Pushya Mitra : मजीठिया आयोग लागू होने में ऐसी कौन सी बात है कि इस पर चर्चा नहीं की जाये. सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे वैध ठहरा दिया है. लागू हो गया और हम जैसे पत्रकारों को इसके दायरे में रखा गया तो हमारा वेतन ठीक-ठाक हो जायेगा, (कुछ लोग कह रहे हैं कि अनुबंध वाले पत्रकारों को इसका लाभ शायद ही मिले). मगर प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री की आपत्तियां भी जायज हैं.
बाजारवाद के इस दौर में वेतन आयोग सिर्फ इसी इंडस्ट्री के लिए है, न साफ्टवेयर इंडस्ट्री के लिए है और न ही दूसरी निजी कंपनियों के लिए. रोचक तो यह है कि इस आयोग की अनुशंसाएं टीवी मीडिया और वेब मीडिया पर भी लागू नहीं होंगी. अगर हो गयी होतीं तो मीडिया साइट चलाने वाले ही सबसे पहले इसका विरोध करते. खैर यह तो प्रिंट मीडिया के मालिकानों का मसला है. आने वाले दिनों में कटौती-छटनी या कुछ एडिशनों का बंद होना जैसे क्रूर उपाय भी अपनाये जा सकते हैं. कई अखबार भी बंद हो सकते हैं, बिजनेस है, घाटे में कौन चलायेगा. आने वाला वक्त उथल-पुथल भरा रह सकता है. जाने क्या हो… मगर मन में एक छोटी सी उम्मीद हर किसी के है कि शायद हमारा भी भला हो जाये… देखिये क्या होता है… पत्रकारों का जीवन तो 24 घंटे तलवार की धार पर होता है…. (पत्रकार पुष्य मित्र के फेसबुक वॉल से.)
Kumar Sauvir : देश-प्रदेश की राजधानियों और महानगरों के समाचार संस्थानों से जुड़े पत्रकारों के लिए तो मजीठिया अवार्ड और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला स्वागतयोग्य है ही। लेकिन उन पत्रकारों का क्या होगा जो ज्यादातर जिला और तहसीलों में पूरा जीवन खपा रहे हैं, केवल इस भरोसे और विश्वास पर कि एक दिन घूरे के ही तरह, उनके भी दिन फिरेंगे। दर्दनाक यह है कि बड़े पत्रकार लोग ऐसे छोटे पत्रकारों को सरेआम दलाल और धंधेबाज करार देते घूमते हैं। कितनी विडम्बना है कि बड़े पत्रकारों को तो वेतन के अलावा कमाई के कई रास्ते खुले होते हैं, लेकिन जिला-तहसील स्तीय पत्रकारों को तो एक धेला तक नहीं मिलता। (पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से)






