सबका हो सब जिसके हों?

यूपी में बतौर अधिकारी कार्यरत अशोक कुमार शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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