'जस्टिस विथ उर्दू'. ये किताब का नाम है. लिखा है जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने. कंपाइल किया है आसिफ आजमी ने. इसी किताब के लोकार्पण का मौका था. खिचड़ी के दिन लोकार्पण का प्रोग्राम पहले से तय था. वक्ता, चीफ गेस्ट आदि सब तय थे. उसी अनुरूप इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के मल्टीपरपज हाल में शाम के साढ़े पांच बजे तक लोग मंचासीन-दर्शासीन हो चुके थे. नाम लगी पट्टियों वाले लोग मंच पर. मंचासीन. उन्हें देखने सुनने आए लोग कुर्सियों पर. दर्शासीन. मंच पर बैठे लोग बोले, खूब बोले, सहज होकर बोले. और दर्शासीन लोगों ने खूब वाह वाह किया, तालियां पीटी.
उर्दू जबान, उर्दू पर किताब, उर्दू और काटजू. यही विषय केंद्र में था. संचालन कर रहे थे डा. हरीश भल्ला. देखने में मोटा आदमी. पर जुबान से बेहद शरीफ-समझदार. कई बार चापलूसी-सा करते दिखे. जिस भी वक्ता को बुलाते उसकी तारीफ के पुल बांध देते. कई बार तो भगवान खुदा से तुलना कर देते. मेरे दाएं-बाएं बैठे एकाध दर्शासीन बंधु बोल उठे- ज्यादा हो गया भल्ला जी, इतना भी मक्खन ठीक नहीं. पर भल्ला जी तो ठहरे भल्ला जी. उनका काम ही संचालन का था इसलिए चालन सुंदर सफल रहे, सो उन्होंने पूरी एनर्जी ठोंक दी. उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी से लेकर काटजू तक का कुछ यूं वर्णन डा. भल्ला ने किया कि लोग वाह वाह के साथ आह आह भी करने लगे थे.
वरिष्ठ व बुजुर्ग पत्रकार कुलदीप नैयर साहब बैठे-बैठे ही बोले. अर्थराइटिस की समस्या उन्होंने बताई. वैसे भी कुलदीप नैयर जी की उम्र हो चली है. वो जब भी कहीं बोलते हैं तो इसका जरूर जिक्र करते हैं कि हम लोग तो जाने वाले हैं, आपमें से जो युवा लोग हैं वे आगे देखें करें. वो लाठी टेकते हुए चलते हैं. पत्रकारिता की अगर बात की जाए तो कुलदीप नैयर साहब एक ऐसे पत्रकार हम लोगों के बीच में हैं जिन्होंने आजादी से लेकर आज तक के मंजर को देखा, समझा, गुना, लिखा, बोला है. उन्होंने जिक्र भी किया. महात्मा गांधी की हत्या को उन्होंने रिपोर्ट किया था, तब वे जिस अखबार में काम करते थे उसके लिए. शुरुआती करियर के बारे में भी बताया. पाकिस्तान के सियालकोट और लाहौर के संदर्भ का जिक्र किया, जहां उनका बचपन और करियर के शुरुआती दिन बीते. अंजाम नामक उर्दू अखबार से करियर के आगाज करने की बात बताने पर दर्शासीनों ने तालियां पीटी.

उन्होंने ये भी बताया कि उनकी नौकरी कहीं और शुरू हो रही थी, लॉ पढ़े थे, उसी फील्ड में नौकरी शुरू होने वाली थी लेकिन वो क्लर्की करने के इच्छुक नहीं थे इसलिए पत्रकारिता की तरफ मुड़ गए. किन्हीं गुरु टाइप सज्जन ने उन्हें सलाह दी कि उर्दू पत्रकारिता छोड़ दो क्योंकि उर्दू का भविष्य नहीं है, इसलिए अंग्रेजी की तरफ मुड़ो और उर्दू शायरी वगैरह छोड़ दो क्योंकि इसमें तुकबंदी के सिवाय कुछ नहीं. कुलदीप नैयर ने साफतौर पर कहा कि उन्होंने दोनों सलाह मानी. तबसे उन्होंने कोई शेर नहीं लिखा और पत्रकारिता अंग्रेजी की करने लगे. कुलदीप नैयर के इस इकरारनामे से हाल में थोड़ा सन्नाटा पसर गया था, क्योंकि सब उर्दू की तरक्की के मुद्दे को लेकर इकट्ठा हुए थे. कुलदीप नैयर साहब ने रीयलिस्टिक अंदाज में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि वही जबान तरक्की करती है जिसे रोजी रोटी का जरिया बना दिया जाए. यानि उर्दू को जब तक रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इसका उत्थान नहीं है. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उर्दू को बचाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उर्दू जबान हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता और गंगा-जमुनी तहजीब की भी प्रतीक पहचान है. कुलदीप नैयर साहब ने कहा कि वे अपने बच्चों को उर्दू पढ़ाना चाहते थे लेकिन दिल्ली में कोई स्कूल नहीं जो उर्दू पढ़ाए. मौलवी वगैरह रखकर बच्चों को पढ़ाया लेकिन जुबान वही चलती है जो रोज रोज बोली जाती है. इसलिए वे सब भूल गए होंगे.
केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद बोलना नहीं चाहते थे, अपना वक्त वो उप राष्ट्रपति जनाब हामिद अंसारी को सुपुर्द कर रहे थे, पर दो शब्द बोलने के अनुरोध टाइप दबाव में उन्होंने मंच पर आकर कहना शुरू किया तो कुछ हल्की बात भी कह दी. कह गए कि उर्दू को क्रिकेट से जोड़ दिया जाए तो उर्दू का भला हो जाएगा. पता नहीं वे मजा ले रहे थे या सीरियस थे. लेकिन लोग हंस रहे थे. उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी जब बोलने को आए तो उन्होंने शुरुआत सलमान खुर्शीद के कहे गए हल्के वाक्य को खारिज करने से की.
हामिद अंसारी ने मंच पर आते ही कहा कि जिगर थाम लीजिए हम आ गए हैं. उनकी इ स्टाइल लोगों को पसंद आई, हा हा करते हुए तालियां बजाने लगे, इ सहजता सबको भा गई. लगा ही नहीं कि यही शख्स उप राष्ट्रपति है. उप राष्ट्रपति जैसे पद पर होकर भी बेहद सहज रहना, सरल सहज बोल जाना, कह जाना, हंसते मुस्कराते बोलते बतियाते हिलते डुलते रहना… यह सब हामिद अंसारी में नजर आया, यह उनका बड़प्पन है. उनकी सादगी सबको पसंद आई. उन्होंने अपनी तकरीर में उर्दू को लेकर काफी आंकड़े दिए और बताया कि उर्दू की हालत ठीक नहीं है. उन्होंने उर्दू को लेकर काफी अच्छी बातें की, अच्छी जानकारियां दी. सबको सोचने को मजबूर किया. कई उदाहरण किस्से बताए.
हर बोलने वाले वक्ता ने शेर पढ़ा और एक से बढ़कर एक शेर कहे. कुलदीप नैयर ने अपनी बात एक जोरदार शेर के साथ खत्म की तो हामिद अंसारी, जस्टिस काटजू आदि ने भी अपने लेक्चर में शेर पढ़े. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के ढेर सारे जज श्रोताओं की सबसे अगली पंक्ति में विराजमान थे. उप राष्ट्रपति जब प्रोग्राम में आए तो जस्टिस काटजू ने हामिद अंसारी की अगली पंक्ति वालों से परिचय कराया.. जस्टिस लोगों के नाम जस्टिस काटजू बोलते रहे, हामिद अंसारी उनसे हाथ मिलाते रहे, नमस्ते करते रहे, हेलो करते रहे…. और करते कराते दौड़ते हुए मंच पर चढ़ गए थे.
हां, यह बताना तो भूल ही गया कि कुलदीप नैयर ने अपने संबोधन में इकबाल और फैज अहमद फैज का जिक्र किया. इकबाल के बारे में उन्होंने बताया कि बचपन में जब उनका मित्र उन्हें इकबाल से मिलवाने ले गया तो उन्होंने देखा कि एक मोटा शख्स जो इकबाल थे, पंजाबी में किसी को गंदी गंदी गालियां दे रहे थे. कुलदीप नैयर के कहने का आशय ये था कि इकबाल को लेकर उनका पहला आमना सामना ऐसा था कि उन्होंने दुबारा उनसे मुलाकात नहीं की, जबकि फैज अहमद फैज से बेहद नजदीकी रही और कई दिन, शाम, रात साथ गुजारी, लाहौर से लेकर दिल्ली तक में.
शनिवार और खिचड़ी का दिन, भयंकर सर्दी के बाद एक ऐसी दोपहर जिसमें खूब धूप व गर्मी थी. ऐसे अलसाते उकसाते मौसम में मेल चेक करने के दौरान जस्टिस काटजू की किताब के लोकार्पण का न्योता मेल पर दिख गया था, तो तय कर लिया था कि चलना है इस आयोजन में. दिल्ली में रोज रोज कई कई आयोजन होते रहते हैं लेकिन कहीं जाता नहीं, या यूं कहिए, कहीं जाने का दिल नहीं करता. अपनी खोल, अपनी झोपड़ी में अपनी फकीरी को इंज्वाय करने और भड़ास पर भिड़े रहने के आनंद से बड़ा आनंद कहीं मिलता नहीं. दूसरे, आयोजनों में नकलचीपन, ओढी हुई शराफत, हिप्पोक्रेसी, धूर्तई आदि देखकर मन खिन्न होता रहता है. पर जस्टिस काटजू की किताब के लोकार्पण समारोह में खुद को जाने से न रोक सका, शायद जस्टिस काटजू को देखने सुनने का अंदर से मन कर रहा था.
कार न्यू अशोक नगर मेट्रो स्टेशन पर पार्क की और बहुत दिनों बाद बलखाती मेट्रो से चला.
एक दोस्त ने बताया था कि राजीव चौक उतरना और वहीं अगल बगल है मैक्समूलर मार्ग, जहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर है, वहां पहुंचने के लिए कोई आटो ले लेना. आटो वाले से पूछा तो उसने लोधी रोड का जिक्र किया और किराया अस्सी रुपया बताया. क्या करता. आटो पर बैठ गया और बाराखंभा मंडी हाउस इंडिया गेट आदि होते हुए आटो वाला इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ले गया. दिल्ली में रहते हुए लगभग चार पांच बरस होने को है पर अजनबीपन और भटकन कम न हुआ.
संभवतः पहली या दूसरी बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर गया था. वक्त से काफी पहले पहुंचने के कारण इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के अंदर का दो राउंड चक्कर लगाकर बाहर सड़क पर निकल गया और दाएं बाएं टहलते टहलते लोधी गार्डेन में घुस गया. पूरा गार्डेन घूम डाला. तस्वीरें ली. जगह जगह भांति भांति की मुद्रा में विराजे प्रेमियों को देख देख कर मन मुदित प्रफुल्लित होता रहा. पिकनिक मनाने आए ढेर सारे परिवारों परिजनों के चेहरों में पिकनिक का उल्लास उत्साह तलाशता जोहता रहा. गार्डेन में यहां वहां लोधी पीरियड के स्थापित मस्जिद गुंबद आदि को देखता इनका मुद्रित इतिहास पढ़ता बढ़ता रहा.
सुना है कि इस गार्डेन में दिल्ली में रहकर देश चलाने वाले कई नए पुराने बड़े लोग सुबह या शाम या यदाकदा या रोजरोज टहला करते हैं.
प्रोग्राम शुरू होने का वक्त देखकर लोधी गार्डेन के बाहर जूस कार्नर से बड़का गिलास गाजर का भरपेट जूस पीकर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की ओर चल पड़ा. सिक्योरिटी वालों की छानबीन से फारिग होते हुए अंदर घुसा. सामने जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने भाई कर्नल वाल्मीकि काटजू के साथ खड़े दिखे. उनके भाई का नाम इसलिए याद है कि वे भी मंचासीन थे और मंच पर बैठे उन्हें व उनके नाम की लगी पट्टिका को सबने देखा पढ़ा, संचालक द्वारा उनके हाथों अन्य मंचासीनों को मोमेंटो दिलाया गया.
तो बता रहा था कि जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने भाई कर्नल वाल्मीकि काटजू के साथ खड़े दिखे. दूर खड़े होकर जस्टिस काटजू को निहारता रहा. छह फुट से ज्यादा हाइट होगी. लंबा चौड़ा शरीर. उनके चेहरे की जो तस्वीर अखबारों आदि में छपती है उसे देखकर लगता है कि बंदा नाटा-सा होगा. पर सामने देखकर भ्रम दूर हुआ. देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर वाला जनरलाइज मुहावरा लिखने की कल्पना धूल धूसरित हो गई.
मैं थोड़ा दाएं बाएं हुआ. इसी दौरान जस्टिस मार्कंडेय काटजू गेट के बाहर निकले. किसी की अगवानी करने. थोड़ी देर बाद वे बाहर अकेले खड़े थे. मैं उनकी ओर बढ़ा. वे अचानक मुड़ चुके थे. खुद को एक शीशे में निहार रहे थे, बालों को ठीक करने की कोशिश करते हुए. उनके लिए यह पल बहुत छोटा रहा, मैं अचानक उनके सामने हाथ बढ़ाए नमूदार हुआ. बोला- मैं यशवंत, भड़ास4मीडिया से. उन्होंने परिचित होने का भाव दिया.. हां हां, हम लोग मेल से संपर्क में बने रहते हैं.. इसी टाइप का कुछ कहा उन्होंने. थोड़ी मोड़ी और बातचीत हुई. तभी कोई सज्जन आए और कुछ डेलीगेशन वगैरह की बात कह रहे थे कि जस्टिस काटजू उखड़ गए उन पर. वे सज्जन उनका रुख मूड देख नौ दो ग्यारह हो लिए. इस दौरान मैं खाली खड़ा था, सो फोटो क्लिक किया, मोबाइल कैमरे में कैद हुए काटजू के चेहरे पर उखड़ा हुआ भाव तारी था.
प्रोग्राम शुरू होते होते एक दो तीन चेहरे परिचित दिख गए. यूएनआई के बिमल कुमार, विनोद विप्लव दिखे. सुप्रिया भाभी दिखीं. इन लोगों से मुलाकात हुई. चाय-पकौड़ी का ऐलान हुआ. उसके बाद प्रोग्राम शुरू हुआ. जस्टिस काटजू ने संचालक से कह रखा था कि वे खुद नहीं बोलेंगे लेकिन संचालक डा. भल्ला ने उन्हें बुला लिया.
जस्टिस काटजू ने पूरी साफगोई से खरी खरी बात रखी. कम बोले लेकिन बिंदास बोले. उन्होंने बताया कि उन्होंने दर्जनों देशों के कवियों की रचनाओं को पढ़ा है. कई जुबान को जाना समझा पढ़ा गुना है. पर उर्दू से श्रेष्ठ कोई नहीं. इसमें जो कविताई हुई है, जो शेरो-शायरी है, जो बात कह दी गई है, जो भाव उड़ेल दिए गए हैं, वह अल्टीमेट है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं. कुछ बेवकूफ टाइप के लोग उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर दुष्प्रचार करते हैं और इस सर्वश्रेष्ठ जुबान की तौहीन करते हैं. उन्होंने बताया कि आजादी के पहले पर धर्म के लोगों के घरों में उर्दू बोली पढ़ी जाती थी. पर आजादी के बाद जो दुष्प्रचार किए गए वो इतने भयंकर थे कि उर्दू का अहित होता चला गया.
उर्दू को लेकर काटजू साहब का प्यार देखते ही बन रहा था. इस प्यार के किस्से भी बयान किए गए. एक साहब (नाम भूल रहा हूं, संभवतः असलम नाम था) मंच से बता गए कि किस तरह अपने फैसलों में जस्टिस काटजू ने उर्दू का खूबसूरती से उपयोग किया है और ग़ालिब, फैज आदि के शेर पिरोते हुए फैसलों को सर्वकालिक बना दिया. उन्होंने कई फैसलों को याद किया. पाकिस्तान सरकार से अपील संबंधी जस्टिस काटजू के ऐतिहासिक पहल का जिक्र किया जिसके कारण कैदी रिहा हो सका.
कार्यक्रम जब शुरू हुआ तो जनगणमन शुरू हुआ. मैंने गाया नहीं. सभी खड़े हुए तो मैं भी खड़ा हो गया. इस दौरान मंच पर खड़े होकर जनगणमन गा रहे विशिष्ट गण की मैंने तस्वीरें ली. उससे पहले हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति महोदय आए तो सभी लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए थे. पर मैं बैठा ही रहा. अंदर से ऐसा कुछ नहीं उमड़ रहा था कि खड़ा हो जाऊं. कर्मकांडों से उब जमाने से है. मेरे पड़ोस वाली कुर्सी पर बैठे अपरिचित भाई साहब भी बैठे ही रहे. वे बड़ी देर से सुडोकू टाइप कोई चीज खेल रहे थे. उन्होंने खेल जारी रखा, और मैंने उन्हें देखना. प्रत्येक कुर्सी पर पब्लिशर की तरफ से लॉ की एक मैग्जीन, पब्लिशर बुक लिस्ट, आयोजक ट्रस्ट के बारे में जानकारी से संबंधित ब्राशर करीने से रखे गए थे. इनका वाचन करने के बाद इन्हें सामने वाले सज्जन की कुर्सी के नीचे फेंक दिया. मुझे यह करता देख मेरे पड़ोसी सुडोकू खेलते बुजुर्ग सज्जन ने भी यही किया.
डा. भल्ला ने जब जस्टिस काटजू को बोलने के लिए बुलाने के दौरान उनकी शान में शेर पढ़ते हुए खुदा टाइप की चीज बोल दिया तो मैंने भी कहा– ये तो ज्यादा हो गया, तो पड़ोसी सज्जन भी बोल गए.. बहुत ज्यादा हो गया भाई. अपनी देहाती थेथरई, चूतियापा, मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास लिए दिए मैं प्रोग्राम खत्म होने के ठीक बाद शुरू हुए जनगणमन के बीच में भाग लिया. सड़क पर आकर एक आटो वाले को रोका. मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन का किराया पूछा. उसने पचास कहा और मैं धपाक से बैठ गया.
उकसाने गरमाने वाली धूप बिला गई थी. सांझ की सरदी ने आटो ड्राइवर को कनतोपटोप पहना दिया था. कनटोप को कनतोपटोप बोलकर देखिएगा, आनंद आएगा. आखिर कनटोप का काम कनतोप यानि कान तोपना ही तो है. आटो वाले का कनतोपटोप देखकर मुझे अपने कनतोपटोप की याद आई. याद आया कि न्यू अशोक नगर मेट्रो स्टेशन पर जो कार पार्क कर रखी है मैंने, उसके टिकट में लिखा है कि छह घंटे तक के दस रुपये और छह घंटे से दस घंटे के पंद्रह रुपये. टिकट पर एक बजे का वक्त दर्ज था. यानि अगर सात बचे तक नहीं पहुंच गया तो पांच रुपये ज्यादा देने पड़ेंगे. हुआ भी यही. अस्सी, पचास, पंद्रह. प्लस, मूयर विहार से न्यू अशोक नगर तक कार का पेट्रोल. इतना हिसाबी तो कभी नहीं रहा, पर आजकल एक एक रुपया क्यों जोड़ गिन रहा.
आधा दिन गंवा कर जब घर लौटा तो बस इतना याद रहा कि आज जस्टिस काटजू से मिला, सुना, देखा, बतियाया. उस जस्टिस काटजू से जो मुर्दों की इस दिल्ली नगरी में कुछ एक ओरीजनल मर्दों में से है, और यह मर्द जो सोचता है वही बोलता है, वही लिखता है, बेहिचक बेधड़क भड़ाक तड़ाक टाइप से. और, उसे अपने अवाम, अपने मुल्क, इस दुनिया से बहुत प्यार है. उसका विजन वैश्विक है तभी तो वह उर्दू से इतना प्यार करता है, तभी तो ग़ालिब को भारत रत्न देने की मांग करता है. तभी तो मीडिया को लेकर सच सच बात कह देता है. तभी तो 'जस्टिस विथ उर्दू' जैसी किताब लिख देता है. तभी तो वह ऐसे ऐसे फैसले दे देता है, ऐसी ऐसी बातें फैसलों में कह देता है जो मील के पत्थर बन जाते हैं, ऐतिहासिक वक्तव्य बन जाते हैं. अच्छा रहा, आधा दिन गंवाया नहीं, आधा दिन मैंने आनंद लिया, सीखा सुना गुना देखा जिया. मेरी तरह वहां पहुंचे बहुतों के लिए आधा दिन अच्छा रहा होगा.
'जस्टिस विथ उर्दू' की गवाही देती कुछ तस्वीरें…

कार्यक्रम के पहले गेट पर अगवानी को खड़े जस्टिस मार्कंडेय काटजू.

कार्यक्रम की शुरुआत जनगणमन के जरिए हुई.

उप राष्ट्रपति ने किताब का विमोचन किया.

लंबे चौड़े लोधी गार्डेन में पिकनिक.

लोधी गार्डेन में स्थित लोधी पीरियड के गुंबद मस्जिद के स्थापत्य के बारे में विवरण.

लोधी गार्डेन में स्थित लोधी पीरियड के गुंबद मस्जिद के स्थापत्य के बारे में विवरण.

विदेशी सैलानी तस्वीरें खिंचाते नजर आए.

उस जमाने के दरो दीवार दरवाजे….

उस जमाने के दरो दीवार से आज के जमाने का दीदार…

तनिक हमरो फोटू खींच ल्यो भइया…
कहा सुनी गलती की माफी मांगते हुए प्रणाम.
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया





