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आज के दौर में सवाल उठाने वाला शिवानंद हो जाता है

ऐसे दौर में जबकि विरोध और सवाल उठाना सम्भव नहीं है, वैसे में यह एक गुजारिश है बाजार की भावुकता और महानता से मुठभेड़ करने की।  तुलसी बाबा के शब्दों में कहें तो 'कहे बिना रहा नहीं जाता' और प्रख्यात विद्वान विद्यानिवास मिश्र ने कहने की लाचारी को साहित्य और रचाव की लाचारी कहा है। 
ऐसे दौर में जबकि विरोध और सवाल उठाना सम्भव नहीं है, वैसे में यह एक गुजारिश है बाजार की भावुकता और महानता से मुठभेड़ करने की।  तुलसी बाबा के शब्दों में कहें तो 'कहे बिना रहा नहीं जाता' और प्रख्यात विद्वान विद्यानिवास मिश्र ने कहने की लाचारी को साहित्य और रचाव की लाचारी कहा है। 
 
कोई माने या ना माने, सचिन को भारत रत्न बाजार, मीडिया और मीडिया द्वारा सृजित अनुकूल 'जनमत' के कारण सोची-समझी रणनीति के कारण अचानक दिया गया। क्रिकेट के ज्वार और बाजार ने इसे सम्भव किया है। मुनाफाखोर लालची संस्कृति ने सम्भव किया है यह। यह असल समस्याओं से ध्यान भटकाने की भी साजिश है। लोग भूख, महंगाई, बीमारी, बेरोजगारी को भूल-भाल सचिन को लेकर गदगद हो जाएं। मंदिर बनवाकर पूजा करने लगें।  मेहनत, भय-भूख और संघर्ष की धरती बिहार में मंदिर भी बन रहा है। यह मानसिक गुलामी और दिवालियेपन की हद है। 
यह हमेशा होता है। सत्ता नयी-नयी तरकीब रचती है जिससे लोग उसी में उलझे रहें। फंसे रहें। भारत रत्न नहीं पटाखा हो गया, जब चाहे फोड़ दो। नागरिक पुरस्कारों का राजनीतिकरण हो गया है। यह दलगत स्वार्थ बनता जा रहा है।  पद्म श्री, पद्म भूषण की लिस्ट उठा के देख लीजिये। 
 
ध्यान चंद, जो भारत के असल खेल रत्न हैं,  जिन्होंने हिटलर के लुभावने प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। ध्यान चंद न सचिन की तरह टैक्स बचने वाले अभिनेता थे, न ही पैसे पर खेलने वाले खिलाड़ी। जिनके खेल और गोल की करतल ध्वनि को क्रिकेट के लीजेंड डॉन ब्रेडमैन ने भी देखा था, सराहा था। चूंकि ध्यानचंद अब नहीं हैं। उनके पीछे बाजार नहीं है, विज्ञापनों का झूठ नहीं है, वे वोट की फसल नहीं हैं। सो सरकार और राजनीति को उनसे मतलब नहीं। 
 
जब ध्यान चंद भारत का मान बढ़ा रहे थे, उस दौरान ब्रेकिंग न्यूज़ वाले ना दीपक चौरसिया थे, ना रवीश कुमार और ना पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष आदि, जो लगातार खबर चलाकर, खेलकर, तानकर किसी को हीरो या जीरो बना देते। 
''हमने 'भगवान' को खेलते देखा है। भारत में क्रिकेट धर्म है और सचिन भगवान  हैं।" इस तरह की बातें एक अर्से से जान बूझकर मीडिया माध्यमों द्वारा बाजार के दबाव में, कहें तो लालच में फैलाया जा रहा है। सनसनी पैदा की जा रही है। सारे मुद्दे हवा हो गए हैं। दलित-शोषित जनता की आवाज मीडिया से गायब है। मीडिया, खासकर टीवी मीडिया बाजार का गुलाम बन कर रह गया है।
 
एक तरह से यह असल समस्याओं से ध्यान भटकाने का भी यह खेल है। रोटी नहीं क्रिकेट धर्म है। यह [प्रपंच मेडिया द्वारा स्वीकृत बनाया जा रहा है। बार-बार झूठ बोलकर बाजार की भाषा को जनभाषा बना दो। यह वैचारिक कंगाली है। 
 
सचिन एक भले, विनम्र इंसान और खिलाड़ी हैं।  मेधावी विलक्षण क्रिकेट प्रतिभा के रूप में उन्होंने लम्बा सफ़र तय किया है। रिकार्ड्स की झड़ी लगा दी। एक व्यक्ति और खिलाड़ी के रूप में वे हम सबके प्यारे-दुलारे हैं। वे बड़ों, सीनियरों से आज भी अदब से मिलते हैं। प्रभाष जोशी (जनसत्ता के संस्थापक संपादक, पत्रकार-विचारक ) सचिन के दीवाने थे। सचिन के रिकार्ड और खेल को लेकर भावुक हो जाते थे। जनसत्ता के पन्ने रंग जाते थे। आज वे होते तो झूम उठते ठीक सचिन की माँ और करोड़ों लोगो की तरह। आज सचिन दौर में मुझे प्रभाष जी याद आ रहे हैं। वह तो ख़ुशी का बवाल मचा देते। ''एक सचिन ने हमारे सपने को सच कर दिया ''  लिखते। लिखा भी है और बुद्धिजीवियों की आलोचना सही है अतिवादी प्रशस्ति को लेकर। जबकि वे खुद रत्न थे। 
 
तो भारत रत्न देने से लेकर अतिवादी शोर-गुल और ज्वार पैदा करना खेल के हित में नहीं है।  सचिन को निश्चित रूप से 'भगवान्' बनाने की जिद उन्हें भी नहीं सुहाता। उनकी राय गाहे-बगाहे अभिव्यक्त भी हुई है। खैर, अगर भारत रत्न क्रिकेट में ही देना जरूरी हो तो सुनील गावस्कर, कपिलदेव और धोनी को भी दे देना चाहिए। सुनील और कपिल को तो अवश्य ही।
 
सुनील गावस्कर जिस दौरान खेल रहे थे तो क्रिक्रेट का मार्केट इतना बड़ा नहीं था। मीडिया माध्यम ले देकर दूरदर्शन और आकाशवाणी। ब्रेकिंग पर ब्रेकिंग वाला जमाना नहीं था। एक्सक्लूसिव की चीख नहीं थी। इंडियन पैसा लीग नहीं था। फिर खेल के नियम, चुनौती उस समय के हिसाब से रन को देखिये। जिस समय वेस्टइंडीज का क्रिकेट में डंका बजता था, उस दौरान कपिल ने विश्व कप जीता। धोनी ने 28 साल बाद कारनामा दोहराया। 20-20 वर्ल्ड कप जीता। सफल कप्तान के रूप में धूम मचाई। बाजार भी कम नहीं। क्यों नहीं इन्हे भी दे देते ?
 
विश्वनाथन आनंद, पी टी उषा, मिल्खा सिंह, बाइचुंग भूटिया, लिएंडर पेस, अभिनव बिन्द्रा, पी गोपी चंद ने क्या बिगाड़ा है?  ये लड़ाकू तो अपने-अपने क्षेत्र में कही ज्यादा संघर्षी हैं। 
 
साहित्य, पत्रकारिता, कला के क्षेत्र में कोई रत्न नहीं हैं क्या? डॉ रामविलास शर्मा, डॉ नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर। ये भी २४ कैरेट वाले रत्न हैं। इनसे मीडिया और बाजार को कोई लेना देना नहीं है, सो आप इनके बारे में प्रायः नहीं जानते। 
 
यह सिर्फ विवाद के लिए विवाद नहीं है। यह अकसर होता है। भारत रत्न ही नहीं दुनिया के समस्त सम्मान, पुरस्कार के साथ वाद-विवाद का गहरा सम्बन्ध रहा रहा है। नोबेल पुरस्कार खासकर साहित्य और शांति को लेकर ज्यादा विवाद रहा है। गांधी बाबा को नोबेल नहीं मिला। जिसको लेकर नोबेल फॉउण्डेशन गाहे-बगाहे अफ़सोस व्यक्त करता रहा है।
 
भारत में साहित्य अकादमी, फ़िल्म फेयर, दादा साहब फाल्के और नागरिक सम्मानों की जो दशा-दिशा है। वह इस कारण है कि भारत में संस्कृति नहीं, संस्कृतियां हैं। जाति, समुदाय, धर्म, वाद, क्षेत्र, भाषा की विविधताएं हैं। जाहिर सी बात है, महानों की लाइन लगी है।  वोट के फसल ने महानों को भी बांट दिया है। वैचारिक दृष्टि से एक 'पंथ' के लिए जो बुर्जुआ है, दूसरे के लिए वह 'सर्वहारा' है। कोई राष्ट्रवादी है तो कोई राष्ट्र निरपेक्ष है। एक के लिए अंधविश्वास है तो दूसरे के लिए आस्था। 
 
ऐसे भी भारत महान में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और स्त्रियों के प्रति जिस तरह का झोल-झाल है, अन्याय है, पॉलिटिकली करेक्ट होने की चाल है, उसमे कर्पूरी ठाकुर, कांशी राम, जगजीवन राम कहां के रत्न हैं? बाबा साहेब को अर्से बाद 'रत्न' माना गया।
 
आज मीडिया और बाजार के दबाव में कोई पार्टी, पत्रकार, नेता सचिन को लेकर सवाल नहीं उठा सकता। सवाल उठाने वाला शिवानंद तिवारी की तरह अलग-थलग पड़  जाता है। नूतन ठाकुर और अमिताभ हो जाता है !
 
यह ध्यान रखिये भले ही गावस्कर, कपिल, धनराज सहित सभी लोग सचिन को लेकर 'गौरवान्वित' हो रहे हों। कोई उपाय नहीं है उनके पास गौरवान्वित होने के अलावा। लेकिन इस अतिवादी माहौल से एक टीस भी होगी, कसक भी होगी। अपने क्षेत्र में धनराज पिल्लै ने भी हाकी का स्तर ऊंचा उठाया। जिस दौर में सुनील गावस्कर और कपिल ने क्रिकेट खेला वह भी चरम क्षण था। 10,000 रन और 432 विकेट कठिन था, चरम था। 
 
कपिल ने वेस्ट इंडीज के पताका दौर में विश्व कप साकार किया। अगर रिकार्ड्स, लोकप्रियता पैसा ही भारत रत्न का पैमाना हो तो अनेक दावेदार हैं। 
आखिर, पी गोपीचंद, अभिनव बिंद्रा ने क्या बिगाड़ा है किसी का? तो मेरी गुजारिश है कि रत्नों के असंख्यक दौर में 10-20 फील्ड से रत्न चुनिए, थोक के भाव से दीजिये या इसे खत्म कर दीजिये। नहीं तो मनमानी बंद कीजिये। मानक और पारदर्शिता अपनाएं। 
 
                              लेखक प्रमोद कुमार पाण्डेय मीडिया शिक्षक एवं पत्रकार हैं इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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