Sanjay Sinha : आधुनिक समाज लोगों को खुल कर भावनाएं व्यक्त करने से रोक रहा है। इससे रिश्ते टूट रहे हैं और समाज में हिंसा बढ़ रही है। ब्रिटेन के जानेमाने समाजशास्त्री थॉमस शेफ ने अपने कई वर्षों के अनुभव के बाद ये दावा किया है। उनके मुताबिक आज समाज में ऐसे लोगों को पसंद किया जाता है, जो अपनी भावानाएं व्यक्त नहीं करते।
थॉमस शेफ शेफ के मुताबिक भावनाओं को छिपाना एक बीमारी है। ये महज इत्तेफाक ही है कि जिस समय मैं ये रिपोर्ट पढ़ रहा था, उसी समय मेरी बहन ने मुझे फोन कर समझाने की कोशिश की कि मैं अपनी भावनाओं का इसतरह फेसबुक पर इजहार न करूं। उसका कहना है कि अपनी निजी ज़िंदगी को इस तरह साझा करना उचित नहीं। अपने दुख, अपने शोक को यूं खुले में बयां करना जायज नहीं है।
मैं भारी दुविधा में चला गया हूं। किसकी बात मानू? थॉमस शेफ कह रहे हैं कि अपनी भावनाओं का इजहार करना चाहिए, मेरी बहन कह रही है कि नहीं करना चाहिए। मेरी बहन 20 वर्षों तक मेरे साथ रही है। मां से ज्यादा साथ बहन ने दिया है। मां जब मुझे छोड़ कर इस संसार से चली गई थी, उसके बाद भी कुछ सालों तक मेरी बहन मेरे साथ रही, फिर उसकी शादी हो गई और वो भी चली गई।
जिस दिन बहन की शादी थी मैं बहुत खुश था। बहुत देर तक बरातियों के साथ मिल कर नाचता भी रहा। फिर शादी की तमाम रस्में हुईं। मुझे भाई वाली कोई रस्म पूरी करनी थी, आधी रात को मैंने वो पूरी की। फिर बहन की मांग में मेरे होने वाले जीजाजी ने नारंगी रंग का सिंदूर लगाया, और पंडित के मंत्रोच्चार के बीच बहन ने जीजाजी के साथ हवन कुंड के कई फेरे लिए। उन फेरों के बाद बहन फिर जब दुबारा किसी और रस्म के लिए वहां बैठी तो मैंने बहुत गौर से उसके चेहरे की ओर देखा। एक मिनट पहले मेरी जो बहन 'मेरी बहन' थी, वो मुझे अचानक कुछ अलग नजर आने लगी थी।
जिस बहन से मैं एक टॉफी के लिए लड़ाई कर लेता था, जो बहन मेरे जरा सा बुखार होने पर सारी रात मेरे सिर को सहलाती रह जाती थी, जो बहन मेरे दस दोस्तों के घर आ जाने पर हंसते खेलते उनके लिए खाना बना देती थी, जो बहन अपने पैसे मुझे दे देती थी ताकि मैं कई पत्रिकाएं और खरीद सकूं, जो बहन दिवाली पर मिले अपने पैसों को मेरे पटाखों पर लुटा देती, वो बहन उस वक्त वहां नहीं बैठी थी।
वहां तो बैठी थी पीले रंग की साड़ी में दुबकी, नारंगी सिंदूर में सिमटी एक भरी पूरी औरत, जिसकी सूरत मेरी मां से मिल रही थी। मुझे लग रहा था कि मेरी मां की शादी हो रही है, और मैं वहां सबकुछ फ्लैशबैक में देख रहा हूं। और देखते-देखते मेरी बहन मेरी मां में तब्दील हो गई। शादी के मंत्रोच्चार चल रहे थे, कुछ लोग उंघ रहे थे, लेकिन मैं जागा हुआ था। मेरी आंखें उस लड़की में अपनी 'बहन' तलाश रही थीं। और मैं देख रहा था िक कैसे वो 'मां' बन कर मेरी ज़िंदगी से दूर जा रही थी।
मैं रो रहा था। सभी लोग समझा रहे थे कि हर बहन को एक दिन भाई का घर छोड़ना ही पड़ता है। पर मैं रोए जा रहा था। मेरी बहन तब भी एकदम शांत थी। मुझे याद आ रहा था कि जब मां की मौत हुई थी, उसे बिस्तर से उठा कर घर वालों ने जमीन पर लिटा दिया था, तब मैं जोर-जोर से चिल्ला रहा था कि मां को जमीन पर मत लिटाओ। वो ज़िंदा है, वो ज़िदा है। मेरी बहन दरवाजे के पास तब भी एकदम खामोश खड़ी थी। उस दिन शादी के बाद भी मैं रो रहा था, लेकिन बहन शांत थी।
आज सोच रहा हूं कि थॉमस शेफ किसके लिए कह रहे हैं कि भावनाओं को छिपाना बीमारी है। क्या वो सिर्फ मेरी बहन के लिए कह रहे हैं, या फिर दुनिया भर की तमाम बहनों के लिए कह रहे हैं- जो सचमुच बेटी, बहन और मां और बहू का रोल निभाते हुए बखूबी अपनी भावनाओं को जज्ब करती रह जाती हैं?
टीवी टुडे ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.






