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आदिवासियों की बलि लेने वाले ‘सलमा जुडूम’ जैसे विवादित अभियान को कांग्रेस और भाजपा दोनों का समर्थन रहा है

: नक्सली हमले के बाद शुरू हो गई वोट बैंक की जंग : बस्तर (छत्तीसगढ़) में हुए बड़े नक्सली हमले के बाद कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों को अब वोट बैंक की नई रणनीति तैयार करने की खासी चिंता हो गई है। क्योंकि, कांग्रेस नेतृत्व इस हमले को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए तैयार है। योजना बनाई गई है कि पूरे राज्य में कांग्रेस अपनी इस ‘कुर्बानी’ की याद दिलाकर अपने लिए सहानुभूति की लहर चलवा ले।

: नक्सली हमले के बाद शुरू हो गई वोट बैंक की जंग : बस्तर (छत्तीसगढ़) में हुए बड़े नक्सली हमले के बाद कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों को अब वोट बैंक की नई रणनीति तैयार करने की खासी चिंता हो गई है। क्योंकि, कांग्रेस नेतृत्व इस हमले को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए तैयार है। योजना बनाई गई है कि पूरे राज्य में कांग्रेस अपनी इस ‘कुर्बानी’ की याद दिलाकर अपने लिए सहानुभूति की लहर चलवा ले।

आम लोगों में यह संदेश दिया जाए कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार की नाकामी की वजह से ही हिंसक नक्सली ज्यादा फल-फूल रहे हैं। इसकी कीमत आम जनता के साथ कांग्रेस के लोगों को चुकानी पड़ रही है। क्योंकि, राज्य सरकार सामान्य सुरक्षा व्यवस्था कायम करने में भी लगातार असफल हो रही है। कुछ महीने बाद ही यहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। दोनों प्रमुख दल चुनावी अभियान में जुट चुके हैं।

अब बस्तर की दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले को कांग्रेस एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने के लिए तैयार है। इस हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल सहित 16 कांग्रेसी ‘शहीद’ हुए हैं। जबकि, भाजपा नेतृत्व नक्सलियों की बढ़ती हिंसा की टोपी केंद्र सरकार के सिर रखने की कोशिश में लग गया है।

उल्लेखनीय है कि शनिवार की शाम बस्तर की दरभा घाटी में नक्सलियों के एक बड़े दल ने कांग्रेस के काफिले पर हमला कर दिया था। करीब 500 हथियार बंद नक्सलियों ने दो दर्जन वाहनों में सवार करीब सवा सौ कांग्रेसियों को घेर लिया था। इन लोगों ने करीब 75 मिनट तक अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। इनके निशाने पर खास तौर पर विवादित ‘सलमा जुडूम’ के जनक समझे जाने वाले महेंद्र कर्मा थे।

कर्मा, छत्तीसगढ़ सरकार में गृह मंत्री रह चुके हैं। ‘सलमा जुडूम’ के अभियान को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई सालों से उबाल रहा है। क्योंकि, इस अभियान के जरिए सरकार ने आदिवासी युवाओं को ही नक्सलियों के सामने मोर्चा लेने के लिए तैयार किया था। इसके लिए आदिवासी युवाओं को सरकार ने हथियार और पैसे भी मुहैया कराए थे। इस अभियान के चलते पिछले सालों में तमाम निर्दोष आदिवासी भी नक्सली हिंसा का शिकार बन चुके हैं।

इसके चलते माओवादी नेता ‘सलमा जुडूम’ अभियान के सख्त खिलाफ रहे हैं। क्योंकि, इसकी वजह से नक्सलियों का सामाजिक आधार खतरे में पड़ने लगा था। यह भी बहस उठी थी कि ‘सलमा जुडूम’ के नाम पर सरकार भोले-भाले आदिवासियों को बलि का बकरा क्यों बना रही है? लेकिन, इस विवादित अभियान को कांग्रेस और भाजपा दोनों का समर्थन रहा है। चूंकि, महेंद्र कर्मा इस अभियान को शुरू कराने वाले प्रमुख शख्स थे, ऐसे में वे खास निशाने पर लंबे समय से थे। पिछले वर्षों में उन पर कई बार प्राणघातक हमले हुए थे, लेकिन वे बच निकलते रहे। इस खतरे को देखते हुए सरकार ने उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था दे रखी थी।

नक्सली प्रवक्ता आरोप लगाते रहे हैं कि कर्मा के दौर में बड़े पैमाने पर नक्सलियों के नाम पर फर्जी एनकाउंटर किए गए थे। कई बार फर्जी मुठभेड़ों के लिए दोषारोपण नक्सलियों पर किया जाता था। दरभा घाटी में उस दिन हमलावर चिल्ला-चिल्लाकर कर्मा को ढूंढ़ रहे थे। जब वे मिल गए, तो उन्होंने कर्मा के शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया। इस हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल भी मारे गए। पहले इन्हें हमलावरों ने अगवा किया था, तो फिर कुछ दूर ले जाकर गोलियों से उड़ा दिया। इस हमले में करीब 30 लोग मारे गए हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ला सहित करीब 32 लोग घायल हुए हैं। इनमें से कई गंभीर हालत में हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी विद्या चरण की हालत नाजुक बनी हुई है। इस हमले के बाद पूरे छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की दहशत और बढ़ गई है। इसका असर सरकारी कामकाज में भी देखा जा रहा है। खासतौर पर कई   सड़क परियोजनाएं और बांध आदि के काम एकदम ठप हो गए हैं। हालात ऐसे बने हैं कि पुलिस थाने भी अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा चिंतित रहते हैं। राज्य के बड़े हिस्से में नक्सलियों के दबदबे के कारण आम लोग इनके रहमो-करम पर ही जीने को मजबूर हैं।

चूंकि, राज्य में कुछ महीने बाद ही चुनाव होने है। ऐसे में, अब यह हमला भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनने जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी ने रविवार से ही कहना शुरू कर दिया है कि रमन सिंह सरकार की नाकामियों के चलते ही कांग्रेस के काफिले पर इतना बड़ा हमला संभव हो पाया। उन्होंने तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने तक की मांग कर डाली। हालांकि, कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि वे लोग जोगी की इस मांग से सहमत नहीं हैं।

इस हमले से राज्य स्तर के कांग्रेसी नेतृत्व को काफी बड़ा धक्का लगा है। क्योंकि, प्रदेश अध्यक्ष पटेल और महेंद्र कर्मा पार्टी के खास प्रभावशाली नेता थे। ये लोग महीनों से चुनावी प्रचार अभियान के लिए जुटे भी थे। ये दोनों नेता अजित जोगी की तरह विवादित भी नहीं रहे। कहीं इन दोनों नेताओं की कमी का फायदा भाजपा न उठा ले? इसको लेकर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को हिदायतें देनी शुरू कर दी हैं। उन्होंने राज्य के नेताओं को भरोसा दिया है कि वे खुद यहां लगातार दौरे करके पार्टी के हाथ मजबूत करेंगे। जरूरत इस बात की है कि कोने-कोने में यह राजनीतिक संदेश जाए कि कांग्रेस के नेता, आम जनता के लिए नक्सलियों की गोली खाने के लिए भी तैयार रहते हैं। जबकि, भाजपा के नेता जुबानी लफ्फाजी ही करते रहते हैं। ऐसे में, जनता चुनाव के जरिए भाजपा की सत्ता को उखाड़ फेंके।

इस बड़े हादसे के बाद दोनों दलों के बड़े नेता कुछ-कुछ लोकलाज का ख्याल करते लग रहे हैं। ऐसे में, वे खुले तौर पर एक-दूसरे को कोस नहीं रहे। जबकि, दोनों दलों के राज्य स्तरीय नेताओं ने राजनीतिक ‘बमबारी’ शुरू कर दी है। रमन सिंह सरकार के कई मंत्रियों ने कहना शुरू किया है कि यदि केंद्र सरकार राज्य को विशेष आर्थिक पैकेज देती, तो आदिवासी क्षेत्रों में विकास की कई बड़ी परियोजनाएं पूरी हो जातीं। यह भी कह जा रहा है कि सरकार की सिफारिश के अनुरूप केंद्र ने नक्सलियों से निपटने के लिए अर्ध-सैनिक सुरक्षा बल मुहैया नहीं कराया। जबकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आरोपों में कोई दम नहीं है। क्योंकि, छत्तीसगढ़ में इस समय करीब तीस हजार अर्धसैनिक बल तैनात हैं।

छत्तीसगढ़ में पिछले सालों में और भी कई बड़े हमले हुए हैं। हर बड़े हमले के बाद यह बहस शुरू होती है कि बस्तर जैसे इलाकों में नक्सलियों से निपटने के लिए क्या सैन्य विकल्प अपनाया जाए? लेकिन, यह बहस जल्द ही ठंडे बस्ते में चली जाती है। इस बार भी कई क्षेत्रों से दबाव बनाया जा रहा है कि नक्सली मोर्चे पर सीमित मात्रा में सैन्य बल प्रयोग में लाया जाए। खास तौर पर रात में उड़ान भरने वाले वायुसेना के हेलीकॉप्टरों को तैनात किया जाए। लेकिन, सैन्य विकल्प को लेकर गंभीर राजनीतिक मतभेद हैं। सवाल यह है कि क्या सेना का प्रयोग अंदरूनी मामलों में उचित हो सकता है? मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले में सरकार की खबर लेनी शुरू कर दी है। इस विवाद के गर्म होते ही रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने साफ कर दिया है कि सरकार के पास फिलहाल नक्सली समस्या से निपटने के लिए सैन्य विकल्प का कोई प्रस्ताव नहीं है।

छत्तीसगढ़ से जुड़े मध्य प्रदेश में भी विधानसभा के चुनाव इसी साल होने हैं। दोनों राज्यों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रहता है। इन दोनों राज्यों में भाजपा का शासन है। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह भाजपा को मात देने के लिए कोई कारगर राजनीतिक फॉमूले ढूंढ़ ले। अजित जोगी का दावा है कि इस बार छत्तीसगढ़ के साथ मध्य प्रदेश में भी भाजपा को करारी शिकस्त मिलेगी। अनौपचारिक बातचीत के दौरान जोगी कहते हैं कि बस्तर के ताजा नक्सली हमले के बाद साबित हो गया है कि भाजपा नेतृत्व नक्सली हिंसा को रोक पाने में सक्षम नहीं है। दोनों सरकारों ने गरीब आदिवासियों के विकास के मद का पैसा, जो दिल्ली ने भेजा था वह दूसरी योजनाओं में उड़ाया है। इसके चलते ही दोनों राज्यों में पिछले नौ सालों में नक्सली प्रभाव बढ़ा है। ये लोग अपनी असफलता छिपाने के लिए केंद्र सरकार को कोसने लगते हैं, लेकिन अब इनकी ये चालाकी ज्यादा काम आने वाली नहीं है।

दरभा घाटी के नक्सली हमले मामले में एक विवाद यह शुरू हुआ है कि क्या किसी स्थानीय कांग्रेसी के कहने पर उस दिन कांग्रेस काफिले का रूट बदला गया था? चर्चा यही है कि पहले इस काफिले को गादीरास से होते हुए दंतेवाड़ा पहुंचना था। लेकिन, ऐन वक्त पर इसे वाया दरभा घाटी से ले जाया गया। दरभा घाटी के जंगलों में ही हमला हुआ था। कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि इन बातों में दम नहीं है। भाजपा के लोग जानबूझकर इस तरह का प्रचार करा रहे हैं ताकि, शक की सुई घूमे कि हमले के पीछे कांग्रेस के ही कुछ लोग हैं।

केंद्र सरकार ने इस नक्सली हमले की जांच का काम राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया है। एनआईए ने घटना स्थल पर पहुंच कर पड़ताल भी शुरू कर दी है। कहीं छत्तीसगढ़ में इस हमले के बाद कांग्रेस को सहानुभूति का   बड़ा लाभ न मिल जाए? इसको लेकर भाजपा नेतृत्व जल्द ही नक्सल विरोधी अभियानों में केंद्र की असफलता का ब्यौरा मीडिया को देने की तैयारी कर रहा है। भाजपा के एक प्रवक्ता का सवाल है कि गृहमंत्री रहे पी. चिदंबरम के दौर में 'आपरेशन ग्रीनहंट' को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। अब केंद्र यह जवाब दे कि आखिर किसके राजनीतिक दबाव में पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में 'आपेरशन ग्रीन हंट' को लचर बनाया गया?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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