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सुख-दुख...

आप हम ग्रामीण पत्रकारों की परेशानी समझते क्यों नहीं हैं संपादक महोदय?

जयपुर : एक ग्रामीण संवाददाता का सबसे बड़ा दुःख तो ये है कि उसे जीवन भर पत्रकार ही नहीं समझा जाता. उसके गाँव मोहल्ले के लोग उसे उसकी पीठ पीछे दलाल की संज्ञा देते हैं और डेस्क वाले उसको महज हॉकर समझते रहते हैं. इन दोनों उपमानों के बीच झूलता ग्रामीण पत्रकार महज कुछ सौ रुपयों के मानदेय की एवज में खबरों के लिए रात-दिन एक करता भागता रहता है.

जयपुर : एक ग्रामीण संवाददाता का सबसे बड़ा दुःख तो ये है कि उसे जीवन भर पत्रकार ही नहीं समझा जाता. उसके गाँव मोहल्ले के लोग उसे उसकी पीठ पीछे दलाल की संज्ञा देते हैं और डेस्क वाले उसको महज हॉकर समझते रहते हैं. इन दोनों उपमानों के बीच झूलता ग्रामीण पत्रकार महज कुछ सौ रुपयों के मानदेय की एवज में खबरों के लिए रात-दिन एक करता भागता रहता है.

जिन लोगों का वास्ता ऐसे ग्रामीण पत्रकारों से पड़ा है वो शायद इनका दर्द आसानी से समझ सकते हैं. अव्वल तो जैसा मैंने ऊपर बताया कि उसको डेस्क वालों और मुख्यालय की टीम के दोयम दर्जे के व्यव्हार को झेलना पड़ता है. जिस फिल्ड में वो दिन रात रहता है अगर कभी वहां कोई बड़ी घटना या वारदात घट जाये जिसकी रिपोर्टिंग उसके करियर में इजाफा कर सके तो वहां उसके सीनियर रिपोर्टर कूद पड़ते हैं. दूसरा अपने द्वारा भेजी हर खबर लगवाने को उसे डेस्क पर बैठे ऐसे ऐसे लोगों की मातहती करनी पड़ जाती है जो कहीं से भी इसके लायक नहीं.

अब खबर के असर की बात करें तो आज दोनों बड़े अखबारों "भास्कर" और "पत्रिका" दोनों ने हर जिले से अपने पुलआउट निकाल रखे है. लिहाजा ये बेचारे ग्रामीण पत्रकार किसी अधिकारी के खिलाफ हिम्मत करके कोई खबर लगा भी दें तो वो खबर उसी जिले में छप कर रह जाती है. नतीजा ये कि उस खबर पर कोई कार्यवाही तो होती नहीं है उल्टा वो रिपोर्टर उस अधिकारी की नज़रों में चढ़ जरूर जाता है. और ऊपर से तुर्रा ये कि कभी अखबार के लिए काम करते समय किसी ग्रामीण संवाददाता को किसी कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ जाये तो सबसे पहले उसके खुद के अखबार वाले उसे बीच मझधार में छोड़ कर रवाना होते हैं.

इसके अलावा हर अखबार के जिला मुख्यालयों में बीट के अनुसार अलग अलग पत्रकार होते हैं. इसके अलावा फोटोग्राफर और टाइपिस्ट अलग से रहते हैं. इन सभी को निश्चित तनख्वाह भी दी जाती है. इसके विपरीत सभी अखबारों में ग्रामीण पत्रकार मामूली से मानदेय (कटिंग बेस) पर काम करते हैं जिसकी एवज में इन्हें ही सारी बीट, फोटोग्राफी, टाइप का काम भी देखना पड़ता है. उस पर गाहे बगाहे विज्ञापन का काम भी डाल ही दिया जाता है. ऐसे में अगर कभी गलती से किसी पत्रकार से कोई मामूली सी भी गलती हो जाये तो डेस्क इंचार्ज से लेकर सम्पादकीय टीम के ऐरे गैर भी उसे हड्काने में जुट जाते है.

तो माननीय संपादको, आशा है की आप इन अदने से ग्रामीण संवाददाताओ का दर्द समझेंगे और उन्हें आर्थिक सम्मान न सही मगर कम से कम एक पत्रकार के रूप में सम्मान तो देंगे….

एक ग्रामीण पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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