पिछले कई वर्षों से सोए पड़े, बल्कि ये कहा जाए कि आंखें मूंद कर 'महटियाए' पड़े मीडिया को जागे हुए की पहचान दिलाने के लिए आजतक के पत्रकार दीपक शर्मा वाकई बधाई के पात्र हैं। बधाई उनकी केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की जड़ खोदने वाली रिपोर्ट के लिए तो है ही, उससे कहीं ज्यादा बधाई इस बात के लिए कि वो उन चंद खुशकिस्मत रिपोर्टरों में शामिल रहे जिनकी रिपोर्ट दबायी नहीं गयी, वो भी तब जबकि कांग्रेस के पूर्व सांसद एमजे अकबर इंडिया टुडे ग्रुप के सर्वेसर्वा हैं।
प्रभु चावला के दौर में आजतक को कांग्रेसी सरकार की बखिया उधेड़ने वाले चैनल के तौर पर जाना जाता था। पुराने संघी माने जाने वाले प्रभु चावला और भाजपा नेताओं की करीबियों का ही असर था कि उनके दौर में इंडिया टुडे ने जैन आयोग की रिपोर्ट लीक की थी और कांग्रेस के समर्थन वाली सरकार गिर गयी थी। अगर ये रिपोर्ट उनके दौर में आई होती तो किसी को बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं होता।
मीडिया में हर किसी को मालूम है कि भाजपा राज में प्रभु कितने पॉवरफुल हो गए थे और उनके ग्रुप को इसका कितना फायदा पहुंचा था। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि दोबारा फॉर्म में आते ही कांग्रेस ने प्रभु चावला से बदला साधना शुरू कर दिया था। उनके कार्यक्रम सीधी बात में कभी कांग्रेस का कोई मंत्री या राजनेता तो दूर, कोई छुटभैया कार्यकर्ता तक दिखाई नहीं पड़ा। ऑफ द रिकॉर्ड लगभग सबने कह दिया, "भइया, मजबूरी है… ऊपर से आदेश है, टाल नहीं सकते इसलिए आ नहीं सकते।" चर्चा आम थी कि ग्रुप की पर्सनल लाइजनिंग और काम-काज़ पर भी असर पड़ने लगा तो अरुण पुरी यानि एपी साहब ने प्रभु से नाता तोड़ एमजे अकबर को कमान सौंप दी।
एमजे के कामकाज़ का तरीका बिल्कुल अलग है। वे ग्रुप के सभी प्रकाशनों और चैनलों के वर्षों से सत्ता विरोधी बने तेवर को 'पॉज़िटिव' सोच के साथ चलाने लगे। हालांकि उनकी इस कोशिश में आजतक और इंडिया टुडे की लोकप्रियता पर भी असर पड़ा, लेकिन बेहद मामूली। 'नेगेटिव' सोच वाले पत्रकारों को सुधर जाने की घोषित-अघोषित चेतावनी का ही असर हुआ कि सबकुछ ट्रैक पर वापस आने लगा। सभी मीडिया वेंचरों पर सरकारी विभागों और निगमों के विज्ञापन भी आने लगे और ग्रुप के दूसरे कारोबार भी बढ़ने लगे।
अब वापस मुद्दे पर लौटें, यानी बात दीपक शर्मा के उस पोल-खोल अभियान की जिसने केंद्रीय कानूम मंत्री सलमान खुर्शीद को नंगा कर दिया। सूत्रों का कहना है कि इस रिपोर्ट को ब्रेक भले ही अब किया गया हो, लेकिन इस पर काम जुलाई महीने से ही चल रहा था। आजतक में प्रचलित रिवाज़ के मुताबिक इस तरह की गंभीर रिपोर्टों को अरुण पुरी सीधे अपनी निगरानी में रखते हैं। बेशक, ये रिपोर्ट भी दीपक शर्मा और अरुण पुरी के बीच ही रही हो, लेकिन ऐसा नहीं था कि इतने अर्से तक इसकी भनक अकबर साहब को न लगने दी गयी हो।
बहरहाल, रिपोर्ट और रिपोर्टर की काबिलियत पर कोई सवाल नहीं खड़ा होता, लेकिन और कई सवाल लगभग सभी के दिमाग में घूम रहे हैं। हालांकि लगभग सभी राजनेता और समाजसेवी ऐसे ट्रस्टों और संस्थाओं की मदद से सरकारी फंड हड़पने में जुटे है, लेकिन निशाने पर सिर्फ़ खुर्शीद ही क्यों रहे? सवाल ये भी उठता है कि क्या अकबर साहब ने सबकुछ जानकर भी एक पत्रकार के तौर पर इमानदारी से रिपोर्ट को आगे बढ़ाया? क्या कांग्रेस में भी किसी को इस रिपोर्ट के बारे में कोई अंदेशा नहीं था? क्या कांग्रेस की आंतरिक गुटबाज़ी ने भी इस घोटाले के राज़फाश को हवा दी है?
और सबसे अहम सवाल, कि क्या सबकुछ कांग्रेस आलाकमान की जानकारी में हो रहा था, जहां से अबतक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है?
लेखक धीरज भारद्वाज कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. न्यू मीडिया के सक्रिय जर्नलिस्ट हैं. कई न्यूज वेबसाइटों में संपादक का दायित्व निभाते हुए कई बड़ी खबरें इन्होंने ब्रेक की हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





