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सुख-दुख...

आप जानते होंगे यशवंत की गुंडई को, पर हम आपकी भडुवई को भी जानते हैं विनोद कापड़ी!

व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।  और इसी लिए यशवंत सिंह की नोएडा में गिरफ़्तारी अपशकुन है वेब मीडिया के लिए। बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए।

व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।  और इसी लिए यशवंत सिंह की नोएडा में गिरफ़्तारी अपशकुन है वेब मीडिया के लिए। बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए।

इसी लिए मित्रों, यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खडे़ होने का है। यशवंत को नैतिक समर्थन देने का है। कारपोरेट और पूंजीवादी पत्रकारिता के खिलाफ़ जिस ताकत से यशवंत आज की तारीख में खडे़ हैं, प्रतिरोध की जो अलख वह भड़ास4मीडिया के मार्फ़त जगाए हुए हैं, वह सैल्यूटिंग हैं। इस को डायल्यूट नहीं होने देना चाहिए। यशवंत ने बहुतों को उन की तकलीफ़ में, उन की यातना में, उन की बेरोजगारी में भड़ास का कंधा दिया है रोने के लिए भी और आस बंधाने के लिए भी, हिम्मत से खड़ा हो कर लड़ने के लिए भी। यह दौर मज़दूर विरोधी दौर है, लोकतंत्र के नाम पर हिप्पोक्रेसी का दौर है, ट्रेड यूनियन समाप्त हैं, पूंजीपतियों के मनमानेपन की कोई इंतिहा नहीं है। सब को वायस देने वाले पत्रकार अब खुद वायसलेस हैं। ऐसे संकट के समय यशवंत भड़ास4मीडिया के मार्फ़त वायसलेस मीडिया-जन की वायस बन कर हमारे सामने न सिर्फ़ उपस्थित हुए बल्कि धूमकेतु की तरह छा गए। मीडिया जगत के लिए यह अनोखी घटना थी। और अब तो मीडिया और मीडिया-जनों की हालत बंधुआ सरीखी हो चली है।

व्यावसायिकता के फ़न ने उसे डस लिया है। चहुं ओर बस पैसा और पैकेज की होड़ मची है। मीडिया घरानों ने सामाजिक सरोकार की खबरों को जिस तरह रौंदा है और राजनीतिक और अफ़सरशाही के भ्रष्टाचार को जिस तरह परदेदारी की गिरह में बांधा है, वह किसी भी स्वस्थ समाज को अस्वस्थ बना देने, उसे मार डालने के लिए काफी है। यह जो चौतरफ़ा भ्रष्टाचार की विष-बेल लहलहा रही है तो यह आज की कारपोरेट मीडिया का ही कमाल है। नहीं इतने सारे अखबारों और चैनलों की भीड़ के बावजूद यह कैसे हो जाता है कि नीरा राडिया जैसी विष-कन्या न सिर्फ़ राजनीतिक हलकों, कारपोरेट हलकों में अपनी तूती बजाती फिरती है बल्कि मीडिया को भी कुत्ता बना कर लगातार पुचकारती फिरती है। प्रभा दत्त जैसी बहादुर पत्रकार की बेटी बरखा दत्त को भी दलाली की सिरमौर बना देती है। वह बरखा दत्त जिस की मां प्रभा दत्त खतरों से खेल कर १९७१ के युद्ध में जा कर युद्ध की खबरें भेजती है। संपादक मना करता है युद्ध की रिपोर्ट पर जाने के लिए तो वह छुट्टी ले कर मोर्चे पर पहुंच जाती है रिपोर्ट करने। उसी प्रभा दत्त की बेटी बरखा भी कारगिल मोर्चे पर जा कर तोपों की गड़गड़ाहट के बीच बंकर में बैठ कर रिपोर्ट करती है और पद्मश्री का खिताब भी पाती है। पर जब नीरा राडिया के राडार पर बरखा दत्त आ जाती है तो बस मत पूछिए। वह शपथ के पहले ही मंत्रियों को उन का पोर्टफ़ोलिओ भी बताने लग जाती है। इनकम टैक्स विभाग नीरा राडिया का फ़ोन टेप करता है देशद्रोह की शक में तो मामले कई और भी सामने आ जाते हैं। इनकम टैक्स विभाग बाकायदा प्रेस कांफ़्रेंस कर इस पूरे टेप के मायाजाल को अधिकृत रुप से जारी कर देता है। पर यह टेप किसी भी अखबार, किसी भी चैनल पर एक लाइन की खबर नहीं बनता। सब के सब जैसे आंख मूंद कर यह पूरी खबर पी जाते हैं। सब के अपने-अपने हित हैं। कोई अपने हितों से आखिर टकराए भी कैसे?

पर भडास के यशवंत सिंह न सिर्फ़ टकराते हैं बल्कि राडिया राडार पर आए समूचे टेप को भड़ास पर लगातार जारी करते चले जाते हैं। व्यवस्था से सीधे टकरा जाते हैं। हलचल मच जाती है। [ऐसी तमाम खबरें और वाकए यशवंत और उन के भड़ास के खाते में दर्ज हैं।] पर मीडिया जगत की बेशर्मी खत्म नहीं होती। कहीं कोई सांस फिर भी नहीं लेता। वह तो जब  सुब्रमण्यम स्वामी पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाते हैं तब मीडिया की कुंभकर्णी नींद आधी-अधूरी टूटती है। आज तक पूरी खुली भी नहीं। बताइए कि इतने सारे हाहाकारी चैनलों और अखबारों के बावजूद घोटालों पर घोटालों की जैसे बरसात है। पर किसी चैनल या अखबार में खबर जब मामला अदालत या सी.बी.आई जैसी किसी एजेंसी के ब्रीफ़िंग के बाद ही आधी-अधूरी सी क्यों आती है? पहले क्यों नहीं आ पाती? सलमान खान की माशूकाओं, उन की मारपीट की सुर्खियां बनाने वाले इस मीडिया जगत में आज भी कोयला घोटाले के बाबत एक भी खोजी खबर क्यों नहीं है? सत्यम जैसी कंपनियां रातों-रात डुबकी मार जाती हैं फिर भी किसी अखबार या चैनल में खबर क्यों नहीं आ पाती समय रहते? टू जी घोटाला हो जाता है, कामन वेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला एक लंबी फ़ेहरिश्त है। पर समय रहते एक लाइन की भी खबर कहीं नहीं आ पाती। क्यों?

मुझे याद है कि १९८४ में हिंदुस्तान अखबार में बाज़ार भाव के पन्ने पर एक सिंगिल कालम खबर छपी थी सेना में जासूसी को ले कर। खबर दिल्ली के अखबार में छपी थी। पर लारकिंस बंधु की गिरफ़्तारी लखनऊ के लारेंस टैरेस से सुबह सात बजे तक उसी दिन हो गई थी। यह खबर लिखने वाले रिपोर्टर एसपी सिंह से इस बारे में जब पूछा गया कि खबर इतनी छोटी सी क्यों लिखी? तो वह तफ़सील में आ गए। और बताया कि पहले तो वह यह खबर लिखने को ही तैयार नहीं थे। पर सेना में उन के मित्र ने जब बहुत ज़ोर दिया तब उन्हों ने प्रमाण मांग कर खबर से कतराने की कोशिश की। लेकिन मित्र ने कहा कि चलो प्रमाण देने के लिए मुझे भी देशद्रोह करना पडे़गा, पर एक बडे़ देशद्रोह को रोकने के लिए मैं छोटा देशद्रोह करने को तैयार हूं। मित्र ने उन्हें सारे प्रमाण दे दिए। अब एस.पी. सिंह की आंखें चौधिया गईं। खैर बहुत सोच-समझ कर खबर लिखी। अब समाचार संपादक ने खबर रोक ली। खबर की संवेदनशीलता का तर्क दे कर। पर मित्र के दबाव के चलते वह समाचार संपादक के पीछे पडे़ रहे और बताया कि सारे प्रमाण उन के पास हैं। कोई पंद्रह-बीस दिन तक यह खबर इधर-उधर होते रही। और अंतत: कट-पिट कर वह खबर बाज़ार भाव के पन्ने पर उपेक्षित ढंग से एक पैरा ही छप पाई। पर यह एक पैरे की खबर भी आग लगा गई। और बडे-बडे लोग इस में झुलस गए। इंदिरा गांधी के बहुत करीबी रहे मुहम्मद युनूस तक लपेटे में आ गए। और उन्हें कोई राहत अंतत: मिली नहीं।

एस.पी.सिंह को इस का मलाल तो था कि खबर देर से, गलत जगह और बहुत छोटी छपी। पर वह इस बात से भी गदगद थे कि उन की खबर पर समाचार संपादक ने विश्वास किया और कि देश एक बडे़ खतरे से बच गया। मित्र की लाज भी रह गई। अब न एस.पी. सिंह जैसे रिपोर्टर हैं न वैसे अखबार। नहीं इसी हिंदुस्तान टाइम्स में जब खुशवंत सिंह संपादक बन कर आए तो के.के बिरला के साथ पहली मीटिंग में उन्हों ने कुछ मनपसंद लोगों को रखने और कुछ फ़ालतू लोगों को हटाने की बात कही। तो के.के. बिरला ने खुशवंत सिंह से साफ कहा कि रखने को आप चाहे जैसे और जितने लोग रख लीजिए पर हटाया एक नहीं जाएगा। यह बात खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में बड़ी साफगोई से लिखी है। और अब उसी हिंदुस्तान टाइम्स में क्या-क्या नहीं हो रहा है, लोगों को हटाने के लिए? हिंदुस्तान हो या कोई और जगह, हर कहीं अब एक जैसी स्थिति है। हर कहीं विसात ही बदल गई है। सरोकार ही सूख गए हैं।

एक समय मीडिया को वाच डाग कहा जाता था, अब यह वाच डाग कहां है? क्या सिर्फ़ डाग बन कर ही नहीं रह गया है? इस वाच डाग को आखिर डाग में तब्दील किया किस ने? आखिर डाग बनाया किस ने? स्पष्ट है कि संपादक नाम के प्राणी ने। मालिकों के आगे दुम हिलाने के क्रम में इतना पतन हो गया इस प्राणी का कि अब संपादक नाम की संस्था ही समाप्त हो गई। बताइए कि इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार एक बे सिर पांव की खबर छाप देता है कि जनरल वी के सिंह दिल्ली पर कब्ज़ा करना चाहते थे और यह सारे चैनल बुद्धि-विवेक ताक पर रख कर दिन भर सेना की गश्त दिखा कर पूरे देश में पेनिक क्रिएट कर देते हैं। पर नीरा राडिया का टेप नहीं दिखा या सुना पाते! उत्तर प्रदेश जैसे कई और प्रदेशों में एनआरएचएम घोटाले के तहत करोडों की दवा खरीद कागज़ पर हो जाती है, आपरेशन थिएटर कागज़ पर ही बन जाते हैं, भुगतान हो जाता है, हत्याएं हो जाती हैं, पर इस बारे में कहीं कोई खबर पहले नहीं मिलती। मिलती है, जब सीबीआई या अदालत कुछ बताती या किसी को जेल भेजती है। यह क्या है?

तो जब आप देश की खबरों को, सरोकार की खबरों को व्यवस्था विरोध के खाने में डाल कर व्यवस्था के आगे दुम हिलाएंगे तो कोई एक यशवंत आ खड़ा होगा और जो आप की तरह दुम नहीं हिलाएगा तो आप उस का गला दबा देंगे? आप उस को शराबी और गुंडा कह कर हवालात खिला देंगे? इस लिए कि उस ने आप की रंगरेलियां कभी उजागर कर दी थीं? विनोद कापडी यह व्यवस्था नपुंसक हो गई है, यह पुलिस बिकाऊ हो गई है। नहीं कायदे से तो आप और आप जैसे लोगों के खिलाफ़ एफ़. आई. आर कर कर जेल भेज दिया जाना चाहिए। यशवंत सिंह जैसों को नहीं। पिछले दस-बारह वर्षों में जो भूत-प्रेत और कुत्तों-बिल्लियों, अंध विश्‍वास और अपराध की बेवकूफ़ी की खबरों से, दलाली की खबरों से समाज को जिस तरह बरगलाया गया है, जिस तरह समाज की प्राथमिकताओं को नष्ट किया गया है, खोखला किया गया है वह हैरतंगेज़ है। यकीन मानिए कि अगर मीडिया इस कदर भडुआ और दलाल न हुई होती तो इस कदर मंहगाई और भ्रष्टाचार से कराह नहीं होता यह देश। राजनीतिक पार्टियां इतना पतित नहीं हुई होतीं। मीडिया के बदचलन होने से इस देश के अगुआ और उन का समाज बदचलनी की डगर पर चल पड़ा। जनता कीड़ा-मकोड़ा बन कर यह सब देखने और भुगतने के लिए अभिशप्त हो गई। अब बताइए कि एक औसत सी फ़िल्म आती है और मीडिया को पैसे खिला कर महान फ़िल्म बन जाती है। ऐसा इंद्रधनुष रच दिया जाता है गोया इस से अच्छी फ़िल्म न हुई, न होगी। अब लगभग हर महीने किसी न किसी फ़िल्म को यह तमगा मिल ही जाता है। विज्ञापनों का ऐसा कालाबाज़ार पहले मैं ने नहीं देखा। यह मीडिया है कि भस्मासुर है?

इसी भस्मासुर से लड़ने के लिए यशवंत सिंह और उन का भडास4मीडिया या ऐसे लोग ज़रुरी है। ठीक है कि भड़ास की हैसियत महाभारत के बिदुर जितनी भी नहीं है, पर वह आवाज़ उठाता तो है! नहीं बताइए कि मनरेगा से भी कम मज़दूरी में, एक रिक्शा वाले से भी कम मेहनताने में काम कर रहे मीडिया-जनों की वायस आखिर है कोई उठाने वाला भला? मणिसाना की सिफ़ारिशें तक लागू करवा पाने में सरकारी मशीनरी का तेल निकल जाता है और लागू नहीं हो पाता। किसानों के हित में भी न्यूनतम मूल्य सरकार निर्धारित करती है उन की उपज के लिए। पर मीडियाजनों के लिए न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं तय कर पाती यह सरकार या व्यवस्था। और ये मालिकान। इन मज़लूमों की बात और आवाज़ उठाने के लिए हम यशवंत को जानते हैं। आप जानते होंगे यशवंत की गुंडई को। पर हम आप की भडुवई को भी जानते हैं विनोद कापड़ी। पूरा देश जानता है।

यशवंत सिंह को आज नहीं तो कल अदालत ज़मानत दे देगी। पर आप या आप जैसों को कब और कौन ज़मानत देगा यह भी कभी सोचा है आप ने या आप जैसे लोगों ने? सोचा है विनोद कापड़ी? कि कौन से समाज का सपना देख रहे हैं आप लोग? मीडिया के नाम पर समाज के लिए जो लाक्षागृह रोज ही क्या हर क्षण बनाने में आप या आप जैसे लोग अनवरत युद्धरत हैं। जो लगे हुए हैं फ़र्जी और अंधविश्वासी खबरों की खेप-दर-खेप ले कर, सांप और कुत्तों का व्याह आदि दिखा कर, अपराधों का नाट्य-रुपांतरण दिखा कर, अब यह देखिए और वह देखिए चिल्ला-चिल्ला कर, चीख-चीख कर, गोया दर्शक अंधे और बहरे हों, दो लाइन की खबर दो घंटे में किसी मदारी की तरह मजमा बांध कर खबरें दिखाने का जो टोटका इज़ाद किया है न और इस की आड़ में सरोकार की खबरों को मार दिया है, भ्रष्टाचार की खबरों को दफ़न किया है न, तिस पर फ़र्जी स्टिंग की खेती भी हरी की है न, इन सब अपराधों की ज़मानत आप या आप जैसों को कोई  समाज कैसे और क्यों देगा इस पर भी कभी बडे़ गुरुर से सही, हेकड़ी और अहंकार में डूब कर ही सही, सोचने की ज़रुरत ज़रुर है। शहरों के चिडियाघर हों या जंगल शेरों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है, इस लिए भी ज़रुरी है यशवंत सिंह और उन के जैसे लोग। मीडिया का भी आखिर एक पर्यावरण होता है। क्या इस नष्ट होते जा रहे पर्यावरण को भी बचाने की ज़रुरत नहीं है? है और बिलकुल है। जियो यशवंत! जियो! इन सारी बाधाओं और बाड़ों को तोड़ कर जियो! धार-धार तोड़ कर जियो!

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.


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