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आज़म ख़ान हीरो या विलेन?

क्या मुज़़फ़्फ़रनगर दंगे से किसी राजनीतिक पार्टी को फायदा हुआ है ? क्या इस दंगे से किसी सियासी दल को नुक़सान हुआ है? क्या दंगे के बाद मुस्लिम वोटर की सोच बदली है? क्या दंगे ने जाट समुदाय को समाजवादी पार्टी और अजित सिंह से दूर किया है? क्या ये दंगा अचानक था या एक सोची समझी साज़िश ? क्या दंगा कराने में आज़म ख़ान या सपा सरकार को कोई रोल है ? इस दंगे में आज़म ख़ान की चर्चाओं से उनको सियासी फायदा होगा या नुक़ासान ? कहीं ऐसा तो नहीं इस दंगे को कराने के पीछे बीजेपी जैसी सोच या ख़ुद आज़म ख़ान का तो कोई रोल नहीं? क्या इस दंगे को कराने में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले या सत्ता या फिर विपक्ष के किसी नेता का हाथ है? ये और ऐसी ही कई और सवाल ऐसे हैं कि जिनका जवाब पाने को देशवासी बेताब हैं?

क्या मुज़़फ़्फ़रनगर दंगे से किसी राजनीतिक पार्टी को फायदा हुआ है ? क्या इस दंगे से किसी सियासी दल को नुक़सान हुआ है? क्या दंगे के बाद मुस्लिम वोटर की सोच बदली है? क्या दंगे ने जाट समुदाय को समाजवादी पार्टी और अजित सिंह से दूर किया है? क्या ये दंगा अचानक था या एक सोची समझी साज़िश ? क्या दंगा कराने में आज़म ख़ान या सपा सरकार को कोई रोल है ? इस दंगे में आज़म ख़ान की चर्चाओं से उनको सियासी फायदा होगा या नुक़ासान ? कहीं ऐसा तो नहीं इस दंगे को कराने के पीछे बीजेपी जैसी सोच या ख़ुद आज़म ख़ान का तो कोई रोल नहीं? क्या इस दंगे को कराने में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले या सत्ता या फिर विपक्ष के किसी नेता का हाथ है? ये और ऐसी ही कई और सवाल ऐसे हैं कि जिनका जवाब पाने को देशवासी बेताब हैं?

कुछ लोगों का मानना है कि भले ही इस दंगे का फायदा किसी को हो या ना हो, मगर आम आदमी को इस दंगे ने कुचल दिया है। लेकिन सच्चाई ये भी है कि दंगे के बाद जिस ढंग से सियासी लोग इस पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, उससे तो लगता यही है कि सियासत में मासूमों के आंसू और भावनाएं नहीं बल्कि नफे और नुक़सान का घटा जोड़ ज्यादा अहमियत रखता है। सियासत के चश्मे से देखा जाए तो  जिस ढंग से आज़म ख़ान का नाम इस पूरे मामले में उछल रहा है, उससे ये क़तई नहीं लगता कि आज़म ख़ान को कोई सियासी नुक़सान होने वाला है। कहीं ऐसा तो नहीं आज़म ख़ान मुसलमानों के तोगड़िया या मोदी बनना चाहते हैं ? कही ऐसा तो नहीं आज़म ख़ान को प्रमोट करने वाले कुछ लोग उनको ठाकरे की तर्ज पर मुसलमानों में खड़ा करना चाहते हैं ? ये पार्टी और आज़म की ट्यूनिंग की बात है कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी और इसका क्या अंजाम होगा। अगर सियासत की बात करें! और कथित स्टिंग को असली मान भी लिया जाए, तो जिस समुदाय की आज़म राजनीति करने का दावा करते हैं उसके तो वो हीरो बन सकते हैं! लेकिन इसके बाद दूसरे समुदाय में सपा अपनी बची खुची साख को खोकर जीरो भी हो जाएगी। साथ ही अगर आज़म पर लगे आरोप सत्य हैं तो इस दंगें में मुस्लिम समाज को होने वाले नुक़ासन के लिए वो बेहद नापाक विलैन की क़तार में खड़े किये जा सकते हैं! समाज को होने वाले नुक़सान के लिए भला फिर कौन ज़िम्मेदार होगा ? अगर उन पर लगे आरोप सही है तो क्या आज़म को मुस्लिम समाज कभी माफ कर पाएगा ?

सच्चाई ये भी है कि ख़ुद कोई भी सत्ताधारी दल ये नहीं चाहेगा कि उसके शासन में ऐसा कुछ हो जिसको इतिहास भी माफ ना कर सके!  सवाल ये भी पैदा होता है कि अखिलेश के दौरे के दौरान आज़म ख़ान ज़िंदाबाद और अखिलेश मुर्दाबाद के कथित नारे क्या संदेश दे रहे थे ? क्या आज़म मुस्लिम चेहरा  बनने की होड़ में मुलायम को पछाड़ना तो नहीं चाहते ? या फिर अखिलेश को सीएम बनाने के मुलायम के फैसले को आज तक वो पचा नहीं पा रहे हैं ? लेकिन अगर मौजूदा आरोपों की बात करें और नुक़सान को दरकिनार करते हुए इसका सीधा फायदा या तो बीजेपी को होगा या निजी तौर पर आज़म खा़न को ! तो क्या आज़म ने ख़ुद को एक छत्र मुस्लिम नेता साबित करने के लिए वो सब कुछ किया जो कथित स्टिंग में बताया जा रहा है ? साथ ही जो जाट अब तक या तो बीजेपी या सीधे तौर पर अजित सिंह से जुड़ा है या फिर कहीं कही जाट उम्मीदवार की मौजूदगी में सपा से जुड़ा था, तो क्या बीजेपी ने इस वोट बैक पर एक छत्र राज करने के लिए तो ऐसा माहौल नहीं बनाया था ? हां इतना तो तय है कि अब आने वाले लोकसभा चुनावों में जाट सपा को और मुस्लिम वोटर जाट कैंडिडेट को वोट देने से पहले कई बार सोचेगा ज़रूर।
इसके अलावा अजित सिंह को ज़ीरो करने के लिए भी कहीं ये सब कुछ तो नहीं किया गया ? सियासत के कई  जानकार तो इस पर बहस को तैयार हैं कि भले ही कांग्रेस अजित सिंह की फिलहाल सहयोगी हो मगर चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी या सपा ये सभी जानते हैं कि अजित सिंह को ज़ीरो करने के लिए जाट और मुस्लिम कॉम्बिनेशन को खिसकाना बेहद ज़रूरी है। जहां तक आज़म ख़ान का सवाल है उनके बयानों और उनकी सफाई के अलावा उनके पुराने इतिहास को देखकर नहीं लगता कि वो महज़ सियासत के लिए इतना घिनौना क़दम उठा सकते हैं।  हांलाकि आज़म पर पूछे गये सवाल के जवाब में शाही इमाम का मानना है कि उनका तो सियासी चरित्र ऐसा है कि उनका तो नाम तक लेना ठीक नहीं। बहरहाल हो चाहे कुछ आने वाले लोकसभा चुनावों में जीत किसी की भी हो मगर सियासत के वेदी पर जिन बेगुनाहों की जान, माल, इज़्ज़त की बलि चढ़ा दी गई उनके दिल से कोई पूछे कि अपनो को खोने का ग़म किसे कहते हैं। भले ही इस दगें में किसी कथित हिंदु ने किसी मुस्लिम को लूटा हो या किसी कथित मुस्लिम के हाथों किसी हिंदु बेगुनाह लुट गया हो। मगर इतना तो सच है कि अगर इसका ही नाम सियासत है तो फिर ऐसी राजनीति से दूर रहने में  ही जनता की भलाई है।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं। सहारा, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़, वॉयस ऑफ इंडिया समेत कई नेशनल चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। फिलहाल एक दैनिक समाचार पत्र 'जीत का परचम' के संपादक हैं।

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